Dunki Movie: ‘डंकी’ में असर नहीं छोड़ पाए राजकुमार हीरानी
Dunki Movie: जब किसी निर्देशक का बढ़िया दौर चल रहा होता है तो वह कोई भी फिल्म बनाये, लोग यह मानकर चलते हैं कि वो तो बम्पर हिट होगी ही। ये दौर यश चौपड़ा ने देखा है। करण जौहर ने देखा है। सुभाष घई ने देखा है। महेश भट्ट ने देखा है। रामगोपाल वर्मा ने देखा है, अनुराग कश्यप ने भी, और भी कई नाम हैं। राजकुमार हीरानी ने जितने मास्टरपीस हिंदी सिनेमा को दिए हैं मुन्ना भाई सीरीज, थ्री ईडियट्स, पीके, संजू आदि, उससे लोगों की उनसे ये उम्मीद भी लाजमी है। लेकिन ऊपर लिखे नामों की बाद में जो हालत हुई, डंकी देखकर लगता है राजकुमार हीरानी के उन दिनों की भी शुरूआत हो चुकी है।
दर्शक ये मानकर बैठे थे कि राजकुमार हीरानी को इतनी समझ है कि वो कुछ तो ऐसा निकालकर लाएंगे जो उन्हें थ्री ईडियट्स या मुन्ना भाई की तरह भरपूर मनोरंजन देगा। लेकिन लगता है दर्शक और उनकी पसंद तो समय के साथ अपडेट होती चली गई, लेकिन राजू हीरानी अभी भी पुराने फॉर्मूलों पर ही अटके हैं। उन्हें पसंद किया जाता था कि वो बिना किसी स्पेशल इफैक्ट्स के, वीएफएक्स के, हीरो को बिना लार्जर दैन लाइफ रोल दिए, केवल अच्छी कहानी, चुटीले डायलॉग्स, बेहतरीन गानों और इमोशनल सींस के जरिए ही सबको मंत्रमुग्ध कर देते हैं। लेकिन अब लगता है उनको भी एनीमल देखनी चाहिए, क्योंकि इतनी लाउड फिल्म की रिलीज के बाद इतनी कूल मूवी लोगों को हजम नहीं हो रही है। कई जाने माने फिल्म क्रिटिक्स ने तो इसे 1.5 स्टार ही दिया है।

शाहरुख के फैंस भी कम नहीं। उस पर राजकुमार हीरानी की तो हर फिल्म मास्टर पीस होती आई है। लोगों को इस डबलडोज का इतना क्रेज था कि पहले शो में भी काफी भीड़ थी लेकिन लोग सोचते रहे कि अब कोई बड़ा ट्विस्ट आएगा, अब कुछ दमदार होगा, लेकिन कुछ नहीं हुआ। सिवाय क्लाइमेक्स में इमोशनल मैसेज देने के। मूवी में जो मिसिंग है वो है एंटरटेनमेंट। हालांकि विलेन भी मिसिंग ही है, सो कुछ एंटरटेनमेंट तो उसके ना होने से भी कम हो गया है।
फिल्म की कहानी में ही असली लोचा है। आप पाएंगे कि पहली बार राजकुमार हीरानी से यहीं चूक हुई है। ऐसी कहानियां जो कबूतरबाजी की या किसी भी तरह विदेश का वीजा पाने की सालों से अखबारों में छपती रही हैं वही इस फिल्म की कहानी है। शाहरुख एक ऐसे फौजी हार्डी के रोल में हैं, जो अपनी जान बचाने वाले एथलीट की बहन मनु (तापसी पन्नू) की गिरवी रखी कोठी को वापस दिलवाने में उसकी मदद करते हैं। वो और उसके दोस्त लंदन जाकर पैसा कमाना चाहते हैं। दर्शकों को पहला झटका ही वहां लगता है जब शाहरुख लंदन पहुंचते ही गिरफ्तार कर जबरन वापस भेज दिए जाते हैं। कहानी शुरू होने से पहले ही खत्म होने लगती है। ऐसा लगता है हीरो ही निकाल दिया गया मूवी से।
विकी कौशल और बोमन ईरानी को बेहतरीन रोल दिए जा सकते थे, लेकिन फिल्म में उनके किरदार ज्यादा असर नहीं छोड़ पाते। पहली बार लगा कि राजू हीरानी ने बोमन ईरानी को भी ढंग से इस्तेमाल ही नहीं किया। फिल्म में 25 साल की लीप भी लोगों की समझ नहीं आई। मूवी में अकेले विकी कौशल ने ही पंजाबी एक्सेंट पकड़ा है, बाकी लोग तो पंजाबी बोलकर भी पंजाबी नहीं लगते। किसी ने एक ट्वीट किया कि हीरानी भी नोकिया मोड में आ गए हैं।
