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Delhi Services: दिल्ली के प्रशासन पर नए कानून से उठते सवाल

Delhi Services: 19 मई 2023 को केन्द्र की मोदी सरकार ने एक अध्यादेश (ordinance) निकाला जो सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय को बदलने के लिए था। सुप्रीम कोर्ट ने लंबी सुनवाई के बाद कहा था कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सरकार को मात्र तीन विषयों भूमि, पुलिस और प्रशासन को छोड़कर सभी विषयों पर, प्रशासनिक दृष्टि से नियंत्रण रखने का अधिकार है।

अध्यादेश में सेक्शन 3 ए के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया था कि दिल्ली विधानसभा को संविधान के शेड्यूल 7 लिस्ट एंट्री नंबर 41 में प्रदत्त कोई भी अधिकार प्राप्त नहीं होंगे, जो कि राज्य की सेवाओं से संबंधित है। अध्यादेश का सेक्शन 3 यह भी स्पष्ट करता था कि यह प्रावधान लागू होगा, भले ही इसके पूर्व न्यायालय से किसी तरह की डिक्री, आदेश अथवा कोई निर्णय इसके विरुद्ध आया हो।

delhi services bill Questions arising over new law on the Delhi administration

स्पष्ट है कि अध्यादेश में यह प्रावधान इसलिए किया गया था ताकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय को निष्प्रभावी किया जा सके। इस अध्यादेश को कानून बनाने के लिए केन्द्र सरकार गवर्नमेंट ऑफ़ एनसीटी ऑफ दिल्ली (अमेंडमेंट) बिल 2023 लेकर आयी। 3 अगस्त को लोकसभा से पारित होने के बाद यह बिल 7 अगस्त को राज्यसभा से भी पारित हो गया। अब यह विधेयक राष्ट्रपति के पास उनके हस्ताक्षर के लिए भेजा जाएगा और शीघ्र ही यह कानून का रूप ले लेगा।

लेकिन जो विधेयक लोकसभा और राज्यसभा में भी पारित हुआ है उसमें केन्द्र सरकार के अध्यादेश में उल्लेखित विषय की कोई चर्चा नहीं है। स्पष्ट है कि केंद्र सरकार भी सर्वोच्च न्यायालय से किसी तरह का टकराव नहीं चाहती थी। इस विधेयक का जो सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है वह यह है कि इस विधेयक के माध्यम से "राष्ट्रीय राजधानी नागरिक सेवा प्राधिकरण" (National Capital Territory Civil Services) की स्थापना की गई है और पूरे विवाद का यही सबसे बड़ा मुद्दा है।

इस प्राधिकरण यानी अथॉरिटी के माध्यम से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सरकार को लगभग पूरी तरह से निर्भर कर दिया गया है। कहने के लिए तो दिल्ली का मुख्यमंत्री इस प्राधिकरण का प्रमुख होगा किंतु इसमें दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव (गृह) भी सम्मिलित होंगे। स्वाभाविक रूप से निर्णय बहुमत से लिया जाएगा और यदि मुख्यमंत्री और दोनों सचिवों के बीच में टकराव होता है तो दोनों सचिव जो निर्णय लेंगे वही अंतिम निर्णय होगा। मतलब यह कि संभवतः दिल्ली अकेला राज्य होगा जहां नौकरशाही राजनीतिक नेतृत्व के निर्णय को बदल सकेगी।

इतना ही नहीं कोई भी मीटिंग बुलाने के लिए मुख्यमंत्री की सहमति आवश्यक नहीं होगी और दोनों सचिव मीटिंग बुला सकते हैं और 3 में से 2 होने के कारण कोई भी निर्णय ले सकते हैं। इसमें यह भी प्रावधान है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली नागरिक प्राधिकरण द्वारा सर्वसम्मति से या बहुमत से लिए गए निर्णय को दिल्ली के उपराज्यपाल के पास भेजा जाएगा और उपराज्यपाल के ऊपर यह बाध्यता नहीं होगी कि वह इस निर्णय को स्वीकार करें। उप राज्यपाल इस निर्णय के विरुद्ध भी निर्णय ले सकते हैं और वही अंतिम निर्णय होगा।

इस तरह से इस विधेयक के अंतर्गत दिल्ली के मुख्यमंत्री के नियुक्ति, विधान और प्रशासन संबंधी लगभग सारे अधिकार समाप्त कर दिए गए हैं। इसके आगे सेक्शन 45 डी में इससे भी अधिक कड़े प्रावधान, केंद्र सरकार के पक्ष में और दिल्ली राज्य सरकार के विरुद्ध किए गए हैं। सेक्शन 45 डी के अंतर्गत यह प्रावधान है कि वर्तमान कानून के अंतर्गत नियुक्त किए गए किसी भी तरह के कमीशन, कमेटी, वैधानिक संगठन इत्यादि, जो दिल्ली सरकार द्वारा नियुक्त किए गए हैं, उन्हें बदलकर राष्ट्रपति (केंद्र सरकार) द्वारा नियुक्त किया जाएगा। सेक्शन 45 एच में यह प्रावधान किया गया है कि यदि कोई भी नियुक्ति दिल्ली विधानसभा के द्वारा बनाए गये किसी नियम के तहत की गई है तो भी सेक्शन 45 एच के अंतर्गत दिल्ली के उपराज्यपाल उसे बदल सकते हैं और नयी नियुक्ति कर सकते हैं।

