Freebies: राज्यों की अर्थव्यवस्था के लिए घातक होगा रेवड़ियां बांटना
Freebies: विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में चुनाव किसी उत्सव से कम नहीं हैं। राजनीतिक दलों के लिए यह अवसर जहां सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करने का होता है वहीं जनता के लिए अपने भविष्य के निर्धारण को तय करना अवश्यम्भावी होता है किंतु बीते कुछ दशकों से चुनाव 'रेवड़ी कल्चर' को बढ़ावा देने वाले होते जा रहे हैं।
बजटीय आंकलन और राजस्व को होने वाले नुकसान से बेपरवाह सभी राजनीतिक दल अब मुफ्तखोरी को बढ़ावा देकर सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं। इस वर्ष के अंत में पांच राज्यों में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक दलों की ओर से ऐसी-ऐसी लोक-लुभावन योजनाएं जनता के समक्ष प्रस्तुत की जा रही हैं जिनकी सफलता पर संदेह तो होता ही है, साथ ही यह संशय भी उत्पन्न होता है कि यदि ईमानदारी से इन योजनाओं को क्रियान्वित किया भी गया तो संबंधित प्रदेश के आर्थिक नियोजन पर कितना अतिरिक्त भार पड़ेगा?

या इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि यदि योजनाएं यथार्थ के धरातल पर उतरें तो उससे राजकोषीय धन का कितना बोझ आम आदमी को टैक्स में रूप में चुकाना पड़ेगा। पहले से आर्थिक रूप से बीमारू राज्यों के लिए उक्त मुफ्तखोरी की योजनाओं का एलान निश्चित रूप से जनता से छलावा मात्र है क्योंकि उनके क्रियान्वयन के लिए न तो धन का प्रबंध राज्य के पास है और न ही केंद्र की ओर से अतिरिक्त धन की व्यवस्था की जा सकती है।
उदाहरण के लिए कर्नाटक में जीत से उत्साहित कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने मध्य प्रदेश में तीन माह पूर्व जबलपुर में प्रदेश की जनता को पांच गारंटी देते हुए चुनावी बिगुल फूंका था। 27 अगस्त, 2023 को पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इन्हीं पांच गारंटियों को बढ़ाकर 11 वचन कर दिए जिसमें महिलाओं को 1,500 रुपए प्रतिमाह, 500 रुपए में गैस सिलेंडर, 100 यूनिट बिजली बिल माफ तथा 200 यूनिट तक बिल हाफ, पुरानी पेंशन योजना की बहाली, किसानों का फसल कर्ज माफ, सिंचाई के पुराने बिजली बिल माफ, 5 हॉर्स पॉवर की मोटर का बिजली बिल माफी के साथ ही अन्य राजनीतिक वचन शामिल हैं।
कमलनाथ की इन घोषणाओं को काउण्टर करने के लिए शिवराज सरकार ने भी लोकलुभावन योजनाओं के लिए सरकारी खजाना खोल दिया। 10 अक्तूबर, 2023 से लाड़ली बहना योजना के तहत महिलाओं को प्रतिमाह 1,250 रुपए मिलेंगे जिसे आगे बढ़ाकर 1,600 रुपए करने की घोषणा भी हो चुकी है। इस लाड़ली बहना योजना के तहत अंततः 3,000 रुपए प्रतिमाह दिये जाने का प्रस्ताव है। इसके अलावा बिजली के बढ़े बिल सितम्बर में जीरो होंगे। महिलाओं को सावन में 450 रुपए में गैस सिलेंडर देने का वादा भी किया गया है जिसके अंतर्गत सरकार गैस एजेंसियों से जानकारी लेकर महिलाओं के खाते में 600 रुपए ट्रांसफर करेगी।
यह उपक्रम उस राज्य में हो रहा है जिसका वर्ष 2023-24 के लिए राजकोषीय घाटा 55,708 करोड़ रुपए है जो सकल राज्य घरेलू उत्पाद अर्थात जीएसडीपी का लगभग 4 प्रतिशत है। यह राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम, 2003 के अनुसार 3.5 प्रतिशत की सीमा से अधिक है। तमाम योजनाओं में से मात्र लाड़ली बहना योजना को ही लें और भविष्य में इसमें मिलने वाले 3,000 रुपए मासिक को आधार बनाएं तो योजना के तहत कुल भुगतान बढ़कर 3,800 करोड़ रुपए प्रतिमाह या 45,600 करोड़ रुपए प्रति वर्ष हो जाएगा जो राज्य के वार्षिक वित्तीय घाटे से थोड़ा ही कम है। अब इसके बाद किस योजना के मद में कितनी राशि आएगी, उक्त योजना धरातल पर कैसे उतरेगी, यह समझना कठिन नहीं है।