वैसे मुन्ना भाई, थ्री ईडियट्स, पीके, संजू जैसी हीरानी की बाकी फिल्मों के आगे ये फिल्म कहीं नहीं ठहरती। 'लगे रहो मुन्ना भाई' के बाद हमेशा से अभिजात जोशी पर दांव लगाते आ रहे थे राजकुमार हीरानी, 'फरारी की सवारी' में वो नहीं थे और फिल्म ने पानी नहीं मांगा। इस बार भी अभिजात के साथ शाहरुख और तापसी की फेवरेट लेखिका कनिका ढिल्लन को जोड़ा गया और गड़बड़ हो गई। कनिका शाहरुख के साथ ओम शांति ओम, रा वन और बिल्लू में काम कर चुकी हैं तो तापसी के साथ मनमर्जियां, हसीन दिलरुबा और रश्मि रॉकेट में। यहां पंजाबी फ्लेवर देने में तो वो काम आई, लेकिन फिल्म एंटरटेनमेंट देने में हीरानी की फिल्मों के स्तर पर पहुंचने में नाकाम रही।
यूं तो 'डंकी' में एक और चेहरा गायब है, जो राजकुमार हीरानी की फिल्मों का बेहद जरूरी हिस्सा होता था, और वो हैं विधु विनोद चोपड़ा। चोपड़ा उनकी हर फिल्म के निर्माता होते थे। इस फिल्म की निर्माता गौरी खान के साथ सह निर्माता खुद राजकुमार हीरानी हैं। जाहिर है विधु इतने कामयाब निर्देशक रहे हैं, जहां पैसा लगाते होंगे, वहां कुछ सलाहें भी देते होंगे, उनकी गैरमौजूदगी का फर्क भी मूवी पर पड़ा है।
हीरानी की फिल्म में दमदार संदेश फन और एंटरटेनमेंट की चाशनी में लपेट कर दिया जाता रहा है। 'डंकी' में संदेश तो है। 'मुन्ना भाई' सीरीज में भी था, 'पीके' में भी था, 'थ्री ईडियट्स' में भी था ही, ऐसे में यहां भी होना ही था। उनकी फिल्मों में भरपूर एंटरटेनमेंट, फनी सींस और शानदार म्यूजिक भी होता है। दोनों ही मामलों में 'डंकी' में कोशिश तो की गई है, लेकिन वो कोशिशें रंग नहीं लाई।
हालांकि विकी कौशल ने जरूर अपने रोल में पूरा घुसने की कोशिश की है, ऐसे में जब उनका रोल पक रहा होता है, उसे खत्म कर दिया जाता है। लगा था बोमन ईरानी के कोचिंग संचालक के किरदार में मजा आएगा, लेकिन वो भी छोटा था। उस किरदार का भी मानो बीच में ही गला घोंट दिया गया। हालांकि 'पठान' में विलेन बने सुनील ग्रोवर के भाई अनिल ग्रोवर को शाहरुख ने डंकी में अच्छा रोल दिया है। लम्बाई में विकी कौशल से भी ऊंचे और उनकी एक्टिंग भी बेहतरीन है। हमेशा की तरह विक्रम कोचर ने भी शानदार एक्टिंग की है और देखा जाए तो पूरी फिल्म के फन एलीमेंट की जिम्मेदारी उन्हीं के हिस्से आ गई है।
हीरानी की फिल्मों के फैंस को लगा कि कहीं कहीं ऐसे डायलॉग आएंगे, कुछ सीन आएंगे जो पब्लिक, खासतौर पर युवा, कॉपी करेंगे, जैसे जादू की झप्पी, ऑल इज वैल, घपाघप आदि। लेकिन बदले में मिला बस 'धोबी पछाड़ दांव' और 'हमार' शब्द यानी गधा। एक जगह तापसी पन्नू एक इमोशनल डायलॉग बोलती हैं, 'फौजी है.. अकेले में ही रोएगा'.. ऐसे डायलॉग कम ही थे। हालांकि डंकी में अंग्रेजी सीखने की ललक और भारतीय युवाओं की परेशानी में फन करने की कोशिश की गई है, लेकिन उससे बेहतर फिल्म 'चुपके चुपके' में धर्मेन्द्र ने अंग्रेजी पर ज्यादा बेहतर कटाक्ष किए थे।
ये फिल्म भले ही राजू हीरानी ने डायरेक्ट की हो लेकिन ये तय है कि अब ये मूवी शाहरुख की है, और उनका पूरा तंत्र, फैंस इस मूवी को सुपरहिट बनाने में जुट गया है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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