Delhi Bill: क्या राज्यसभा में संभावित हार को जीत में बदल पाएगा विपक्ष?
संसद के इस मानसून सत्र में अब तक दो मुद्दे छाए रहे। पहला, मणिपुर की घटनाओं पर सदन के भीतर प्रधानमंत्री के बयान की मांग और दूसरा, दिल्ली सेवा बिल 2023 पर पक्ष-विपक्ष की जोर आजमाइश। दिल्ली सेवा विधेयक लोकसभा में पास हो चुका है, अब बारी राज्यसभा की है, जहां विपक्षी दलों की अग्नि परीक्षा होने वाली है।

बीजू जनता दल ने विधेयक पर केंद्र सरकार का समर्थन करने का ऐलान कर आम आदमी पार्टी की टेंशन पहले ही बढ़ा दी थी, बाद में तेलुगू देशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू ने सरकार को समर्थन देकर उसे सकते में डाल दिया।
तमाम तरह के सुलह समझौते कर विधेयक के विरोध में समर्थन जुटाने में लगे आम आदमी पार्टी के मुखिया विपक्षी गठबंधन में शामिल रालोद के जयंत चौधरी के असमंजस को लेकर तो परेशान हैं ही, विपक्ष के तीन बड़े नेताओं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वशिष्ठ नारायण सिंह और शिबू सोरेन के गंभीर रूप से अस्वस्थ होने के चलते भी वो चिंता में हैं। विधेयक के समर्थन में सत्ता पक्ष 130 प्लस का दावा कर रहा है वही विपक्ष को यह डर सता रहा है कि उनके समर्थक सांसदों की संख्या तीन अंकों तक पहुंच पाएगी अथवा नहीं।
लोकसभा में भाजपा का बहुमत देखते हुए दिल्ली सरकार संशोधन विधेयक 2023 का पारित होना तय था लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं होने के कारण इसका पारित होना प्रारंभ में एक चुनौती की तरह माना जा रहा था। उच्चतम न्यायालय द्वारा अध्यादेश पर रोक लगाने से इनकार किए जाने के बाद दिल्ली सरकार के मुखिया सभी विपक्षी दलों के दरवाजे खटखटा कर समर्थन जुटा रहे हैं। लोकतंत्र और उसके संघीय ढांचे की दुहाई देकर जिस कांग्रेस पार्टी के साथ वे दिल्ली और पंजाब में सीधा मुकाबला कर रहे हैं, उससे भी हाथ मिलाया और समर्थन की शर्तों के साथ ताजा-ताजा बने आईएनडीआईए (इंडिया) गठबंधन का हिस्सा बन गए। लेकिन जैसे-जैसे समय आगे बढ़ रहा है राज्यसभा में बिल के विरोध में खड़े होने वाले सांसदों की संख्या कम होती जा रही है।
वर्तमान में राज्यसभा का नंबर गेम देखें तो राज्यसभा के सांसदों की कुल संख्या 245 है। सात सीटें खाली हैं। मौजूदा संख्या बल 238 है। बहुमत का आंकड़ा 120 का बनता है। एनडीए के पास बीजेपी के 92 सांसद और साथी दलों के 11 सांसद हैं। यानी बीजेपी और साथी दलों के मिलाकर कुल 103 सांसद है। पांच सांसद नॉमिनेटेड है जबकि एक अन्य निर्दलीय सांसद का भी बीजेपी को समर्थन प्राप्त है। इस तरह कुल मिलाकर 109 सांसद राजग की ओर से विधेयक के पक्ष में खड़े हैं। भाजपा को बीजू जनता दल, वाई एस एस आर, बहुजन समाज पार्टी, तेलुगू देशम पार्टी जैसे दलों का समर्थन प्राप्त है। इन पार्टियों के समर्थन से सत्ता के पक्ष में खड़े होने वाले सांसदों की संख्या 130 से अधिक बताई जाती है।
इसी तरह बिल के विरोध में बात करें तो कांग्रेस के 30, तृणमूल कांग्रेस के 14, डीएमके के 10, आम आदमी पार्टी के 10, बीआर एस के 7, राष्ट्रीय जनता दल के 6, सीपीएम के 5, जेडीयू के 4, एनसीपी के 4, एसपी के 2, शिवसेना के 3, सीपीआई के 2, झारखंड मुक्ति मोर्चा के 12, आईयूएमएन 1, एमडीएम 1, केसीएन 1, आरएलडी 1, और 2 निर्दलीय यानी कुल 108 सांसदों का समर्थन प्राप्त है।
मालूम हो कि हाल ही में राज्यसभा के 11 सीटों के लिए हुए चुनाव में बीजेपी के 5 और टीएमसी के 6 सांसद चुने गए। कांग्रेस को एक सीट का नुकसान हुआ। राज्यसभा में कांग्रेस के सांसद अब घटकर मात्र 30 रह गए हैं। 24 जुलाई के बाद जो सात सीटें खाली हुई उनमें जम्मू कश्मीर से चार, उत्तर प्रदेश से एक और दो मनोनीत सीट शामिल हैं।
