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Electoral Bonds: इलेक्टोरल बॉन्ड्स से कांग्रेस का मकसद पूरा नहीं हुआ

Electoral Bonds: अरविन्द केजरीवाल के दो पुराने साथी थे प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव| इन दोनों को अरविन्द केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी से बाहर निकाल दिया था, क्योंकि केजरीवाल इन दोनों को खुराफाती और जरूरत से ज्यादा महत्वाकांक्षी मानते थे|

ये दोनों ही आजकल राहुल गांधी के सलाहाकार बने हुए हैं| योगेन्द्र यादव ने राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्राओं का जिम्मा संभाला हुआ है| प्रशांत भूषण सुप्रीमकोर्ट के माध्यम से राहुल गांधी और कांग्रेस की हरसंभव मदद की कोशिश में जुटे हैं|

Electoral Bonds

प्रशांत भूषण अहमदाबाद के एनजीओ एडीआर के माध्यम से अक्सर कोई न कोई याचिका लगा कर मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करने के प्रयास में दिखाई देते हैं| अडानी की कंपनियों के शेयरों की कीमतें बढाने के मामले में जब हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आई थी, तब भी याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ही थे|

सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के क़ानून, इलेक्टोरल बॉन्ड, ईडी संजय मिश्रा के एक्सटेंशन को चुनौती देने जैसी सभी याचिकाएं प्रशांत भूषण ने एडीआर और कांग्रेस की नेता जया ठाकुर का वकील बनकर दाखिल की हैं|

Electoral Bonds

राहुल गांधी हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने से पहले ही अडानी के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं| उन्होंने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर दिए अपने भाषण में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अडानी समूह को बेजा फायदा पहुँचाने के कई आरोप लगाए थे| एडीआर के नाम से इलेक्टोरल बांड के खिलाफ याचिका भी प्रशांत भूषण ने दाखिल की थी|

इसके अलावा एक याचिका कांग्रेस की नेता जया ठाकुर और एक अन्य याचिका मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की भी थी| राहुल गांधी ऐसा मानते थे कि इलेक्टोरल बांड का बंद ढक्कन खुल गया, तो चुनाव में उनका अडानी कार्ड चल निकलेगा| उन्हें पूरी उम्मीद थी कि अडानी ने ही भाजपा को सबसे ज्यादा चंदा दिया होगा|

सुप्रीमकोर्ट में दाखिल याचिका का उतना ही प्रचार किया गया, जितना अडानी समूह पर हिंडनबर्ग की रिपोर्ट का किया गया था| जिस दिन सुप्रीमकोर्ट ने पारदर्शिता को आधार बनाकर इलेक्टोरल बांड को असंवैधानिक करार दिया था, उस दिन विपक्ष ने ऐसी खुशी मनाई थी कि जैसे मोदी के खिलाफ सेमीफाइनल जीत लिया हो|

विपक्ष को उम्मीद थी कि राहुल गांधी का यह आरोप सही साबित हो जाएगा कि मोदी अडानी की जेब भर रहे हैं, और अडानी भाजपा की जेब भर रहे हैं| लेकिन 14 मार्च को जब इलेक्टोरल बॉन्ड की बंद मुठ्ठी खुल गई, तो सबके मुहं लटक गए, क्योंकि अडानी ने एक भी इलेक्टोरल बांड नहीं खरीदा था, न अंबानी ने खरीदा था, न टाटा ने खरीदा|

अब नया मुद्दा बनाया जा रहा कि कांग्रेस को तो सिर्फ 1400 करोड़ मिला, लेकिन भाजपा को 6000 करोड़ से अधिक मिल गया| वैसे राजनीतिक हिस्सेदारी के अनुपात से देखें, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता| लोकसभा में भाजपा के सांसद कांग्रेस से छह गुना है, उसे चंदा तो कांग्रेस से पांच गुना भी नहीं मिला|

राहुल गांधी आज कल जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी का नारा भी लगा रहे हैं, तो यह नारा चुनावी चंदे पर भी फिट बैठता है| जनता ने जिसको जितनी हैसियत में रखा, चंदा देने वाली कंपनियों ने भी उन्हें उतनी ही हैसियत में रखा| अब अगर लोकसभा की संख्या के हिसाब से देखें, तो कांग्रेस को उसकी संख्या से ज्यादा चंदा मिला है|

इसमें कोई शक ही नहीं कि बड़े औद्योगिक घराने अपने हितों को देख कर और संरक्षण के लिए राजनीतिक दलों को चंदा देते हैं, चंदा देने का माध्यम इलेक्टोरल बॉन्ड हो या कोई अन्य माध्यम| चंदा किसी भी माध्यम से दिया जाए, वह है भ्रष्टाचार ही|

कांग्रेस को भी अगर इलेक्टोरल बॉन्ड के माध्यम 1400 करोड़ चंदा मिला है, तो वह उन उद्योगपतियों से मिला होगा, जिनकी कंपनियों को राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकारों या महाराष्ट्र और झारखंड की कांग्रेस के समर्थन से चल रही सरकारों से कोई कांट्रेक्ट मिला होगा| इस हमाम में सब नंगे हैं|

