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द्रौपदी मुर्मू, कमला हैरिस और भारत के पश्चिमपरस्त वामपंथी फेमिनिज्म का युनिवर्सल सिस्टरहुड

अभी अधिक दिन नहीं हुए हैं, जब अमेरिका में राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हुए थे और कमला हैरिस के उपराष्ट्रपति बनने को लेकर भारत का वामपंथी फेमिनिज्म अपने उत्साह की सीमाएं पार कर गया था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे महिलाओं के लिए इससे गौरवशाली क्षण या पद नहीं हो सकता था। ऐसे ही जब हिलेरी क्लिंटन को अमेरिका के राष्ट्रपति पद के दावेदार के रूप में चुना गया था, उस समय भी भारत का पश्चिमपरस्त वामपंथी फेमिनिज्म अचानक से ही इस प्रकार गौरवान्वित अनुभव करने लगा था, जैसे उसके अपने देश में स्त्रियों की उपलब्धियां शून्य हैं।

Droupadi Murmu and Westernised Leftist feminism

कमला हैरिस ने कहा था कि हो सकता है कि वो उपराष्ट्रपति के ऑफिस में आने वाली प्रथम महिला हैं, परन्तु वह अंतिम नहीं हैं। इस वक्तव्य को लेकर भारत का एक बहुत ही बड़ा वर्ग लगभग पागल हो गया था और महिला सशक्तिकरण के अलावा न जाने क्या क्या बकने लगा था। अंतरराष्ट्रीय और देशी अंग्रेजी मीडिया में तमाम लेख भी प्रकाशित हुए थे कि कमला हैरिस की जीत का भारत की महिलाओं के लिए क्या अर्थ है। जबकि भारत में स्त्रियों का समृद्ध इतिहास रहा है। वेदों में सूर्या सावित्री से लेकर वर्तमान में द्रौपदी मुर्मू तक महिलाओं की राजनीतिक, शैक्षणिक, धार्मिक, आध्यात्मिक उपलब्धियां असाधारण रही हैं।

फिर भी पश्चिमपरस्त वामपंथी फेमिनिज्म से ग्रसित लेखिकाएं या कार्यकर्ता पश्चिम की कमला हैरिस के उपराष्ट्रपति होने पर अधिक मोहित होती हैं, जबकि द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति चुने जाने पर "पद की गरिमा के अनुकूल फैसला न होने" का बहाना बना लेती हैं।

भारत में द्रौपदी मुर्मू अब महामहिम बन चुकी हैं, एवं वह एक ऐसे वर्ग से आती हैं, जहाँ से आकर इस पद तक पहुंचना साधारण उपलब्धि नहीं है। उसके मार्ग में यदि कोई बाधा है तो वही औपनिवेशिक गुलामी से ग्रस्त कुलीन वर्ग एवं फेमिनिस्ट लोग हैं जिन्हें धर्म एवं संस्कृति की चेतना से संपन्न हिन्दुओं से घृणा है।

भारत में इन दिनों कई ऐसी लेखिकाएं हैं जो कथित रूप से "वैश्विक बहनापे अर्थात यूनिवर्सल सिस्टरहुड" की बात करती हैं। अर्थात समूचे विश्व में महिलाओं का एक वर्ग होना चाहिए, समूचे विश्व की महिलाओं को एक दूसरे का दर्द समझना, वैश्विक बहनापे का उद्देश्य है। वो इस मिथक को तोड़ना चाहती हैं कि "महिला ही महिला की शत्रु होती है।"

भारत में इस वर्ग का मुख्य उद्देश्य है कि हर वर्ग की महिलाओं को एक साथ लेकर आया जाए क्योंकि हर स्त्री अपनी जाति, नस्ल, राष्ट्रीयता और वर्ग से परे शोषित ही है और उनका आम दुश्मन और कोई नहीं बल्कि पितृसत्ता है और उन्हें इससे लड़ने के लिए एक साथ आना चाहिए।

यही यूनिवर्सल सिस्टरहुड अर्थात वैश्विक बहनापा उन्हें हिलेरी क्लिंटन और कमला हैरिस की उपलब्धियों पर गर्व करना सिखाता है! परन्तु यही वैश्विक बहनापा है जो उन्हें अपने हिन्दू मूल्यों को धारण करने वाली स्त्रियों के अस्तित्व तक को स्वीकार करने से रोकता है। वह उन्हें ऐसी स्त्रियों की उपलब्धियों को अनदेखा करने के लिए बाध्य करता है जिन्होनें संघर्ष करके अपने लिए एक स्थान प्राप्त किया होता है। वह उन स्त्रियों की उपलब्धियों पर धूल डालकर बैठना पसंद करती हैं, जो उनके राजनीतिक विचारों की नहीं होती हैं।

हिन्दी में साहित्यिक रूप से अत्यंत समृद्ध पीढ़ी का नेतृत्व करने वाली उषा किरण खान से लेकर ज्योति चावला तक द्रौपदी मुर्मू पर मौन रह गयी हैं। मानों भारत में एक आदिवासी महिला को राष्ट्रपति पद पर बिठाकर कुछ ऐसा किया गया है जिसका न वो विरोध कर पा रही हैं और न समर्थन।

हालांकि कई ऐसी लेखिकाएं हैं, जो भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक विचारों से सहमत न हों परन्तु उन्होंने द्रौपदी मुर्मू जी को बधाई दी है, जैसे हेमलता माहिश्वर एवं युवा लेखिका योगिता यादव तथा मनीषा कुलश्रेष्ठ आदि। इसमें लोक कला की सशक्त आवाज जैसे मालिनी अवस्थी और गीता बेन राबरी के नाम शामिल हैं।

