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FIFA World Cup 2022: हजारों मजदूरों की लाशों पर हो रहा जश्न

FIFA World Cup 2022: कतर को मेजबान देश के रूप में चुनने के दिन से ही फीफा 2022 विश्व कप विवादों के घेरे में रहा है। खेलों को अक्सर प्रतिबंधित दवाओं के प्रयोग के लिए विवादों में पड़ते देखा जाता है, लेकिन फीफा 2022 तो सीधा "गुलामी का विश्व कप" कहा जा रहा था।

FIFA World Cup 2022 Labour exploitation for football world cup

अनगिनत मजदूरों की मौत, काम के घटिया हालात, कोई मुआवजा न दिया जाना, ऐसी वजहों से कतर में विश्व कप 2022 के आयोजन हेतु स्टेडियम, सड़कों, अन्य व्यवस्थाओं के निर्माण, पिछले दस बारह वर्षों से लगातार सवालों के घेरे में रहे हैं।

फीफा 2022 के कतर विश्व कप को लेकर जो ताजा विवाद शुरू हुआ है, वो भगोड़े जाकिर नाइक के मजहबी प्रचार को लेकर वहां पहुँचने से जुड़ा हुआ है। लेकिन देखा जाये तो दिसम्बर 2010 के आसपास जब कतर को फीफा 2022 की मेजबानी का मौका मिला था, विवाद तभी से शुरू हो गए थे।

यहाँ मार्च 2009 में फीफा 2022 की निविदा की प्रक्रिया के शुरू होने की तिथियाँ महत्वपूर्ण हो जाती हैं। कुछ दिन पहले किसी "द फोर्थ पैसेंजर" नामक अज्ञात पुस्तक की लेखिका मिनी नायर ने एक ट्वीट करके चुटकी लेने की कोशिश की थी। उनका प्रश्न था कि दक्षिणपंथियों को इस बात का जवाब जरूर देना चाहिए कि कतर जैसे छोटे मुल्क को इन खेलों की मेजबानी करने का मौका मिल गया और भारत को नहीं! कई लोगों ने उनके ट्वीट का जवाब देकर उन्हें याद दिला दिया कि जब निविदाएँ निकली थीं, तो उनकी समर्थन वाली सरकार ही सत्ता सुख भोग रही थी।

ऐसी छोटी-मोटी घटनाओं को छोड़ दिया जाए तो भी लम्बे समय से फीफा 2022 की मेजबानी देने के लिए अरबों डॉलर की रिश्वत लेने के आरोपों का बाजार गर्म रहा। कई अधिकारियों पर गाज भी गिरी।

असली समस्या असल में दिसम्बर 2010 में शुरू हुई, जब फीफा 2022 की मेजबानी का अवसर कतर को मिल गया। तब पता चला कि आयोजन के लिए जैसे बड़े स्टेडियम चाहिए, वो तो कतर में हैं ही नहीं। इसलिए निर्माण कार्य आरंभ हुए और इसके लिए बड़ी संख्या में मजदूर वहाँ पहुँचने लगे।

मजदूरों में एक बड़ा वर्ग वैसे तो फिलिपीन्स और केन्या जैसे मुल्कों का था मगर भारतीय उपमहाद्वीप से भी वहाँ बड़ी संख्या में लोग काम करने पहुंचे। इन मजदूरों में से कई घर नहीं लौटे। काम के हालात ऐसे थे कि काफी बड़ी संख्या में वहाँ मजदूरों की मौतें हुईं।

2010 से 2020 के दौरान फुटबॉल विश्व कप हेतु स्टेडियम निर्माण के लिये भारत, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान से गये लगभग 6500 से अधिक मजदूरों की मौत हुई है। आधिकारिक आंकड़ों की बात की जाए तो द गार्डियन में छपे एक लेख के मुताबिक भारत, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका से प्रवासी मजदूरों की 2011-2020 के बीच 5927 मौतें हुईं।

