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Dhirendra Shashtri: जातियों में बंटे बिहार में हिन्दुत्व की हुंकार?

मुखर रूप से हिन्दू राष्ट्र की बात करनेवाले बागेश्वरधाम वाले बाबा बिहार में भले राजनीतिक बयानबाजी के शिकार हो गये हों, लेकिन आम जनमानस अपने दुख दूर करने के लिए ही उनके दरबार में आयी थी।

Dhirendra Shashtri: The roar of Hindutva in Bihar divided on castes

बागेश्वरधाम वाले धीरेन्द्र शास्त्री और विवाद एक-दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। ऐसा कोई दिन नहीं बीतता जब पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के प्रवचन, बयान, टिप्पणी और चमत्कार को लेकर मुख्य धारा के मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक घमासान न मचे। मगर बिहार का उनका दौरा, उनसे मिलने और उन्हें सुनने पहुंचे श्रद्धालुओं की भारी संख्या, बाबा के बयान, गैर-भाजपा दलों की तीखी आलोचना आदि ने पूर्व के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए।

छतरपुर के पंडित धीरेंद्र शास्त्री देश भर में कथावाचन कार्यक्रम करते हैं। लेकिन बिहार में उनके कार्यक्रम की घोषणा होते ही विरोध शुरू हो गया। राजद नेता, मंत्री और लालू प्रसाद के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव ने सार्वजनिक घोषणा की कि वे धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को कार्यक्रम नहीं करने देंगे। उनके समर्थक बाबा को हवाई अड्डा से बाहर नहीं निकलने देंगे। इसके लिए उन्होंने बाकयदा डीएसएस नामक निजी सेना बना डाली। उन्होंने चेतावनी देते हुए यहां तक कह डाला कि बाबा मत भूलें कि बिहार में किनकी सरकार है।

मगर 13 मई को पटना जिला अंतर्गत नौबतपुर के तरेत मठ में बिना किसी बाधा के कार्यक्रम शुरू हुआ। पहले दिन से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचने लगे। राज्य के कोने-कोने से लोग नौबतपुर जाने लगे। पटना पहुंचने वाली ट्रेन में पैर रखने तक की जगह नहीं थी। यह सिलसिला अगले 17 मई तक जारी रहा। अनुमान लगाया जाता है कि पांच दिनों में करीब दस लाख लोग बाबा को सुनने नौबतपुर पहुंचे। लोगों की भीड़ और जनसमर्थन को देखकर विरोधी नेताओं की हिम्मत पस्त हो गई।

नौबतपुर में भी बाबा ने वही सब किया जिसके लिए वे जाने जाते हैं। पर्ची निकालकर लोगों के मन का सवाल जान लेना, अपने 'चमत्कार' का बखान करना, समस्याओं के समाधान के लिए सुझाव देना... यह सिलसिला चलता रहा। बीच-बीच में वे अपने प्रवचन के दौरान हिंदू, हिंदुत्व की रक्षा और 'हिंदू राष्ट्र' के लिए लोगों को जागरूक होने का आह्वान भी करते रहे। जाहिर है गैर-भाजपा दलों को यह सब बर्दाश्त नहीं होना था। इसलिए गैर-भाजपा दलों द्वारा बाबा के बयानों और टिप्पणियों की तीखी आलोचना शुरू हो गई।

इस क्रम में जहां नेताओं ने उन्हें भाजपा का एजेंट कहा, वहीं सोशल मीडिया पर धीरेंद्र शास्त्री के विरोध में गंदी-गंदी गाली दी गई, अपशब्दों से भरे अनगिनत वीडियो प्रसारित हुए। राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने कहा 'जिसका मन करता है, वही बाबा बन जाता है और फिर जेल चला जाता है। बाबा बागेश्वर को जेल में रहने की जरूरत है। धीरेन्द्र शास्त्री जेल में नहीं हैं, ये अफसोस की बात है। इन्हें कोई पूछता नहीं है, इसलिए ये कैसे अपनी पूछ बनाए रखें... इसी के लिए सब कुछ करते हैं। इनका बना रहना भारत की संत परंपरा के लिए घातक है।' बिहार सरकार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने तो गिरफ्तार करने तक का इशारा कर दिया। मंत्री सुरेंद्र यादव और अशोक चौधरी ने तो यहां तक कह डाला कि उनका हश्र भी आसाराम बापू जैसा होगा।

इसके प्रत्युततर में बाबा के पक्ष में भाजपा नेताओं ने भी आक्रामक बयान देना शुरू कर दिया। भाजपा नेता विजय सिन्हा ने कहा, 'संतों का विरोध करने वालों का अंत निश्चित है। बाबा बागेश्वर के खिलाफ गंदी भाषा का इस्तेमाल करने वालों के मुंह पर जनता कालिख पोतेगी।' दूसरी ओर बाबा के चमत्कार, हिंदुत्व जागरण के लिए उनके प्रयास की प्रशंसा करने वाले वीडियो की भी सोशल मीडिया पर बाढ़ आ गई।