द्रौपदी मुर्मू को जब राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित किया गया था तो वह मंदिर गयी थीं और उन्होंने अपनी सांस्कृतिक एवं धार्मिक आस्था का प्रदर्शन किया था। उन्होंने न ही पितृसत्ता को कोसा, न ही भगवान को कोसा, और न ही राष्ट्र की अखंडता पर कोई प्रश्न उठाया, बल्कि धन्यवाद व्यक्त किया! जबकि यूनिवर्सल सिस्टरहुड की जो नायिकाएँ या प्रतीक हैं, वह सबसे पहले पितृसत्ता को गाली देती हैं।

कथित नारीवाद का झंडा उठाने वाली पश्चिमपरस्त लेखिकाएँ पति और पत्नी, भाई और बहन, माँ और बेटे, आदि को परस्पर विरोधी एवं एक दूसरे का शत्रु घोषित करती हैं। उनकी दृष्टि में वह सभी स्त्रियाँ जिन्होनें देश की अखंडता एवं धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दिया वह सभी पितृसत्तात्मक सोच की परिचालक हैं, उन्हें संघर्ष न करके या फिर इस्लामी आक्रमणकारियों से बचने के लिए जौहर न करके संधि का मार्ग निकालना चाहिए था, जैसा हमने फिल्म पद्मावत के दौरान बहस आदि में देखा था। यही कारण है कि वामपंथी फेमिनिस्ट द्रौपदी मुर्मू के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को लेकर सहज नहीं हो पा रही हैं।

स्त्री विमर्श का वैदिक संदर्भ

द्रौपदी मुर्मू एक ऐसे स्त्री विमर्श को लेकर सामने आयी हैं, जिसमें एकात्मकता है, देश की सहज लय है, धर्म और संस्कृति है, जिसमें आदिवासियों की भारतीय पहचान है। पश्चिमपरस्त वामपंथी फेमिनिज्म इन बातों को मानता नहीं है इसलिए फेमिनिस्ट्स के भीतर आत्महीनता है, अपनी पहचान को लेकर उनके भीतर नफरत है और इसी नफरत को वह कभी हिलेरी क्लिंटन को आदर्श बताकर तो कभी कमला हैरिस को आदर्श बताकर प्रदर्शित करती रहती हैं।

इसी नफरत के चलते वह सूर्या सावित्री को नकारती हैं, वह वेदों में वर्णित तमाम ऋषिकाओं को नकारती हैं, वह उस स्त्री विमर्श को नकारती हैं जो ऋग्वेद में ऋषिका रोमशा ने दिया था कि "स्त्री का रूपरंग ही उसकी पहचान नहीं है अपितु उसका ज्ञान उसकी पहचान है!" ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 126वें सूक्त के सातवें मन्त्र की रचयिता रोमशा लिखती हैं: "उपोप मे परा मृश मा मे दभ्राणि मन्यथाः। सर्वाहमस्मि रोमशा गन्धारीणामिवाविका।"

रोमशा के सम्बन्ध में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित ईकोफेमिनिज्म नामक पुस्तक में के. वनजा ने भी लिखा है। उन्होंने इस सूक्त के सन्दर्भ में लिखा है कि रोमशा अपने पति भावभव्य को उत्तर देते हुए कहती हैं कि हे राजन, जैसे पृथ्वी राज्यधारण एवं रक्षा करने वाली होती है वैसे ही मैं भी प्रशंसित रोमों वाली हूँ। मेरे समस्त गुणों, विचारों, मेरे कार्यों को अपने सामने छोटा न मानो।"(ईकोफेमिनिज्म- के. वनजा, पृष्ठ 39।)

रोमशा को स्त्री विमर्श का प्रथम स्वर मानते हुए सुमन राजे अपनी पुस्तक हिंदी साहित्य का आधा इतिहास में लिखती हैं कि जिस प्रकार रोमशा ने अपने पति से कहा है कि वह उनके रूप के स्थान पर गुणों पर ध्यान दें, वह स्त्री विमर्श का प्रथम स्वर है।

अर्थात वेदों में स्त्री स्वयं कह रही है कि मेरे कार्यों को समझा जाए, तो वहीं आज की फेमिनिस्ट ऐसी सभी महिलाओं द्वारा उत्पन्न विमर्श को नकारती हैं क्योंकि उन्हें वेदों को और हिन्दू पहचान को नकारना है। उन्हें पितृसत्ता द्वारा संचालित उस विमर्श का भाग बनना है जहां पर औरतों का स्थान पसली से बने हुए मनोरंजन के साधन के रूप में है या फिर खेती के रूप में है। वह उस विमर्श के साथ असहज हो जाती हैं जहाँ पर स्त्री एवं पुरुष परस्पर एक दूसरे के अस्तित्व का भाग हैं, अर्द्धनारीश्वर की अवधारणा है।

इसीलिए युनिवर्सल सिस्टरहुड वाली पश्चिमपरस्त वामपंथी महिलाएं मौन हैं। उन्हें डर है कि अगर द्रौपदी मुर्मु की प्रशंसा करेंगी तो वह हिन्दू संस्कृति की प्रशंसा हो जाएगी। बाकी विपक्ष का महिला नेतृत्व अपने पितृसत्तात्मक दलों द्वारा जारी की गयी एडवाइजरी के अनुसार चल रहा है।

यह भी पढ़ें: इंडिया गेट से: यह दार्जिलिंग समझौता क्या है?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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