अब प्रश्न यह है कि यदि किसी मुख्यमंत्री के पास कानून बनाने, प्रशासन चलाने और भूमि का अधिकार नहीं है तो क्या उसके अस्तित्व का कोई तात्पर्य है? लोकतंत्र के चार स्तंभ में से दो, यानी विधायिका और कार्यपालिका का कार्य राज्य सरकार या केंद्र सरकार के पास होता है। इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सरकार के पास उल्लेख करने लायक संभवत कोई भी विधायी अधिकार नहीं बचता है। पुलिस, प्रशासन और भूमि उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर होने के कारण प्रशासनिक अधिकार भी लगभग नगण्य हैं। नागरिक सुविधाओं को चलाने का कार्य नगर निगम का है और उसके लिए कर संकलन भी वही करती है। सच्चाई तो यह है कि वर्तमान स्थिति में दिल्ली के एक पार्षद के पास संभवत: दिल्ली विधायक से अधिक अधिकार हैं। ऐसे में दिल्ली में विधानसभा के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाता है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में चुनी हुई सरकार होनी चाहिए या नहीं? इस पर अनेक वर्षों तक बहस चलती रही। अगर हम दिल्ली राज्य का इतिहास देखें तो 1951 से 1956 तक यहां पर मुख्यमंत्री का प्रावधान था। उसके बाद 1956 से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सरकार का सारा दायित्व और अधिकार केंद्र के पास चला गया। दिल्ली का प्रशासन सीधे केंद्र सरकार द्वारा उपराज्यपाल के माध्यम से चलाया जाता रहा। दिल्ली का अस्तित्व कुछ ऐसा ही था जैसे कि चंडीगढ़ का है, या अंडमान और निकोबार का है। यहां पर कोई चुनी हुई सरकार नहीं थी और लेफ्टिनेंट गवर्नर के पास ही सारी शक्तियां थी। यदि हम दिल्ली के इतिहास को देखें तो लगभग 37 वर्ष तक दिल्ली में कोई मुख्यमंत्री नहीं था और न ही राज्य सरकार या राज्य विधायिका का कोई प्रावधान था।

1952 से 1956 तक दिल्ली में दो मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश और सरदार गुरुमुख निहाल सिंह रहे। 1 नवंबर 1956 को दिल्ली के मुख्यमंत्री का पद समाप्त कर दिया गया। फिर दिसंबर 1993 में, जब दिल्ली को राज्य का दर्जा दिया गया, दिल्ली राज्य के अधिकार बहुत सीमित रखे गये। 2 दिसंबर 1993 को मदन लाल खुराना से प्रारंभ करके अरविंद केजरीवाल तक कुल 5 मुख्यमंत्री हुए, जिसमें से श्रीमती शीला दीक्षित सबसे लंबे समय तक 15 वर्ष तक मुख्यमंत्री रहीं। इन 30 वर्षों के दौरान अधिकारों को लेकर इस तरह का विवाद किसी भी मुख्यमंत्री के कार्यकाल में नहीं हुआ। लेकिन अरविंद केजरीवाल के कार्यकाल में विभिन्न कारणों से केंद्र से लगातार टकराव होता रहा।

केन्द्र और दिल्ली सरकार के बीच विवाद होने के मुख्यतः दो कारण रहे हैं: पहले, संवैधानिक और उचित कारण और दूसरे, राजनैतिक। पहला उचित इसलिए कि कोई किसी भी प्रदेश का मुख्यमंत्री है तो उसके पास समानुपातिक अधिकार भी होने चाहिए। प्रदेश का मुख्यमंत्री केवल दिखाने के लिए नहीं होना चाहिए। लेकिन यहां एक राजनैतिक प्रश्न आता है, जो अमित शाह ने लोकसभा में भी पूछा कि जब अरविंद केजरीवाल ने चुनाव लड़ा तो उन्हें अच्छी तरह से पता था कि दिल्ली के पास सीमित अधिकार हैं और उसको समझते हुए उन्होंने यहां के मुख्यमंत्री का पद ग्रहण किया। तो अब विवाद के लिए स्थान कहां है?

हालांकि यह स्वाभाविक राजनैतिक और मानवीय प्रक्रिया है कि कोई व्यक्ति जहां रहता है वह अधिक से अधिक अपने अधिकार क्षेत्र को बढ़ाना चाहता है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अपने अधिकारों को बढ़ाने की बात कर रहे हैं तो यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन इसके साथ साथ यह भी सर्वविदित है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री द्वारा उठाए गए यह अधिकारों के प्रश्न भले ही उचित हो लेकिन राजनैतिक विश्लेषक दिल्ली को लेकर इसे संभव नहीं मानते।

स्वतंत्र राजनैतिक विश्लेषकों का कहना यह है कि दिल्ली जैसे अति संवेदनशील शहर की बागडोर किसी मुख्यमंत्री को देने में कई तरह की बाधाएं हैं। इसलिए बीते 75 साल से यह विवाद का विषय बना हुआ है। दिल्ली भारत की राजधानी है और यहां पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय सरकार के अलावा दुनिया भर के देशों के राजदूतावास, उच्च आयोग तथा अनेक विश्व स्तर की संस्थाओं के शाखा कार्यालय या मुख्यालय हैं। ऐसी स्थिति में एक प्रदेश के मुख्यमंत्री को इस प्रदेश या इस राजधानी नगर की बागडोर देना उचित नहीं है।

दिल्ली एक "नगर राज्य" (city state) है और इसका प्रशासन सिंगापुर की तरह एकल सरकार के पास ही होना चाहिए। बाकी नागरिक सुविधाओं का प्रबंधन करने के लिए दिल्ली नगर निगम है। वहां पर उनके चुने हुए प्रतिनिधि यानी पार्षद हैं। भूमि, प्रशासन और पुलिस जैसे महत्वपूर्ण विषय वैसे भी केंद्र सरकार के पास है तो फिर विधानसभा के पास कुछ खास करने के लिए है ही नहीं तो फिर दिल्ली में विधानसभा का औचित्य पर ही प्रश्न उठता है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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