Emergency 1975: आरएसएस की लाठियों को देश के लिए खतरा बताकर संघ पर प्रतिबंध लगाया था इंदिरा गांधी ने
Emergency 1975: आपातकाल के दौरान गिने-चुने स्कॉलर ही थे, जिन्हें प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने का मौका मिला था। इसमें ऑक्सफोर्ड के प्रोफेसर डेविड सेल्बर्न शामिल थे। अपनी मुलाकात में उन्होंने प्रधानमंत्री से एक सवाल किया। उन्होंने पूछा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को फासिस्ट कहने और उस पर प्रतिबंध लगाने का उनका क्या मतलब है? प्रधानमंत्री ने जवाब दिया कि संघ फासिस्ट है क्योंकि वे लोग मेरे बारे में झूठी अफवाहें फैला रहे हैं। इस जवाब को सुनकर डेविड सेल्बर्न चौंक गये और कहा कि फासिज्म की यह एकदम नयी परिभाषा है।
आपातकाल के दौरान फासिज्म की अपनी परिभाषाओं को गढ़ने का ही नहीं बल्कि झूठे और काल्पनिक आरोपों का भी सिलसिला कायम किया गया था। उस दौरान न्यूयॉर्क टाइम्स के संवाददाता जे. एंथोनी लुकास दिल्ली में मौजूद थे। उन्होंने इंडिया इज एज इंदिरा डज (India is as Indira does) शीर्षक से न्यूयॉर्क टाइम्स में 4 अप्रैल 1976 को विस्तार से एक लेख लिखा। इस लेख में उन्होंने आपातकाल की तुलना तानाशाही से की थी।

जे. एंथोनी लुकास ने इसी लेख में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को 12 से 21 आयु के स्वयंसेवकों का एक अनुशासित संगठन कहा। उन्होंने आगे लिखा कि संघ को ट्रूप्स यानी सैन्य संगठन नहीं कहा जा सकता। यह बात उन्होंने इसलिये लिखी क्योंकि आपातकाल के दौरान मीडिया को कुछ तस्वीरें दिखाई गयी थीं। उन तस्वीरों में लकड़ी की लाठियां और लकड़ी की तलवारें थीं, जिनके बारे में कहा गया कि वे संघ के दफ्तरों से बरामद की गयी हैं। अतः एंथोनी ने इसकी सत्यता जानने के लिए तत्कालीन केंद्रीय गृहराज्य मंत्री ओम मेहता से संपर्क साधा।
एंथनी के मुताबिक ओम मेहता ने हिचकिचाते हुए उन्हें बताया कि धातुओं से बनी तलवारें भी मिली है। इसपर एंथनी से उन्हें पूछा कि चलो धातुओं से बनी कुछ तलवारें हैं तो भी संघ के स्वयंसेवक एक मिलियन हथियारों से लैस कुशल भारतीय सेना का मुकाबला कैसे करेंगे? इसके अलावा बॉर्डर सिक्यूरिटी फोर्स के 85000 सैनिक, सेन्ट्रल रिजर्व पुलिस के 57000 जवान, और राज्यों में लगभग साढ़े सात लाख पुलिसबल हैं। इनसब का सामना ये लोग कैसे करेंगे? इसपर मेहता ने जवाब दिया कि कुछ राइफल्स भी मिली हैं। एंथनी ने बात काटते हुए कहा कि क्या आपने वे राइफल्स जब्त की हैं? मेहता ने कहा, कोई हथियार जब्त नहीं किया गया। मगर हो सकता है कि इन्होंने घरों में हथियार जमा कर रखे हैं। इन लोगों की शरारत करने की क्षमता को कम मत आंकिए।
इसके आगे क्या हुआ एंथनी ने कुछ नहीं लिखा। मगर इंदिरा गांधी की चचेरी बहन नयनतारा सहगल ने अपनी पुस्तक 'इंदिरा गांधी - हर रोड टू पॉवर' (Indira Gandhi: Her Road to Power) में सरकार के इन झूठे और काल्पनिक आरोपों पर जरुर खुलकर बात की है। नयनतारा ने लिखा है कि सरकार का एक प्रोपेगेंडा विभाग था। उसी ने दावा किया कि पुलिस को संघ के दफ्तरों से कुछ गुप्त हथियारों की सूचना मिली है। साथ ही आनंद मार्ग के कार्यालयों से मानव खोपड़ियों के अवशेष मिले हैं। नयनतारा आगे लिखती है कि सरकार ने फिल्म डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से लोगों के मन में यह बैठाने का प्रयास किया कि इन हथियारों और मानव खोपड़ियों का संबंध जयप्रकाश नारायण सहित विपक्षी दलों से है। जैसा हिटलर ने किया था वैसा ही ये लोग अब करने वाले हैं।
