Election Analysis: वोटिंग के बाद क्या कहती है नेताओं की बॉडी लैंग्वेज

Election Analysis: कहते हैं कि वोटिंग के बाद नेताओं की बॉडी लैंग्वेज बता देती है कि वे अपनी जीत को लेकर कितना आश्वस्त हैं| अब जब चार राज्यों के चुनाव हो चुके हैं, इन चारों राज्यों के नेताओं के बयान बता रहे हैं कि वे अपनी पार्टी के चुनाव नतीजों को लेकर कितने आश्वस्त हैं| सबसे पहले राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बयान को देखते हैं। प्रदेश के कई कांग्रेसी उम्मीदवारों का फीडबैक लेने के बाद उन्होंने कहा है कि उन्होंने अपनी तरफ से पूरी मेहनत की, अब प्रदेश की जनता ने जो तय किया है, देखा जाएगा| उनका यह बयान स्पष्ट संकेत है कि वह राज्य में कांग्रेस की जीत को लेकर उतने आश्वस्त नहीं हैं, जितने वह चुनावों के दौरान थे|

अशोक गहलोत के बाद कांग्रेस के दूसरे नंबर के नेता सचिन पायलट ने कहा कि लोगों ने अपना फैसला मशीनों में डाल दिया है, वह उम्मीद करते हैं कि प्रदेश की जनता कांग्रेस को बहुमत देगी| अगर कांग्रेस को बहुमत मिला, तो कांग्रेस हाईकमान तय करेगा कि किसको क्या भूमिका देनी है| वह यह मानकर चल रहे हैं कि अगर सत्ता आई तो कांग्रेस हाईकमान उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर अशोक गहलोत को पार्टी संगठन में भूमिका देगा, लेकिन वह जीत के लिए जरा भी आश्वस्त नहीं दिखे| उन्होंने कहा कि अगर सत्ता आई तो, इसका मतलब है कि कांग्रेस को सत्ता आने की उन्हें उम्मीद नहीं है|

Election Analysis: What does the body language of leaders say after voting?

एक आकलन यह आ रहा है कि अशोक गहलोत ने बहुत ही जबर्दस्त ढंग से चुनाव लड़ा, इससे पहले दो बार मुख्यमंत्री रहते हुए न तो 2003 में ऐसे एग्रेसिव ढंग से चुनाव लड़ा था, न ही 2013 में| दोनों ही बार कांग्रेस बुरी तरह हारी थी| अशोक गहलोत को इस बार एक फायदा यह भी था कि भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री पद के लिए किसी को प्रोजेक्ट नहीं किया| पिछ्ला रिकार्ड बताता है कि भारतीय जनता पार्टी को वहां वहां हार का सामना करना पड़ा है, जहां सामने वाली पार्टी का मजबूत चेहरा हो|

भाजपा में मोदी के हावी होने के बाद भाजपा अपने मुख्यमंत्रियों को भी भावी मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट नहीं कर रही| चाहे वह 2018 में राजस्थान हो, जब कांग्रेस में अशोक गहलोत और सचिन पायलट दो मजबूत चेहरे थे, और भाजपा अपने मजबूत चेहरे वसुंधरा राजे का चेहरा खुद ही बिगाड़ रही थी| या फिर 2015 और 2020 में दिल्ली हो, जहां भाजपा अरविन्द केजरीवाल के सामने मजबूत चेहरा पेश नहीं कर सकी| या फिर 2018 में ही मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ हो| मध्यप्रदेश में कांग्रेस के पास कमलनाथ और ज्योतिरादित्य के रूप में दो मजबूत चेहरे थे और छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और टी.एस. सिंहदेव के रूप में दो मजबूत चेहरे थे| राजस्थान की तरह इन दोनों ही राज्यों में भाजपा ने अपने मुख्यमंत्रियों को ही प्रोजेक्ट नहीं किया था|

Election Analysis: What does the body language of leaders say after voting?

