China and Taiwan: चीन-ताइवान विवाद में यूरोपीय संघ नहीं रहेगा निष्पक्ष, सेमीकंडक्टर सप्लाई है प्रमुख कारण
दुनिया की बड़ी से बड़ी कंपनियां चिप के लिए ताइवान की ओर रुख करती है। ऐसे में अगर ताइवान पर चीन का नियंत्रण हो जाता है, तो ताइवान की सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री भी चीन के कब्जे में हो जाएगी।

फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रॉन के बयान के बाद चीन और ताइवान विवाद पर अब यूरोपियन यूनियन के फॉरेन पॉलिसी चीफ जोसेप बोरेल का बयान सामने आया है। उनके बयान को चीन ने खतरनाक बताया है। बता दें कि जोसेप ने अपने बयान में कहा कि यूरोपीय सेना को ताइवान में गश्त करने के लिए भेजना चाहिए। जोसेप के मुताबिक ताइवान मामले में यूरोप को हस्तक्षेप करने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि ताइवान के खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई की संभावना को अनिवार्य रूप से खारिज किया जाना चाहिए और ऐसा करने की वजह सिर्फ नैतिक नहीं है। दरअसल यह आर्थिक दृष्टि से काफी गंभीर मसला है, क्योंकि ताइवान सबसे एडवांस्ड सेमीकंडक्टर के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सेमीकंडक्टर का महत्त्व
बता दें कि ताइवान अपने सेमीकंडक्टर की वजह से ही दुनिया में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। सेमीकंडक्टर एक तरह की चिप है, जिसका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक गैजेट जैसे फोन, लैपटॉप, सैंसर आदि में होता है। ट्रेंडफोर्स के मुताबिक इन चिप के उत्पादन के मामले में ताइवान की हिस्सेदारी 65 फीसदी है। दुनिया की बड़ी से बड़ी कंपनियां चिप के लिए ताइवान की ओर रुख करती है। ऐसे में अगर ताइवान चीन के काबू में हो जाता है, तो ताइवान की सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री भी चीन के कब्जे में हो जाएगी।
यही वजह है कि दुनिया की नजरें इस समय चीन-ताइवान विवाद पर अटकी हुई हैं। हालांकि चीन की वन चाइना पॉलिसी की वजह से बहुत से देश खुलकर चीन का विरोध कर नहीं पाते। यूरोपियन यूनियन के सदस्य देश फ्रांस के राष्ट्रपति ने भी हाल ही में कहा था कि यूरोपीय देशों को ताइवान मामले से दूर रहना चाहिए। इस पर जोसेप ने कहा कि दूर नहीं रहा जा सकता, क्योंकि इससे सभी आर्थिक रूप से प्रभावित होंगे। जोसेप बोरेल के बयान के बाद चीन ने अपनी पॉलिसी का जिक्र करते हुए यूरोपीय संघ को चेताया है। अपने मुखपत्र के जरिए चीन ने कहा है कि वन चाइना पॉलिसी चीन व यूरोपीय संघ संबंधों के लिए राजनीतिक आधार है।
क्या है वन चाइना पॉलिसी
पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना 1949 में अस्तित्व में आया, जिसे हम चीन के नाम से जानते हैं। इस चीन के तहत मैनलैंड चीन और हांगकांग-मकाऊ जैसे दो विशेष रूप से प्रशासित क्षेत्र आते हैं। वहीं रिपब्लिक ऑफ चाइना में ताइवान और कुछ द्वीप समूह हैं, इसे प्राय: ताइवान के नाम से हम जानते हैं। ताइवान कभी चीन के कब्जे में रहा, तो कभी जापान के।
चीन और ताइवान के बीच मौजूदा विवाद में साल 1949 अहम है। इस साल माओत्से तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्टों ने चियांग काई शेक के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कॉमिंगतांग पार्टी के खिलाफ विद्रोह कर दिया ओर उसे हरा दिया। इस गृह युद्ध में कम्युनिस्टों से हार के बाद कॉमिंगतांग ने ताइवान में जाकर अपनी सरकार बनाई और यहीं से दो इकाइयां अस्तित्व में आईं। दोनों आधिकारिक चीन होने का दावा करती रही, लेकिन इसमें चीन ने बाजी मार ली। चीन ने अपनी ताकत बढ़ाई और ताइवान को अलग-थलग कर लिया।
वन चाइना पॉलिसी के मुताबिक चीन नाम का सिर्फ एक ही राष्ट्र है और ताइवान चीन का ही एक प्रांत है। इस नीति के तहत चीन का कहना है कि अगर उससे रिश्ते रखने हैं तो ताइवान से अपने रिश्ते तोड़ने होंगे। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र समेत दुनिया के ज्यादातर देश ताइवान को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं देते, लेकिन ताइवान के लोग अभी तक अपनी संप्रभुता के लिए डटे हुए हैं। हालांकि चीन ताइवान विवाद में अमेरिका की दखलअंदाजी को देखते हुए कुछ लोगों के मन में यह धारणा बनने लगी है कि अमेरिका कहीं ताइवान की आड़ में अपना उल्लू तो सीधा नहीं कर रहा।
चीन या अमेरिका!
ताइवान के सामने दुविधा है कि वह किसे चुने, युद्ध या शांति! इसके सीधे सीधे मायने यह है कि ताइवान अमेरिका या चीन किसके खेमे में खड़ा होगा! ताइवान की मौजूदा राष्ट्रपति त्साई इंग वेन (डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी) और पूर्व राष्ट्रपति मा यिंग जोऊ (केएमटी) दोनों के ही विदेशी दौरे इन दिनों चर्चा में है। वेन जहां ताइवान की संप्रभुता के लिए झुकने के मूड में नहीं दिखतीं, वहीं मा यिंग का रुझान चीन की ओर है, जिसे वह शांति के प्रयासों के तौर पर दिखाते हैं। अगले बरस ताइवान में चुनाव होने जा रहे हैं, इसलिए युद्ध या शांति का नारा उछाला जा रहा है। केएमटी के नेता मा कहते हैं कि वेन के काल में चीन और ताइवान का तनाव बढ़ा है, ताइवान को युद्ध अथवा शांति में से किसी एक चुनाव करना है।
मा ने जहां चीन का दौरा किया वहीं वेन ने हाल ही में अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव के स्पीकर केविन मैक्कार्थी से मुलाकात की थी। वेन की पार्टी कह रही है कि 2024 का राष्ट्रपति चुनाव लोकतंत्र या तानाशाही के मुद्दे पर होगा। ऐसे में चीन भी फिलहाल युद्ध की धमकियां ही देगा, लेकिन युद्ध से बचेगा। चीन की नजरें भी अगले बरस होने वाले चुनाव पर रहेगी। यह चुनाव ही ताइवान का भविष्य तय करेंगे।
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