Politics and Social Media: जमीन पर उतरने से पहले सोशल मीडिया पर सियासी जंग

Politics and Social Media: आगामी विधानसभा चुनावों में टिकट प्राप्ति की आस लगाए प्रत्याशियों की राजनीतिक योग्यता का पैमाना अब उनका जमीनी जुड़ाव ही नहीं रहा। लगभग सभी राजनीतिक दल अब नेता विशेष की लोकप्रियता को उनके सोशल मीडिया अकाउंट्स की रीच से मापने लगे हैं। मध्य प्रदेश के एक बड़े दैनिक समाचार पत्र में पिछले दिनों एक समाचार प्रकाशित हुआ कि जिन नेताओं की विधानसभा चुनाव लड़ने की मंशा है, उन्होंने अपनी सोशल मीडिया टीम के साथ ही, प्रोफेशनल्स की बड़ी संख्या की सेवाएं लेना प्रारंभ कर दिया है।

ये प्रोफेशनल्स कोई और नहीं बल्कि बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां हैं जो नेताओं की 'सोशल' छवि को दुनिया के सामने प्रस्तुत करती हैं। ये कंपनियां विभिन्न पैकेजों के आधार पर अपनी सेवाएं दे रही हैं। मसलन, यदि नेताजी को मात्र सोशल मीडिया अकाउंट्स पर पोस्ट डलवानी हैं तो उसकी कीमत एक लाख रुपए है। यदि दो-तीन लोगों की टीम नेताजी की छवि सुधारने में लगाई जाती है तो पैकेज 3 से 5 लाख का हो जाता है। सबसे बड़ा पैकेज 5 से 8 लाख रुपए का है जिसमें नेताजी के साथ ऑडियो-वीडियो प्रोफेशनल्स की 3 से 4 लोगों की टीम चलती है जिसमें उनके वीडियो लाइवस्ट्रीम किए जाते हैं।

elections Political war on social media before reaching the ground

साथ ही, कई कंपनियां नेताजी के भाषण भी लिख रही हैं जिससे उनकी सोशल मीडिया रीच बढ़े। यह सारी कवायद इसलिए है ताकि नेताजी की छवि और उनका स्वरूप विस्तृत लगे। भाजपा से लेकर कांग्रेस की आईटी सेल में अलग अलग टीमें बनी हुई हैं जो प्रत्याशियों के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर नजर रख रही है। जिसकी जितनी रीच, उसकी टिकट की सम्भावना उतनी ही अधिक बन रही है।

भाजपा-कांग्रेस ने झोंकी सोशल मीडिया पर ताकत

मध्य प्रदेश के परिपेक्ष्य में बात करें तो भाजपा के फेसबुक पर 14 लाख फॉलोअर्स हैं वहीं कांग्रेस 8.6 लाख फॉलोअर्स के साथ अपनी बात जनता के बीच रख रही है। एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर भाजपा और कांग्रेस दोनों के 12 लाख फॉलोअर्स हैं। यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं है कि आज से मात्र 3 वर्ष पूर्व मप्र कांग्रेस ट्टिवटर की ताकत से अंजान थी किन्तु आज वह इस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भाजपा को कड़ी टक्कर देती नजर आती है। एक वर्ष पूर्व तो कांग्रेस ने भाजपा को इस माध्यम पर मात भी दे दी थी किन्तु बाद में भाजपा की सक्रियता से मामला कांटे का हो गया।

इंस्टाग्राम पर भाजपा 88 हजार फॉलोअर्स के साथ कांग्रेस के 226 हजार फॉलोअर्स के मुकाबले काफी पीछे है। यूट्यूब पर भी कांग्रेस ने भाजपा पर बढ़त बनाई हुई है जहां उसके 30.9 हजार सदस्य है जबकि भाजपा के 15.6 हजार सदस्य हैं। प्रदेश में तीसरी राजनीतिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर आम आदमी पार्टी भी अब सोशल मीडिया पर तेजी से आगे बढ़ रही है। ट्विटर पर 27.5 हजार, फेसबुक पर 267 हजार, इंस्टाग्राम पर 22.8 हजार फॉलोअर्स के साथ वह अपना एजेंडा प्रदेशवासियों के समक्ष प्रस्तुत कर रही है।