इसी साल कर्नाटक में भी कांग्रेस के सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार कांग्रेस के मजबूत मजबूत चेहरे थे, लेकिन भाजपा अपने मुख्यमंत्री की बजाए मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ रही थी| इससे पहले हिमाचल प्रदेश में भी भाजपा ने अपने मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को प्रोजेक्ट नहीं किया था| दोनों ही राज्यों में भाजपा को कांग्रेस के हाथों शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने मोदी के चेहरे पर राज्यों के चुनाव लड़ने का यह विफल हो चुका फार्मूला ही फिर से आजमाया| नतीजा यह निकला कि जिस राजस्थान में भाजपा की आसान जीत बताई जा रही थी, वहां कांग्रेस कड़ी टक्कर में आ कर खड़ी हो गई| अगर भाजपा अशोक गहलोत के सामने वसुंधरा राजे को छह महीने पहले ही मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर देती, तो वह डेढ़ सौ से ज्यादा सीटें ले जा सकती थी| लेकिन अभी तो यह आकलन आ रहा है कि भाजपा को बहुमत मिला भी, तो वह 110-115 तक ही सीटें जीत सकती है|

मोदी ने जो गलती राजस्थान में की, वही गलती मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में की| न तो मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट किया, न छत्तीसगढ़ में रमन सिंह या किसी अन्य को प्रोजेक्ट किया| जबकि कांग्रेस की तरफ से मध्यप्रदेश में कमलनाथ और छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल मजबूत चेहरे थे|

मध्यप्रदेश में तो भाजपा ने कई लोकसभा सांसदों और केन्द्रीय मंत्रियों को टिकट देकर अपने मजबूत चेहरे को कमजोर करने का काम किया| नतीजा यह निकला कि चुनावों के मध्य में भाजपा की हार सुनिश्चित दिखाई देने लगी थी| वह तो शिवराज सिंह चौहान ने 15 दिन पहले खुद को ही मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करके भाजपा को मुकाबले पर लाकर खड़ा कर दिया|

याद कीजिए 2018 जब राजस्थान में नारे लग रहे थे "वसुंधरा तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं", तब भाजपा 25-30 सीटों पर निपटती दिख रही थी| लेकिन आख़िरी दिनों में इज्जत बचाने के लिए जैसे ही वसुंधरा राजे को आगे किया गया, और उन्होंने प्रचार की कमान संभाली, तो भाजपा 73 सीटें ले गई थीं| ठीक उसी तरह इस बार मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने खुद कमान संभाल कर भाजपा को निश्चित हार से बचाकर कड़ी टक्कर में लाकर खड़ा कर दिया|

मध्यप्रदेश में कमलनाथ और शिवराज सिंह दोनों ही जीत को लेकर बड़े बड़े दावे कर रहे हैं, किसी की बॉडी लैंग्वेज से अंदाजा नहीं लग रहा कि कौन अंदर से डरा हुआ है| यानी मुकाबला कांटे का रहा और पिछली बार जैसे नतीजे भी आ सकते हैं, जब दोनों पार्टियों को बहुमत नहीं मिला था| कांग्रेस की बहुमत से सिर्फ दो सीटें कम रह गई थीं, जबकि भाजपा को सरकार बनाने के लिए सात सीटें चाहिए थीं| सपा और अन्य के समर्थन से कांग्रेस की सरकार बन गई|

इस बार अगर फिर से वैसी स्थिति पैदा हुई तो उसके लिए शिवराज सिंह नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व जिम्मेदार होगा, क्योंकि मतदाताओं के सामने कन्फ्यूजन की स्थिति उसी ने पैदा की थी| छत्तीसगढ़ में भी भारतीय जनता पार्टी भूपेश बघेल के सामने अपना चेहरा पेश नहीं कर पाई| नतीजा यह निकला कि महादेव सट्टा एप जैसा बम फूटने के बावजूद भाजपा जीतती दिखाई नहीं दे रही| पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह 50-55 सीटों का दावा जरुर कर रहे हैं, लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज ऐसा आभास नहीं करवा रही कि वह भाजपा की जीत के प्रति आश्वस्त हैं| दूसरी तरफ भूपेश बघेल की बॉडी लैंग्वेज उनकी जीत का आभास करवाती है| मतदान के बाद उन्होंने कहा कि देखना होगा कि भाजपा 15 से ज्यादा सीटें जीतती है या नहीं|

