Delhi Snooping: विजिलेंस की आड़ में राजनीतिक जासूसी

अपने विरोधियों की जासूसी करवाने के लिए अलग अलग तरह के हथकंडे इस्तेमाल किए जाते रहे हैं। इनमें सबसे ज्यादा हथियार फोन टैपिंग का रहा है। दिल्ली के उप राज्यपाल ने ऐसे ही एक मामले में सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं।

Delhi Snooping case Political espionage in the guise of vigilance

Delhi Snooping: जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल से ही न सिर्फ फोन टैपिंग के आरोप लगते रहे बल्कि फोन टैपिंग होती भी रही| राम कृष्ण हेगड़े को मुख्यमंत्री पद से और चन्द्रशेखर को प्रधानमंत्री पद से फोन टैपिंग के मामलों में ही इस्तीफे देने पड़े थे| फोन टैपिंग जासूसी के लिए ही की जाती है| लेकिन अब एक नए मामले में दिल्ली सरकार ने अपने विरोधियों की जासूसी करने और उनके फोन टैप करवाने के लिए विजिलेंस विभाग में बाकायदा एक यूनिट ही खोल दी| जिसमें आईबी और अर्धसैनिक बलों के 17 रिटायर्ड अधिकारियों को कांट्रेक्ट पर नियुक्त किया गया| जब विजिलेंस डिपार्टमेंट को पता चला कि यह यूनिट तो राजनीति जासूसी के लिए बनाई गयी है, तो डिपार्टमेंट की शिकायत पर मुख्यमंत्री ने आनन फानन में यूनिट ही बंद कर दी|

Delhi Snooping case Political espionage in the guise of vigilance

सरकारों पर अपने राजनीतिक विरोधियों का फोन टैपिंग करवाने के आरोप लगते रहे हैं| लेकिन देश के इतिहास में यह पहला मामला है जहां अपने राजनीतिक विरोधियों की जासूसी के लिए विशेष यूनिट खोल कर सरकारी धन का दुरूपयोग किया गया| दिल्ली के उप राज्यपाल विनय सक्सेना ने दिल्ली सरकार के इस निर्णय की सीबीआई की जांच के आदेश दिए हैं|

वैसे तो विनय सक्सेना केजरीवाल सरकार के खिलाफ कई मामलों में जांच के आदेश दे चुके हैं, जिनकी जांच चल भी रही है| आम आदमी पार्टी ने उन सब आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है, लेकिन यह मामला अलग है| इस मामले में जांच की इजाजत खुद सीबीआई ने मांगी थी|

असल में दिल्ली सरकार में एक अधिकारी ने सीबीआई को चिठ्ठी लिख कर बताया था कि जैसे भ्रष्टाचार की शिकायत मिलने पर केजरीवाल सरकार ने आनन फानन में अपनी शराब नीति वापस ले ली थी, ठीक उसी तरह 2016 में विजिलेंस डिपार्टमेंट की शिकायत पर केजरीवाल सरकार ने विरोधियों की जासूसी करने के लिए बनाया यूनिट बंद कर दी थी, जिस पर जनता के धन का करोड़ों रूपए खर्च किया गया था| सीबीआई ने खुद से शुरुआती जांच की तो आरोप सही पाए गए, आगे जांच के लिए सीबीआई ने उपराज्यपाल से केस दर्ज करने की इजाजत मांगी थी| अपनी रिपोर्ट में खुद सीबीआई ने उस विशेष यूनिट द्वारा राजनेताओं की की जासूसी करने की बात कही है|

आम आदमी पार्टी ने 2015 में सत्ता में आने के बाद राजनीतिक जासूसी करवाने के लिए यह यूनिट विजिलेंस डिपार्टमेंट के तहत बनाया था, जिसका नाम फीडबैक यूनिट रखा गया| 29 सितंबर 2015 को मुख्यमंत्री केजरीवाल ने खुद कैबिनेट में फीडबैक यूनिट बनाने का प्रस्ताव रखा, इसके साथ कोई कैबिनेट नोट नहीं दिया गया| फीडबैक यूनिट के गठन के वक्त एक करोड़ रुपये दिए गए| इस फंड का नाम सीक्रेट सर्विस फंड रखा गया| यूनिट का हेड भी पैरामिलिट्री फोर्स से रिटायर्ड अधिकारी को बनाया गया था|

