Expressways in UP: कितना व्यवहारिक है यूपी में ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे का विस्तार?

Expressways in UP: एक्सप्रेसवे उन्हीं देशों से आयात किया हुआ एक कांसेप्ट हैं जहां से मोटरवाहन उद्योग पूरी दुनिया में फैला। यूरोप अमेरिका में एक्सप्रेसवे ऐसी सड़क को कहते हैं जिस पर प्रवेश और निकास नियंत्रित रहता है। इन सड़कों के आसपास कोई बाजार या बसावट नहीं होती। तेज गति वाहनों के लिए ऐसे एक्सप्रेसवे सुरक्षित रहते हैं जिस पर 100 या 120 की गति से गाड़ियां फर्राटा भर सकती हैं।

भारत में इस तरह का पहला एक्सेस कन्ट्रोल्ड एक्सप्रेसवे राष्ट्रीय राजमार्ग विकास प्राधिकरण (एनएचएआई) ने प्रयागराज के पास बनाया था। अटल बिहारी वाजपेयी की महत्वाकांक्षी स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के तहत जब नेशनल हाइवे नंबर 2 का चौड़ीकरण का काम शुरु हुआ तो तत्कालीन इलाहाबाद बाइपास के रूप में 100 किलोमीटर लंबा एक्सप्रेसवे बनाया गया था। यह पूरी तरह से एक्सेस कन्ट्रोल्ड हाइवे था जिसे पहली बार आधिकारिक रूप से एक्सप्रेसवे का दर्जा दिया गया। हालांकि इसके पूर्व मुंबई पुणे एक्सप्रेसवे का निर्माण महाराष्ट्र के तत्कालीन पथ निर्माण मंत्री नितिन गडकरी ने करवाया था लेकिन वह राष्ट्रीय स्तर पर एक्सप्रेसवे इसलिए नहीं माना गया क्योंकि उस पर प्रवेश और निकास पूरी तरह से नियंत्रित नहीं था। वह एक फोर लेन हाइवे था।

Expressways in UP: How practical is the expansion of Greenfield Expressway in UP?

इलाहाबाद एक्स्प्रेसवे के बाद वड़ोदरा अमदाबाद एक्सप्रेसवे बना। इसके बाद नोएडा ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे, यमुना एक्सप्रेसवे, आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे, ईस्टर्न और वेस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे, हैदराबाद रिंगरोड एक्सप्रेसवे बनाये गये और संचालित हैं। इन सभी सड़कों को यूरोपीय मानक के मुताबिक बनाया गया है जिस पर गाड़िया बेरोक टोक 100 से 120 की गति से फर्राटा भर सकती हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश को छोड़ दें तो बाकी राज्यों में एक्सप्रेसवे का वैसा जुनून दिखाई नहीं देता।

इस समय केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गड़करी द्वारा जरूर दो महत्वाकांक्षी एक्सप्रेसवे परियोजनाओं पर कार्य करवाया जा रहा है। इसमें से एक है दिल्ली मुंबई एक्सप्रेसवे और दूसरा है मुंबई नागपुर एक्सप्रेसवे। कहने की जरूरत नहीं है कि स्वयं महाराष्ट्र से संबंध रखनेवाले नितिन गडकरी के लिए ये महत्वाकांक्षी परियोजनाएं हैं जिन्हें वो हर हाल में 2023 तक पूरा करना चाहते हैं। दोनों ही परियोजनाओं पर बहुत तीव्र गति से कार्य भी चल रहा है।