इस पूरी कवायद अथवा प्रक्रिया को नयनतारा सहगल ने Clumsy कहकर संबोधित किया है। हिंदी में इस शब्द के अर्थ अनाड़ी, भद्दा, फूहड़ और बेढंगा होते हैं। वहीं, नयनतारा सहगल ने अपनी इस किताब में एक महत्वपूर्ण बात की ओर इशारा किया है। आमतौर पर उन तथ्यों पर ध्यान कम जाता है। वह लिखती हैं कि इंदिरा गांधी हमेशा दावा करती थी कि उनकी सरकार के खिलाफ साजिश रची जा रही है। यह आरोप न तो कभी सिद्ध हुए और न ही किसी आरोपी को साजिश रचने के आरोप में ट्रायल के लिए पेश किया गया।
कुल मिलाकर न तो ओम मेहता अपनी बातों से एंथनी को विश्वास दिला सके और न ही नेहरु-गांधी परिवार की सदस्य नयनतारा सहगल अपनी बहन इंदिरा गांधी की कार्यशैली से खुश दिखी। तत्कालीन सरकार ऐसे ही दर्जनों काल्पनिक और मनगढ़ंत आरोपों की बुनियाद पर पहले लोगों को भ्रमित कर रही थी और बाद में जनता पर खुद ही आपातकाल थोप दिया।
साल 1971 के युद्ध के दौरान प्रधानमंत्री के तौर पर इंदिरा गांधी ने एक अहम भूमिका निभाई थी। मगर 1975 आते-आते वह एक कमजोर नेता की तरह पेश आने लगी थी। पुपुल जयकर भी इंदिरा गांधी की करीबियों में से एक थी। उन्होंने 'इंदिरा गांधी - एन इंटिमेट बायोग्राफी' (Indira Gandhi: An Intimate Biography) नाम से एक पुस्तक लिखी है। उन्होंने बताया कि इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा करने के बाद मंत्रिमंडल की एक बैठक बुलाई। इंदिरा गांधी इस बैठक में ओम मेहता के साथ आई थीं। बैठक कक्ष के बाहर संजय गांधी खड़े थे। कुछ ही देर में बैठक खत्म हुई तो सभी मंत्रीगण बाहर आने लगे। बाहर खड़े संजय गांधी ने शिक्षा मंत्री नुरुल हसन से कहा कि वह विश्वविद्यालयों के उन लेक्चरर्स की सूची बनायें जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्थक हैं।
हम सब जानते है कि देश में आपातकाल 25 जून 1975 की आधी रात को थोपा गया। इसके लगभग एक महीने बाद लोकसभा में 'अप्रूवल ऑफ प्रोक्लमेशन ऑफ इमरजेंसी' विधेयक पेश हुआ। जाहिर तौर पर यह विधेयक इंदिरा गांधी की सरकार ने सदन के पटल पर रखा था। विधेयक पर चर्चा के दौरान 22 जुलाई को इंदिरा गांधी भी लोकसभा में मौजूद थी। उन्होंने इस विधेयक चर्चा न कर पूरा भाषण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ दिया। प्रधानमंत्री ने इस दौरान दर्जनों बार संघ और गुरु गोलवरकर का जिक्र भी किया। साथ ही उन्होंने उन्होंने यह भी कहा कि जो तलवारें पकड़ी गयी हैं, वे खिलोनें (Toy) हैं।
यानी जब इंदिरा गांधी को आभास हो गया कि लकड़ी की तलवारों वाला प्रोपेगंडा असफल हो गया है तो उन्होंने संघ से जुड़े लोगों की सूची बनाकर उन्हें प्रताड़ित करने का मन बना लिया। अंत में उन्होंने लाखों स्वयंसेवकों को बिना किसी कारण देशभर में नजरबन्द कर दिया और महीनों तक उन पर अनगिनत अत्याचार किए गए। ऐसी तानाशाही और जनता पर अत्याचार के कारण ही इंदिरा गांधी द्वारा थोपा गया आपातकाल भारत के लोकतंत्र के इतिहास में एक गहरे काले धब्बे के रूप में हमेशा जाना जाता रहेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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