पुस्तकें कराती हैं आत्मबोध और राष्ट्रबोध
नई दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला 2026 की थीम 'भारतीय सैन्य इतिहास: शौर्य एवं प्रज्ञा' केवल एक विषय नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत स्मृति और राष्ट्रीय चेतना का सशक्त उद्घोष है। यह थीम हमारे सैन्य इतिहास के उन स्वर्णिम अध्यायों को सामने लाती है, जहाँ रणभूमि में अदम्य साहस और निर्णयों में गहन बौद्धिक प्रज्ञा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने संदेश में इस थीम को अत्यंत सराहनीय बताया है। उन्होंने कहा कि यह विषय भारत की गौरवशाली परंपराओं, अपराजेय साहस और समृद्ध बौद्धिक विरासत को रेखांकित करता है। वास्तव में, भारतीय सैन्य इतिहास केवल युद्धों और विजय-पराजय की कथा नहीं है, बल्कि रणनीति, नैतिकता, नेतृत्व और कर्तव्यबोध की जीवंत पाठशाला रहा है।

प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक भारत की सैन्य परंपरा ने यह सिद्ध किया है कि शक्ति का वास्तविक स्वरूप विवेक से संचालित होता है। चाणक्य की अर्थनीति से लेकर शिवाजी महाराज की गुरिल्ला रणनीति, और स्वतंत्र भारत की सेनाओं की आधुनिक युद्ध-कुशलता-हर चरण में 'शौर्य' के साथ 'प्रज्ञा' की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।
पुस्तक मेला 2026 की यह थीम विशेष रूप से युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। यह उन्हें इतिहास से सीख लेने, राष्ट्रभक्ति को भावनात्मक नारे से आगे बढ़ाकर कर्तव्य और अनुशासन के रूप में समझने की दिशा देती है। साथ ही, यह संदेश भी देती है कि सशक्त राष्ट्र वही होता है, जो अपने अतीत को जानता, समझता और उससे भविष्य की दिशा तय करता है।
12 जनवरी, 2026 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा नई दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री संग्रहालय में चयनित 43 युवा लेखकों से किया। उन्हें सार्थक पुस्तकें लिखने के लिए मेंटरशिप अवधि का भरपूर लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित किया जो देश के युवाओं को पढ़ने, लिखने और ज्ञान के साथ गहराई से जुड़ने के लिए प्रेरित करें। उन्होंने शोध सामग्री तक पहुंच के महत्व पर जोर दिया और निर्देश दिया कि राष्ट्रीय पुस्तक ट्रस्ट (एनबीटी) के माध्यम से भौतिक और डिजिटल दोनों संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि लेखकों को 'एक राष्ट्र, एक सदस्यता' (ओएनओएस) पहल के तहत संसाधनों तक पहुंच प्रदान की जानी चाहिए। उनके अकादमिक और शोध संबंधी सहयोग को पुख्ता करने के लिए, उन्होंने सुझाव दिया कि चयनित लेखकों को अपने-अपने क्षेत्रों के केंद्रीय विश्वविद्यालयों से संबद्ध किया जाए ताकि वे अपनी किताबों को तैयार कर सकें।
धर्मेंद्र प्रधान का यह जोर कि युवा लेखक मेंटरशिप अवधि का अधिकतम लाभ उठाकर सार्थक और प्रेरक पुस्तकें लिखें, अत्यंत प्रासंगिक है। आज के डिजिटल और त्वरित सूचना के युग में गहन शोध, तथ्यात्मक प्रामाणिकता और विचारों की स्पष्टता पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गई है। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय पुस्तक ट्रस्ट (एनबीटी) के माध्यम से भौतिक और डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता तथा 'एक राष्ट्र, एक सदस्यता' (ओएनओएस) पहल के तहत शोध सामग्री तक पहुंच सुनिश्चित करने का निर्देश एक दूरदर्शी कदम है।
केंद्रीय विश्वविद्यालयों से चयनित लेखकों को जोड़ने का सुझाव इस योजना को अकादमिक मजबूती प्रदान करता है। इससे लेखन केवल व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित न रहकर शोध, विमर्श और बौद्धिक परंपरा से जुड़ सकेगा। यह प्रयास युवा लेखकों को वैश्विक मानकों के अनुरूप तैयार करने में सहायक होगा।
सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पीएम-युवा 3.0 देश की विविधता को उसकी वास्तविक शक्ति के रूप में स्वीकार करता है। विभिन्न पृष्ठभूमियों से आए युवा लेखकों की ऊर्जा, आत्मविश्वास और आकांक्षाएं 'विकसित भारत' के सपने को शब्दों का आधार देती हैं। यह योजना यह भी सिद्ध करती है कि सरकार केवल पाठ्यक्रम और परीक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि विचार, संवाद और सृजनशीलता को राष्ट्र की प्रगति का मूल मानती है।
10 जनवरी,2026 को नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला (एनडीडब्ल्यूबीएफ) 2026 का उद्घाटन केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की बौद्धिक चेतना, बहुभाषी परंपरा और राष्ट्रबोध का सशक्त उत्सव है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा इस विश्वविख्यात मेले का उद्घाटन और वीर सुरेंद्र साई तथा संबलपुर के शहीदों को समर्पित पुस्तक 'कुडोपाली की गाथा: 1857 की अनकही कहानी' का बहुभाषी विमोचन-इस आयोजन को ऐतिहासिक और भावनात्मक दोनों स्तरों पर विशिष्ट बनाता है।
इस कार्यक्रम के दौरान श्री प्रधान ने "कुडोपाली की गाथा: 1857 की अनकही कहानी" नामक पुस्तक का विमोचन किया, जो बांग्ला, असमिया, पंजाबी, मलयालम, उर्दू और मराठी भाषाओं में उपलब्ध है। कुडोपाली की गाथा पर एक वीडियो भी प्रदर्शित किया गया।
आज जब भारत आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर है, ऐसे समय में 'भारतीय सैन्य इतिहास: शौर्य एवं प्रज्ञा' जैसी थीम न केवल प्रासंगिक है, बल्कि अत्यंत आवश्यक भी। यह पुस्तक मेले को केवल साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मचिंतन का मंच बना देती है-जहाँ कलम, विचार और इतिहास मिलकर राष्ट्रनिर्माण की चेतना को मजबूत करते हैं।
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