हालांकि यह दीगर तथ्य है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर फॉलोअर्स की संख्या में बड़ा अंतर है किन्तु अब कमलनाथ भी संभवतः इसकी ताकत को समझने लगे हैं और यही कारण है कि इंस्टाग्राम पर वे शिवराज सिंह के बराबर पहुंच चुके हैं। वर्तमान में अपनी बात को वृहद् जनसमूह तक पहुंचाने में व्हाट्सएप एक प्रमुख माध्यम है और कांग्रेस इसमें भी भाजपा को टक्कर दे रही है। कांग्रेस मीडिया सेल के अनुसार, पार्टी के 70 हजार से अधिक व्हाट्सएप समूह हैं जिनके माध्यम से 90 लाख लोगों तक पार्टी अपना एजेंडा एक क्लिक के माध्यम से पहुंचा रही है। यहां तक कि बूथ स्तर पर 60 हजार से अधिक मतदान केंद्रों पर को-ऑर्डिनेटर बनाए जा चुके हैं जो सोशल मीडिया के जरिए जनता तक अपनी बात पहुंचा रहे हैं।

भाजपा का दावा है कि उसके व्हाट्सएप समूहों से प्रदेश के 2 करोड़ लोग जुड़कर उसकी नीतियों और जन-कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी ले रहे हैं। इस बीच भाजपा ने सोशल मीडिया को लेकर एक नया प्रयोग किया है जो यदि मध्य प्रदेश में सफल होता है तो पार्टी उसे पूरे देश में लागू करेगी। चूंकि सोशल मीडिया का हर दिन विस्तार हो रहा है अतः एक व्यक्ति के लिए सभी प्लेटफार्मों को संभालना काफी मुश्किल होता जा रहा है इसलिए पार्टी अब जिलों में हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए एक व्यक्ति की नियुक्ति करेगी ताकि वह एक ही माध्यम पर अपना ध्यान केंद्रित कर सके। यदि उसके जिम्मे ट्विटर है तो उसका सारा दारोमदार ट्विटर को लेकर ही होगा।

सोशल मीडिया की ताकत अब छुपी नहीं है

सोशल मीडिया के युग में जहां आप सीमाओं से परे अपने विचारों को पहुंचा सकते हैं वहीं आपके संबंध भी सात समंदर पार बनते हैं। एक समय विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम आज योग्यता का पैमाना बन चुका है। अब व्यक्ति का बड़प्पन, उसकी योग्यता, उसकी लोकप्रियता, उसकी समझ, उसका व्यक्तित्व; सभी को मांपने का पैमाना सोशल मीडिया पर उसकी उपस्थिति से होने लगा है। राजनीतिक क्षेत्र भी अब इससे अछूता नहीं रहा।

भाजपा ने 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सोशल मीडिया तूफान के सहारे भारत की राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात कर दिया है जो अब अन्य राजनीतिक दलों के लिए भी अवश्यंभावी बन गया है। सोशल मीडिया की ताकत का प्रयोग हालांकि इसकी प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। उदाहरण के लिए, कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने तत्कालीन मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई की फोटो लगाकर पेटीएम की तरह स्कैनर जारी कर बीजेपी सरकार पर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सीधा हमला बोला था जो प्रभावी रहा। इसी प्रकार का पोस्टर कैम्पेन मध्य प्रदेश में भी चलाने की तैयारी थी किन्तु 23 जून, 2023 को भोपाल में कमलनाथ के खिलाफ पोस्टर्स लग गए। इसके पीछे सोशल मीडिया अकाउंट के बजाय थर्ड पार्टी अकाउंट के प्रयोग का अंदेशा था।

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में इस प्रकार के प्रचार से एआई की अनियंत्रित ताकत भी सामने दिख रही है जहां किसी भी नेता का हुबहू ऑडियो-वीडियो बनवाकर उसे जनता के बीच प्रसारित किया जाता है। जनता भी सही-गलत में भ्रमित होकर निर्णय लेने को बाध्य है और नेताजी अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं। यदि एआई का ऐसा प्रयोग बहुतायत में होता है तो यह भारतीय राजनीति का स्याह पक्ष प्रस्तुत करेगा।

खैर, इन सब चिंताओं के इतर विधानसभा चुनाव में मतदाताओं पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए दोनों प्रमुख दलों ने सोशल मीडिया टीम को ट्रेनिंग दे दी है। साथ ही, नेताओं को भी दक्ष किया जा रहा है गोयाकि पूरा चुनाव ही सोशल मीडिया के माध्यम से लड़ा जाएगा। लेकिन सोशल मीडिया पर चल रही इस रस्साकसी में गूगल, फेसबुक, एक्स (ट्विटर) जैसी कंपनियों की मौज कर दी है, जो प्रतिदिन करोड़ों रुपए भारत के राजनीतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं के पैड कैंपेन से कमा रही हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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