बीते शुक्रवार को संसद के गलियारे में समर्थन और विरोध को लेकर कई तरह की अफवाहों का बाजार भी गरम रहा। बताया जाता है कि राज्यसभा में कुछ सांसद गैर हाजिर होने का मन बना चुके हैं। जिनके गैर हाजिर होने की आशंका है उनमें एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल का नाम लिया जा रहा है, वहीं जेडीएस के भी उपस्थित नहीं होने की बात की जा रही है। राष्ट्रीय लोक दल के नेता जयंत चौधरी का रुख साफ नहीं है। पूर्व के अनुभव भी इसी बात के संकेत दे रहे हैं कि रालोद नेता ऐन वक्त पर क्या रणनीति अख्तियार करेंगे यह उनके निजी और दलीय लाभ हानि पर निर्भर करता है। इस बीच विपक्ष के 3 बड़े नेताओं के अस्वस्थ होने की भी खबर है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह, वशिष्ठ नारायण सिंह और झारखंड मुक्ति मोर्चा के शिबू सोरेन फिलहाल चिकित्सकीय देखरेख में है। सदन की कार्यवाही में इनके शामिल होने को लेकर भी आशंकाएं जताई जा रही है।
कांग्रेस पार्टी ने बिल के विरोध में समर्थन तो दे दिया है लेकिन पार्टी के भीतर आम सहमति न बनने का पेच भी अहम है। कांग्रेस के दिल्ली और पंजाब के नेता ऊपरी मन से हाईकमान का आदेश भले स्वीकार कर रहे हो लेकिन वह अंदर ही अंदर आम आदमी पार्टी के साथ खड़े होने पर असहज महसूस कर रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित तो खुलकर इस आशय का बयान मीडिया में भी दे चुके हैं। अजय माकन भी असहज हैं।
राजनीतिक हलकों में यह कयास लगाया जा रहा है कि लोकसभा में विधेयक पर जवाब देते हुए गृह मंत्री ने जो कुछ भी कहा वह एक तरह से रणनीतिक बयान था। गृह मंत्री ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने विषयक पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के स्टैंड की भूरि भूरि प्रशंसा की तथा भविष्य में भी उसे नजीर बनाकर चलने की सलाह दी। बात बात पर नेहरू और कांग्रेस को घेरने वाले के मुंह से अचानक बदली हुई भाषा का निहितार्थ तलाशा जा रहा है।
बहरहाल लोकसभा से पारित हो चुका दिल्ली सेवा विधेयक 2023 संसद के ऊपरी सदन में विचारणीय है। मालूम हो कि संसद के समक्ष जो विधेयक विचारणीय है वह केंद्र द्वारा लाए गए अध्यादेश की हू-ब-हू कॉपी नहीं है। इसमें तीन संशोधन किए गए हैं। विधेयक से सेक्शन 3 ए को हटा दिया गया है। इसमें दिल्ली विधानसभा को सेवाओं संबंधित कानून बनाने का अधिकार नहीं दिया गया है। इसकी जगह विधेयक में अनुच्छेद 339 ए ए को जोड़ा गया है जो केंद्र को नेशनल कैपिटल सिविल सर्विस अथॉरिटी बनाने का अधिकार देता है।
पहले अथॉरिटी को अपनी गतिविधियों की वार्षिक रिपोर्ट दिल्ली विधानसभा और भारतीय संसद दोनों को देने की बात थी अब इसे हटा दिया गया है। इसके अलावा विभिन्न प्राधिकरण, बोर्ड, आयोग और वैधानिक संस्थाओं के अध्यक्ष व सदस्य की नियुक्ति के बारे में प्रस्ताव को उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री को देने से पहले केंद्र सरकार को देने की बाध्यता नहीं होगी। इसमें एक नया प्रावधान भी जोड़ा गया है कि दिल्ली सरकार द्वारा बोर्ड, आयोग और संवैधानिक संस्थाओं में नियुक्तियां उपराज्यपाल और एनसीएसएसए की सिफारिशों के आधार पर की जाएगी। दिल्ली की चुनी हुई सरकार को पूर्व में जारी अध्यादेश की तरह ही यह संशोधित विधेयक भी मंजूर नहीं है। वह इसे लोकतंत्र और संघीय ढांचे पर हमला बता रही है।
बहरहाल, संसद के भीतर पक्ष प्रतिपक्ष में रस्साकशी चल रही है। विपक्षी दल हर संभव कोशिश कर रहे हैं कि राज्यसभा में बिल के खिलाफ समर्थन जुटाकर विधेयक को कानून बनने से रोका जाए। सत्ता पक्ष फ्लोर मैनेजमेंट के जरिए लोकसभा की तरह राज्यसभा में भी इसे अमलीजामा पहनाने पर आमादा है। हालांकि इसका फैसला राज्यसभा में मतदान के बाद ही होगा लेकिन जोड़-तोड़ के गुणा-गणित में सत्ता पक्ष संख्या बल में साफ तौर पर आगे दिख रहा है।












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