इनसे अलग जो आंकड़े कतर के पाकिस्तानी दूतावास से मिले, उनके मुताबिक 2010-2020 के बीच 824 पाकिस्तानी कर्मियों की मौतें हुई हैं। एक तो इन आंकड़ों में गौर करने लायक यह है कि इनमें 2020 के अंतिम महीनों के आंकड़े नहीं हैं। दूसरी बात कि फिलीपींस और केन्या जैसे देश जहाँ से भारतीय उप-महाद्वीप की तुलना में कहीं अधिक मजदूर जाते हैं, उनकी गिनती नहीं ली गयी है। इसलिए ये कुल मृतक मजदूर नहीं, केवल भारतीय उप-महाद्वीप के वो मजदूर हैं, जो फीफा 2022 में जनता का मनोरंजन करने के लिए मारे गए।

अधिकारिक तौर पर मृत्यु के जो आंकड़े कतर की ओर से जारी भी होते हैं, उनमें कितना सच है और कितना झूठ, ये तय कर पाना करीब-करीब नामुमकिन है। अगर आयोजन समिति की रिपोर्ट को सच माना जाए तो वर्ल्ड कप के स्टेडियम बनाने के दौरान 37 कामगारों की मौतें हुईं, जिसमें से 34 "काम से अलग" कारणों से हुई मौतें थीं। कई बार इनमें ऐसी मौतें भी हैं जिसमें मजदूर काम के दौरान बेहोश हुआ और बाद में उसकी मृत्यु हो गयी।

गार्डियन में छपे आलेख के मुताबिक विशेषज्ञ इस किस्म की मौतों को भी संदिग्ध मानते हैं। उदाहरण के तौर पर भारत के मधु बोल्लापल्ली का परिवार अभी भी ये मानने को तैयार नहीं कि 43 वर्षीय, स्वस्थ मधु की मृत्यु "प्राकृतिक कारणों" से हो सकती है। उनका शव मजदूरों के सोने के कमरे में जमीन पर पड़ा पाया गया था।

अधिकांश परिवारों को मुआवजों की कोई रकम भी नहीं मिली। उदाहरण के तौर पर नेपाल के घलसिंह राय का परिवार है। घलसिंह क्लीनर का काम करने गए थे और उन्होंने भर्ती के लिए करीब एक लाख रुपये खर्च किये थे। एक सप्ताह के अन्दर ही उन्होंने कथित रूप से खुदखुशी कर ली। बांग्लादेश के मुहम्मद शाहिद की करंट लगने से मौत हो गई थी जब उनके कमरे की खुली तारों पर नाली का पानी आ गया।

गार्डियन की रिपोर्ट ऐसी कई मौतों का खुलासा करती है जिससे ये तो साफ है कि जो 20 लाख के लगभग प्रवासी मजदूर कतर काम की तलाश में पहुंचे थे, जिनमें से हजारों की लाश पर ये फुटबॉल का महोत्सव मनाया जा रहा है। जो बात और डराने वाली है, वो ये है कि इनमें से कई तो युवा ही थे।

शायद यही वजह थी कि सोशल मीडिया पर इस फीफा 2022 को गुलामी का वर्ल्ड कप (#SlaveryWorldCupQatar) तक बुलाया जा रहा है। कुछ देर तक ट्विटर जैसे माध्यमों पर #BoycottQatar2022 भी ट्रेंड करता रहा है।

हो सकता है जैसे जैसे खेल के दिन बीतेंगे, वैसे-वैसे और भी विवाद इससे जुड़ते जाएं। पश्चिमी देशों की नींद खुलेगी या नहीं, वो ये स्वीकार कर पाएंगे या नहीं, ये देखने वाली बात होगी। विश्व कप के दौरान जिस तरह के प्रतिबंध कतर ने लगाए हैं, उनसे यह स्पष्ट है कि एक दो नहीं लगभग 56 देश ऐसे हैं, जिन्होंने आधुनिक विश्व के साथ अपने आप को बदलने से इंकार कर दिया है।

यह भी पढ़ें: FIFA World Cup 2022: दुनिया का सबसे बड़ा रिलीजन क्यों बन गया है फुटबॉल?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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