महाराष्ट्र में औद्योगिक गतिविधियों को देखते हुए कहा भी जा सकता है कि ये महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और हरियाणा के विकास में महत्वपूर्ण मील पत्थर साबित होंगे। लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे राज्य जहां औद्योगिक गतिविधियों से ज्यादा महत्वपूर्ण खेती है, वहां के लिए क्या एक्सप्रेसवे उसी तरह वरदान साबित होंगे जैसे महाराष्ट्र गुजरात में हो सकते हैं? आज भारत में सर्वाधिक 1396 किलोमीटर एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश में ही संचालित है। इसमें पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, यमुना एक्सप्रेसवे, आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे, ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे, मेरठ एक्सप्रेसवे, बुन्देलखंड एक्सप्रेसवे, प्रयागराज बाइपास एक्सप्रेसवे शामिल हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश सरकार गंगा एक्सप्रेसवे और गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे पर तो एनएचएआई बनारस कोलकाता एक्सप्रेसवे, गाजियाबाद दिल्ली एक्सप्रेसवे, गोरखपुर शामली एक्सप्रेसवे और लखनऊ कानपुर एक्सप्रेसवे पर काम कर रही है। ये सभी परियोजनाएं पूरी होने पर यूपी में 3 हजार किलोमीटर से अधिक ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे नेटवर्क हो जाएगा।

लेकिन अब सवाल ये उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश में सचमुच इतने ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे की जरूरत है? ये सवाल सुनकर अच्छी सड़कों का महत्व समझनेवालों को आश्चर्य होगा लेकिन इस सवाल के महत्व को नहीं नकार सकेंगे। उत्तर प्रदेश एक सघन आबादी वाला राज्य है जहां आज भी मुख्य कारोबार खेती किसानी है। उत्तर प्रदेश एक ऐसा सौभाग्यशाली प्रदेश है जहां गंगा यमुना का विशाल डेल्टा बनता है। खेती की सबसे उपजाऊ जमीन उत्तर प्रदेश और बिहार में ही है जहां साल में तीन फसल तक उपजाई जा सकती है। क्या ऐसे अन्न उत्पादक राज्य में हजारों हेक्टेयर खेती योग्य भूमि सिर्फ ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे के नाम की जा सकती है?

उत्तर प्रदेश सरकार का आंकड़ा देखें तो पूर्वांचल एक्सप्रेसवे और बुन्देलखण्ड एक्सप्रेसवे के लिए 8,000 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहीत की गयी है। ये 8,000 हेक्टेयर जमीन उसी गंगा यमुना डेल्टा का हिस्सा है जहां साल में तीन फसल लेने की संभावना है। इसके अलावा अभी खेती की सबसे उर्वर भूमि पर गंगा एक्सप्रेसवे बन रहा है जो मेरठ हापुड हाइवे से निकलकर प्रयागराज बाईपास तक पहुंचेगा। 600 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे के लिए भी 6,556 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण हुआ है, जिस पर निर्माण कार्य चल रहा है। इस तरह अगर देखें तो इन्हीं तीन ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे के लिए राज्य सरकार ने करीब 15 हजार हेक्टेयर खेती वाली जमीन का अधिग्रहण किया है। क्या उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्य के लिए ये उचित है कि बढ़ती आबादी के बोझ तले दबा राज्य अपनी खेती की बेशकीमती जमीन ग्रीनफील्ड सड़क निर्माण के लिए इस्तेमाल कर ले?

अगर खेती के आंकड़ों से देखें तो एक हेक्टेयर में न्यूनतम 6 से 7 टन धान पैदा होता है। इस लिहाज से अगर 15 हजार हेक्टेयर भूमि को देखें तो 90 हजार टन से एक लाख टन धान की पैदावार हो सकती है। इसी तरह एक हेक्टेयर में औसत 20 से 30 क्विंटल तिलहन की पैदावार होती है। इस हिसाब से खेती की जितनी जमीन उत्तर प्रदेश में मात्र तीन ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस वे के लिए अधिगृहित की गयी है उतनी जमीन पर 3 लाख से 4.5 लाख टन तिलहन पैदा किया जा सकता है। लेकिन इन तीन एक्सप्रेसवे के बन जाने के बाद इतनी उपज का नुकसान राज्य को हमेशा के लिए उठाना पड़ेगा। ऐसे में ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे क्या सचमुच फायदे का सौदा कहे जा सकते हैं?