इसलिए अब यह सवाल कोई नहीं उठाएगा कि तृणमूल कांग्रेस को और भारत राष्ट्र समिति को कांग्रेस से ज्यादा या थोड़ा कम चंदा क्यों और कैसे मिला| कांग्रेस को 1400 करोड़ मिला, लेकिन तृणमूल कांग्रेस को 1600 करोड़ और केसीआर की बीआरएस को 1200 करोड़ मिले| क्योंकि इन दोनों दलों की राज्य सरकारें थीं|

नैतिकता का सवाल जितना भाजपा पर खड़ा होता है, उतना ही कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, बीआरएस, डीएके और वाईआरएस कांग्रेस पर भी खड़ा होता है, जिनकी राज्यों में सरकारें थीं, और उन्हें इलेक्टोरल बॉन्ड के माध्यम से गोपनीय चंदा मिला|

अब प्रशांत भूषण इलेक्टोरल बॉन्ड पर यूनिक नंबर नहीं होने को लेकर फिर सुप्रीमकोर्ट में पहुंच गए। सुप्रीमकोर्ट ने इस पर स्टेट बैंक इंडिया को नोटिस भी जारी कर दिया है, जिस पर सोमवार को आगे सुनवाई होगी, लेकिन जब इलेक्टोरल बॉन्ड अवैध ही हो गए, तो स्टेट बैंक वह सब भी उपलब्ध करवा देगा| वह कोई बहुत बड़ा मसला नहीं है|

इलेक्टोरल बॉन्ड की बंद मुठ्ठी खुलने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा को कटघरे में खड़ा करने का कांग्रेस का बड़ा मकसद हल नहीं हुआ क्योंकि अडानी और अंबानी ने भाजपा को इलेक्टोरल बॉन्ड के माध्यम से चंदा ही नहीं दिया, जिसके लिए वह विभिन्न माध्यमों से सुप्रीमकोर्ट गए थे|

प्रशांत भूषण अब इलेक्टोरल बांड के डाटा की चीरफाड़ करके कुछ कंपनियों पर सवाल उठा रहे हैं| जिनमें मेघा इंजीनियरिंग एक है, जिसने 100 करोड़ के बांड खरीदे थे| प्रशांत भूषण का आरोप है कि महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने मेघा इंजीनियरिंग को 14000 करोड़ रूपए का कांट्रेक्ट दिया था| लेकिन क्या इन आरोपों से राहुल गांधी और कांग्रेस का कोई मकसद हल होगा|

राहुल गांधी ने पिछले चुनाव में राफेल और अनिल अंबानी को लेकर मुद्दा बनाया था, वह मोदी को चोर कह रहे थे| इस बार वह अडानी को मुद्दा बनाकर देश को गुमराह करने की कोशिश कर रहे थे| इसमें कोई शक ही नहीं है कि राहुल गांधी ने जया ठाकुर से यह सोच कर याचिका दाखिल करवाई थी कि अडानी ने ही मोदी को सबसे ज्यादा इलेक्टोरल बॉन्ड दिए होंगे| जब अडानी के खिलाफ हिंडनबर्ग ने अंतरराष्ट्रीय साजिश रची थी, तब भी इसी जया ठाकुर ने एसबीआई और एलआईसी पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अडानी के शेयर ज्यादा कीमत पर खरीदे|

कांग्रेस ने जेपीसी की मांग को लेकर संसद का पूरा सत्र नहीं चलने दिया था, और कांग्रेस की नेता जया ठाकुर इस मसले को लेकर सुप्रीमकोर्ट गई थी। सुप्रीमकोर्ट ने सेबी से जांच करवाने के बाद याचिका खारिज कर दी थी, क्योंकि याचिका में लगाए गए आरोप साबित नहीं हुए थे कि अडानी ने स्टेट बैंक और एलआईसी को मार्केट से महंगे शेयर बेचे थे|

सुप्रीमकोर्ट के फैसले से साबित हुआ था कि जार्ज सोरोस ने अडानी और अडानी के बहाने मोदी और इन दोनों के बहाने देश की छवि खराब करने की साजिश रची थी| 14 मार्च को जब इलेक्टोरल बॉन्ड की डिटेल जारी हो गई, तो अडानी ने भी अंतरराष्ट्रीय साजिश की ओर इशारा किया है|

कांग्रेस सुप्रीमकोर्ट के माध्यम से सरकार के हर काम में बाधा डालने की भी भरपूर कोशिश कर रही है। कांग्रेस की नेता जया ठाकुर ने ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के क़ानून को चेलेंज करवाया हुआ है| लेकिन मोदी सरकार ने 14 मार्च को चयन कमेटी की बैठक बुला कर कांग्रेस की आपत्ति के बावजूद दो चुनाव हुए आयुक्तों का सिलेक्शन कर लिया| उन दोनों नवनियुक्त चुनाव आयुक्तों को चार्ज लेने से रोकने के भी प्रयास किए गए लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने स्टे देने से साफ़ इनकार कर दिया, जिससे नए चुनाव आयुक्तों के चार्ज लेते ही 15 मार्च को चुनावों की घोषणा का रास्ता साफ़ हो गया है|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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