07 जुलाई, 2023 को कर्नाटक की नवनिर्वाचित सिद्धारमैया सरकार ने वित्त वर्ष 2024 के लिए बजट पेश किया जिसमें चुनाव पूर्व की गई पांच मुफ्त योजनाओं: गृह लक्ष्मी, गृह ज्योति, शक्ति, अन्न भाग्य और युवानिधि पर ध्यान केंद्रित किया गया जिससे कुल बजटीय खर्च 3,27,747 करोड़ रुपए हो गया है। यह पिछली बोम्मई सरकार के 3,09,182 करोड़ रुपए के बजट से 6 प्रतिशत अधिक है। उक्त बजट में पिछले आवंटन में कटौती के साथ सबसे महत्वपूर्ण कृषि, बागवानी, जल संसाधन, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और सहयोग की उपेक्षा की गई है। ये वे उपेक्षित क्षेत्र हैं जहां सरकार यदि ईमानदारी से जन-हितैषी कार्य करे तो चुनावी मौसम में मुफ्त रेवड़ियां बांटने और सत्ता में आने के बाद उनके क्रियान्वयन के लिए राज्य की आर्थिक सेहत से खिलवाड़ नहीं करना पड़ेगा।
राजस्थान में चल रही योजनाओं का मामला भी कुछ ऐसा ही है। आरबीआई के अनुसार, प्रदेश का कर्ज बढ़कर 4.77 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया है। इसमें 82 हजार करोड़ रुपए का गारंटेड लोन भी शामिल कर दें तो प्रदेश पर कुल कर्ज 5.59 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया है। वहीं कैग के अनुसार, बीते वित्तीय वर्ष में राज्य सरकार ने मई तक 8 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज और लिया था। राजस्थान सरकार साढ़े तीन साल में 1.91 लाख करोड़ रुपए का कर्ज, जिसमें गारंटेड लोन शामिल नहीं है, ले चुकी है। जबकि इससे पहले की सरकार ने 5 साल में 1.81 लाख करोड़ रुपए का कर्ज लिया था।
2019 में राजस्थान में प्रति व्यक्ति कर्ज 38,782 रुपए था जो 2022-23 के बजट में बढ़कर 70,848 रुपए हो गया है। पिछले वर्ष आरबीआई की एक रिपोर्ट ने राजस्थान सहित 10 राज्यों के वित्तीय हालत पर चिंता जताते हुए बिहार, केरल, पंजाब, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों को कर्ज के भारी बोझ तले दबा बताया था। यहां तक कि पंजाब को एक्ट्रा बजटरी बोरोइंग देने के लिए आरबीआई ने बैंकों को ही मना कर दिया था। आरबीआई के अनुसार, वर्ष 2026-27 तक पंजाब पर अपनी जीएसडीपी का 45 प्रतिशत से अधिक कर्ज होने का अनुमान है।
मुफ्त रेवड़ी कल्चर पर सर्वोच्च न्यायालय से लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक चिंता जता चुके हैं। यहां तक कि चुनाव आयोग भी राजनीतिक दलों के प्रति सख्ती बरतने की बात कह रहा है किन्तु यह संस्कृति चुनावी मौसम में बढ़ती ही जा रही है। दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु में डीएमके और एआईएडीएमके द्वारा खुले तौर पर रंगीन टेलीविजन, मंगलसूत्र, हाथ घड़ी, मोबाइल, लैपटॉप, स्कूटी बांटने से अनियंत्रित हुआ यह रेवड़ी कल्चर अब अर्थव्यवस्था पर बोझ बनता जा रहा है।
सरकारें यदि ईमानदारी से पांच वर्ष जनता के हितों को देखते हुए योजनाएं चलाएं तो मुफ्त रेवड़ियां बांटने की नौबत ही न आए। यदि योजनाएं अर्थव्यवस्था के अनुशासन में रहकर चलें तो परेशानी नहीं आएगी किन्तु यदि सत्ता हासिल करने के लिए योजनाओं को लाया जाए तो यह अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालेंगी। इसका विपरीत असर बाजार की सेहत पर भी पड़ेगा क्योंकि जब अन्न-जल से लेकर सभी मुफ्त होगा तो अर्थव्यवस्था चलायमान कैसे होगी?
राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे चुनाव प्रचार के दौरान वादे करते हुए केवल राजनीतिक पहलू पर विचार करना त्याग दें क्योंकि बजटीय आवंटन और संसाधन सीमित हैं और उन्हें अर्थव्यवस्था को भी ध्यान में रखना चाहिए। मुफ्त की योजनाओं में खर्च किये गए धन को यदि रचनात्मक रूप से रोजगार के अवसर पैदा करने, जल प्रबंधन के बुनियादी ढांचे के निर्माण तथा कृषि को प्रोत्साहन देने के लिये उपयोग किया जाए तो निश्चित रूप से राज्य में लोगों की प्रगति होगी और लोग अपने उद्यम से सुखी व संपन्न हो जाएंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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