देखा जाए, तो जातियों में बंटे बिहारी समाज के लिए धीरेंद्र शास्त्री प्रसंग ने सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक विश्लेषकों के सामने कई सवाल खड़ा कर दिया है। कुछ लोग बाबा बागेश्वर के बिहार दौरे को चुनाव पूर्व भाजपा की राजनीतिक तैयारी मानते हैं। उनका मानना है कि प्रखर हिंदुत्व की बात कर बाबा बिहार के हिंदू वोट को ध्रुवीकृत करने में मदद करेंगे।

तकनीकी रूप से भले ही इस तर्क में दम प्रतीत होता है, मगर व्यवहारिक और जमीनी तथ्य का विश्लेषण करने पर यह महज एक परिकल्पना प्रतीत होती है। इसमें संदेह नहीं कि धीरेंद्र शास्त्री के कार्यक्रम को लेकर बिहार भाजपा उत्साहित रही, लेकिन आम लोग बस अपनी निजी समस्या के समाधान की तलाश में बाबा के दरबार पहुंचे थे। इसमें न तो किसी भाजपा कार्यकर्ता का सहयोग था न ही किसी अन्य राजनीतिक संगठन का।

दरअसल, बाबा के 'चमत्कारों' का हाल के दिनों में जो अति-प्रचार हुआ है, उसने हर किसी के मन में उत्सुकता पैदा कर दी है। चूंकि बिहारी समाज दैवी आशीर्वाद, मंत्र-जप-पूजा-पाठ आदि के सहारे निजी समस्या के समाधान होने में विश्वास रखता है, इसलिए जब बाबा बिहार आए तो ऐसे लोग उनसे मिलने घर से निकल पड़े, क्योंकि हर किसी के लिए मध्य प्रदेश जाना संभव नहीं है। बाबा के दरबार से लौटे आम लोगों की टिप्पणी में हिंदू राष्ट्र या हिंदुत्व का कोई निशान नहीं मिलता। वे बस बाबा के चमत्कार और समस्या समाधान के लिए दिए गए सुझाव, उपाय आदि की बात कर रहे हैं। उनके दरबार से लेकर घण्टों रास्ते में खड़े रहकर जिस तरह से बिहार के लोगों ने बाबा के प्रति अपना प्रेम दिखाया उसका राजनीति से दूर दूर तक कोई मतलब नहीं था। इसलिए यह कहना कि बाबा के कार्यक्रम से लोगों के पोलिटिकल ओरिएंटेशन (उन्मुखता) में क्रांतिकारी परिवर्तन हो जाएगा, आधारहीन आकलन प्रतीत होता है।

सवाल है कि फिर बागेश्वर वाले बाबा को तमाम हिंदुत्ववादी लोगों का इतना समर्थन क्यों है? इसमें कोई संदेह नहीं कि देश भर में हिंदू नवजागरण की हवा चल रही है। बिहार भी इससे अछूता नहीं है। गांव से लेकर शहर तक, हर क्षेत्र में ऐसे लोगों की अब अच्छी खासी संख्या है जो हिंदू, हिंदुत्व और हिंदू संस्कृति के सामने मौजूद चुनौतियों को लेकर जागरूक हैं। कथित सेकुलरिज्म और उदारवाद के नाम पर हिंदुत्व के साथ होने वाले छल, गांव-गांव तक पहुंच रही मजहबी कट्टरता, हिंदुओं का धर्मांतरण, इस्लामिक संगठनों की कारगुजारी आदि को यह वर्ग बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं। चूंकि धीरेंद्र शास्त्री इस सब के खिलाफ बहुत साफ शब्दों में बोलते हैं, इसलिए हिंदुत्ववादी आम लोगों का उन्हें खुला समर्थन मिलता है।

बिहार में धीरेंद्र शास्त्री के कार्यक्रम को बेहद सफल बनाने में ऐसे लोगों का जबर्दस्त सहयोग रहा। ऐसे लोगों के सक्रिय सहयोग ने ही कार्यक्रम को प्रतिबंधित करने की बिहार सरकार की मंशा पर पानी फेर दिया। सरकार को पता चल गया था कि कार्यक्रम रोके जाने पर ये लोग, जोकि आम लोग हैं, किसी भी हद तक जा सकते हैं।

फिलहाल, बिहार में धीरेंद्र शास्त्री भले राजनीतिक विरोध और समर्थन का एक विषय बने हुए हैं, लेकिन एक बात साबित हो गयी है कि बिहार में अब हिंदुत्व के सामने खड़ी चुनौतियां एक ठोस मुद्दा है, जिसे लम्बे समय तक ठंढे बस्ते में नहीं रखा जा सकता।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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