शायद नहीं। कृषि योग्य भूमि पर औद्योगीकरण और बड़ी संख्या में स्थायी निर्माण लाभकारी नीति नहीं होती। नीति आयोग हो या राज्य की सरकारें, उन्हें ऐसे मेगा प्रोजेक्ट के लिए जिस एक बुनियादी बात का ध्यान रखना होता है वो ये कि ऐसे प्रोजेक्ट से हमारा लाभ क्या होगा, और नुकसान कितना होगा? ऐसे राज्य जहां अनुपजाऊ या गैर कृषि भूमि ज्यादा है वहां औद्योगीकरण और एक्सप्रेसवे स्वागतयोग्य हो सकते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे कृषि भूमि वाले राज्य में मात्र तीन एक्सप्रेसवे के नाम पर 15 हजार हेक्टेयर खेती योग्य जमीन का अधिग्रहण भविष्य के लिए खाद्यान्न संकट का कारण ही बनेगा।

नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 168 लाख हेक्टेयर कुल भूमि है। इस आंकड़े में से अगर 15 से 20 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि हम कम भी कर दें तो राज्य की कृषि सेहत पर कोई फर्क पड़ता नहीं दिखता। लेकिन यह तस्वीर का एक पक्ष है। दूसरा पक्ष है राज्य की सघन आबादी और निरंतर छोटी होती जोत। राज्य में औसत परिवार के पास 0.76 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है जो कि राष्ट्रीय औसत 1.5 हेक्टेयर का आधा है। इसके अलावा राज्य में प्रजनन दर 2.4 है जो राष्ट्रीय औसत 2 से अधिक है। स्वाभाविक है बढती जनसंख्या के कारण खेती की जमीन पर घर बनाने का दबाव बढेगा और खेती का रकबा और घटेगा।

ऐसे में सिर्फ बैंकिंग सेक्टर के ऋण कारोबार को निश्चित लाभ देने के लिए निरंतर नये नये एक्सप्रेसवे बना देने से राज्य का विकास हो जाएगा, ये एक गलत रणनीति भी हो सकती है। उसकी जगह अगर वर्तमान नेशनल हाईवे और स्टेट हाईवे को बेहतर किया जाए तो न केवल अतिरिक्त कृषि भूमि का नुकसान बचेगा बल्कि राज्य में परिवहन की दशा भी बेहतर होगी। मोदी सरकार बनने के बाद सबसे अधिक नेशनल हाईवे बनाने की घोषणा उत्तर प्रदेश में ही हुई है। इस समय उत्तर प्रदेश में कुल 11,736 किलोमीटर नेशनल हाईवे है जो देश में सर्वाधिक हैं। इसके अलावा स्टेट हाईवे का अपना नेटवर्क है।

वैसे भी एक्सप्रेसवे की अवधारणा में ही उसके किनारे किसी भी प्रकार की गतिविधि की मनाही है इसलिए इनका इस्तेमाल सिर्फ गाड़ियों की सिग्नल मुक्त आवाजाही के लिए ही किया जाता है। ये किसी औद्योगिक राज्य जहां खेती योग्य भूमि कम है वहां लाभकारी तो हो सकते हैं किसी कृषि प्रधान राज्य के लिए नहीं। यहां सड़कों का ऐसा पैटर्न ही सफल होगा जिसमें वर्तमान में मौजूद सड़कों को सुधारा जाए और उन्हें ही वैश्विक मानकों के अनुरुप बनाया जाए। ग्रीनफील्ड (खेतीयोग्य जमीन पर) बनने वाले एक्स्प्रेसवे से सरकार को कुछ टोल टैक्स तो मिल सकता है लेकिन इससे कृषि का जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई करना भविष्य में संभव नहीं होगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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