तेलंगाना में चुनाव अभी बाकी है| जहां कांग्रेस और भारत राष्ट्र समिति में कांटे की टक्कर बन गई है| भारतीय जनता पार्टी ने भी आख़िरी हफ्ता पूरा जोर लगा दिया है, लेकिन तेलंगाना की चुनावी राजनीति के विशेषज्ञों का मानता है कि भाजपा ने खुद ही ओबीसी नेता बंडी संजय को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली| हालांकि बाद में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह ने यह एलान जरुर किया कि सत्ता में आने पर वह ओबीसी मुख्यमंत्री बनाएगी, लेकिन तब तक मुख्यमंत्री का पद भाजपा से पहुंच से बहुत दूर जा चुका था|

तेलंगाना में जिस तरह का तिकोना मुकाबला बन गया है, उससे के. चन्द्रशेखर राव से भी सत्ता दूर जाती दिखाई दे रही है| उनका असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम से चुनावी गठबंधन है| गठबंधन में एआईएमआईएम सिर्फ 9 सीटों पर चुनाव लड़ रही है| उन 9 सीटों पर तो वह जीत जाएंगे, लेकिन बाकी मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों पर वह केसीआर की भारत राष्ट्र समिति के उम्मीदवारों को नहीं जीता सकते| इसकी वजह यह है कि कांग्रेस मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए चुनावों के बाद केसीआर के भाजपा के साथ जाने की आशंका पैदा कर रही है, जिससे मुस्लिम वोटर बीआरएस से दूर भागने की कोशिश कर रहा है|

आकलन लग रहा है कि केसीआर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सत्ता से दूर रह सकते हैं| यह उनकी बॉडी लैंग्वेज से दिखाई देना शुरू हो चुका है| केसीआर ने कहना शुरू कर दिया है कि उन्होंने दस साल में राज्य के विकास के लिए बहुत काम करके दिखा दिया, तेलंगाना की जनता उन्हें मौक़ा देगी, तो वह और पांच साल राज्य की सेवा करेंगे| लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज यह बता रही है कि उन्हें सत्ता छिनने का डर सता रहा है|

इसीलिए केसीआर कह रहे हैं कि तेलंगाना की जनता ने कांग्रेस को बहुत कुछ दिया, लेकिन कांग्रेस ने तेलंगाना को कभी भी कुछ नहीं दिया| तेलंगाना हासिल करने के लिए तेलंगाना के लोगों को शहादत देनी पड़ी| राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा आरोप लगा रहे हैं कि केसीआर और असदुद्दीन ओवैसी दोनों भाजपा की बी टीम हैं| ओवैसी हर राज्य में अपने उम्मीदवार खड़े करके भाजपा को जिताने का काम करते हैं। वहीं मोदी सरकार की ईडी ने शराब घोटाले में नाम आने के बावजूद केसीआर की बेटी के. कविता को गिरफ्तार नहीं किया|

कांग्रेस इसे भाजपा-बीआरएस की मिलीभगत बता रही है| हालांकि के. कविता ने इसका जवाब देते हुए कहा है कि ईडी ने नेशनल हेराल्ड केस में चार्जशीटेड सोनिया गांधी और राहुल गांधी को भी गिरफ्तार नहीं किया, जबकि नेशनल हेराल्ड की 752 करोड़ की प्रापर्टी सील भी कर ली है, तो क्या कहा जाए कि राहुल और सोनिया भी भाजपा से मिले हुए हैं|

भाजपा अगर तेलंगाना में बीस सीटें भी जीत गई, तो त्रिशंकु विधानसभा भी आ सकती है| अगर त्रिशंकु जनादेश आता है, तो कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए भारतीय जनता पार्टी केसीआर को समर्थन दे सकती है| लेकिन अगर सच में ऐसी स्थिति पैदा हुई, तो असदुद्दीन ओवैसी के लिए धर्म संकट पैदा हो जाएगा, वह उस सरकार में कैसे शामिल होंगे या कैसे समर्थन जारी रखेंगे, जो भाजपा के समर्थन से बनी हो| क्या वीपी सिंह सरकार जैसी स्थिति पैदा हो सकती है, जिसे भाजपा और साम्यवादी दलों ने साथ में समर्थन देकर बनवाया था|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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