फरवरी 2016 से फीडबैक यूनिट ने काम करना शुरू किया, उस वक्त इसमें 17 लोग काम करते थे, ये सभी अनुबंधित कर्मचारी थे, जो सभी पैरामिलिट्री फोर्स और आईबी से रिटायर्ड थे| फीडबैक यूनिट ने 700 केसों की जांच की, इनमें आधे मामले राजनीतिक थे| जब विजिलेंस अधिकारियों को पता चला कि फीडबैक यूनिट का इस्तेमाल नेताओं की जासूसी के लिए किया जा रहा है, तो उन्होंने इसकी शिकायत दर्ज की, जिस पर आनन फानन में इस यूनिट को बंद कर दिया गया|

हालांकि रिकार्ड मौजूद है कि खुद मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने कैबिनेट बैठक में फीडबैक यूनिट बनाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन उपराज्यपाल विनय सक्सेना ने सीबीआई को उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केस दर्ज करने की इजाजत दी है| अब पता नहीं कि ऐसा क्यों किया गया, आने वाले दिनों में जब जांच शुरू होगी, तो स्वाभाविक है कि उप मुख्यमंत्री सिसोदिया नहीं, बल्कि खुद केजरीवाल भी जांच के घेरे में आयेंगे| वैसे सिसोदिया के साथ ही छह अन्य लोगों के खिलाफ भी केस दर्ज होगा, जिसमें एक आईएएस अधिकारी भी शामिल है|

अपने विरोधियों की जासूसी करवाने के लिए अलग अलग तरह के हथकंडे इस्तेमाल किए जाते रहे हैं| इनमें सबसे ज्यादा हथियार फोन टैपिंग का रहा है| फोन टैपिंग की शुरूआत तो पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जमाने में ही हो गई थी| उस समय यह आरोप लगाने वाले कोई और नहीं खुद संचार मंत्री रफी अहमद किदवई थे, जिन्होंने गृहमंत्री सरदार पटेल पर आरोप लगाया था| सेना प्रमुख जनरल केएस थिमाया ने 1959 में कुछ ऐसा ही खुलासा किया था| सेना के दो शीर्ष अफसरों के फोन टैप होने की खबर बाहर आई थी| 1962 में नेहरू सरकार के ही एक और मंत्री टीटी कृष्णामाचारी ने फोन टेप होने का आरोप लगाया था|

1988 में रामकृष्ण हेगड़े को फोन टैप मामले में ही कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था| 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को फोन टैपिंग एवं जासूसी प्रकरण के आरोप के चलते कांग्रेस द्वारा समर्थन वापस लेने पर सत्ता से बाहर होना पड़ा था| 2000 के दशक में सपा नेता मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह भी फोन टेपिंग का शिकार बने थे| 2007 में दिग्विजय सिंह का फोन टैप हुआ था| 2007 में नीतीश कुमार का भी फोन टैप हुआ था, फिर 2013 में खुद उन पर फोन टैपिंग का आरोप लगा|

यूपीए सरकार में पी. चिदंबरम जब गृहमंत्री थे, तो उन्होंने दिग्विजय सिंह, नीतीश कुमार, शरद पवार और माकपा नेता प्रकाश करात के फोन टैप करवाए थे| अरुण जेटली और ए.के एंटनी तक के फोन टैप हुए| वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के दफ्तर में मॉनिटरिंग डिवाइस मिला था| जून 2011 में वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी और गृह मंत्री पी चिंदबरम में विवाद चल रहा था| तब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिठ्ठी लिख कर कहा था कि उन्हें संदेह है कि उनके ऑफिस की जासूसी हो रही है| 2013 में हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल पर कांग्रेस नेता वीरभद्र सिंह ने फोन टैपिंग का आरोप था|

2018 में आरटीआई के जरिए खुलासा हुआ था कि यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान केंद्र सरकार ने 7500 से 9000 फोन कॉल्स पर नजर रखने के आदेश जारी किए थे, इसके अलावा 500 ईमेल्स की भी निगरानी की जाती थी| 2019 में ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर फोन टैपिंग का आरोप लगाया| 2021 में अमेरिकी अखबार 'द वॉशिंगटन पोस्ट' की एक खबर ने भारत में सियासी भूचाल ला दिया था| प्राइवेट इस्राइली सॉफ्टवेयर 'पेगासस' का इस्तेमाल कर भारत में करीब 300 लोगों की जासूसी की गई| इनमें मंत्री, राजनेता, जज और पत्रकार भी शामिल थे|

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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