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Deepawali Traditions: इतिहास और पुराण में मौजूद है दीपावली का उल्लेख

हजारों सालों से भारतीय संस्कृति में दिवाली अथवा दीपावली की विशेष मान्यता चली आ रही है। आज से लगभग 10,000 साल पहले जब भगवान श्रीराम, श्रीलंका के राजा रावण को युद्ध में हराकर अयोध्या लौटे, तब से ही इस दीपावली पर्व को मनाने का सिलसिला लगातार जारी है। समय जरुर बदला लेकिन प्राचीनतम इतिहास से लेकर वर्तमान तक इस त्यौहार को मनाने की परम्पराओं में कोई विशेष परिवर्तन देखने को नहीं मिलता है।

Deepawali

रामायण काल का सबसे प्रमाणिक इतिहास वाल्मीकि रामायण में मिलता है। इस महाकाव्य के रचियता महर्षि वाल्मीकि ने युद्धकाण्ड में भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने का उल्लेख करते हुए लिखा है, "अयोध्यावासियों ने भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने पर अपने-अपने कुलदेवताओं और देवस्थानों का गाजे-बाजे एवं फूलों द्वारा पूजन किया। हर घर को सुनहरी पुष्पमालाओं, मोटे गजरों, सूत के बंधनों और पांच रंग के अलंकारों से सजाया गया। अयोध्या के भवनों में तिल के तेल से भरे दीपक जलाये गए। धरती खेती से हर-भरी हो गयी। वृक्षों में फल आ गए और फूलों में सुगंध छा गयी। महाराजा श्रीराम ने घोड़ों और गायों का दान किया।"

1574 ईसवी में गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी महान रचना 'श्रीरामचरितमानस' में भी इस ऐतिहासिक पर्व का उल्लेख उत्तरकाण्ड में किया है। वे चौपाइयों में जो वर्णन करते हैं, उसका अर्थ इस प्रकार है, "सोने के कलशों को अलंकृत कर अयोध्यावासियों ने अपने दरवाजों पर रख लिया। सभी ने बंदनवार, ध्वजा, और पताकाएं लगायी। स्त्रियाँ सोने की थाली में अनेक प्रकार की आरती सजाकर मंगलगान कर रही थी। नगर की गलियाँ सुगन्धित द्रवों से सींचा गया। नगर में डंके बजे और चौक पुराए गए।"

समय के साथ इस पर्व की व्यापकता बढती चली गयी, जैसे आज से लगभग 4,500 वर्ष पहले, यानि महाभारत काल में इस पर्व के साथ गोवर्धन पूजा इस त्यौहार के साथ जुड़ गया। विष्णु पुराण के पाचवें स्कंध के दसवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने बृजवासियों से गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा कर उसे पूजने का महत्व बताया है।

ईसा पूर्व छठी शताब्दी में दिवाली के दिन ही भगवान महावीर को निर्वाण यानि ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

समकालीन, भगवान गौतम बुद्ध इसी दिन अपनी जन्मभूमि कपिलवस्तु कई वर्षो बाद वापस लौटे थे। उनके वापस आने की खुशी में दीप प्रज्जवलित कर उनका भव्य स्वागत किया गया था।

काठमांडू घाटी में रहने वाले नेवार बौद्ध यह त्यौहार सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध मत को अपनाने की याद में मनाते हैं।

पहली शताब्दी के आसपास रचित स्कन्द पुराण में भी दिवाली का उल्लेख किया गया है। इस रचना के कार्तिकमास माहात्म्य में लिखा है, "कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी को यदि आमवस्या भी हो और उसमें स्वाति नक्षत्र का योग हो तो उसी दिन दीपावली होती है। उस दिन से आरम्भ करके तीन दिनों तक दीपोत्सव करना चाहिए।"

स्कंद पुराण की कथा के अनुसार एक समय राजा बलि ने भगवान विष्णु से यह वर माँगा था कि "वामनरूप धारण करने वाले आपको मैंने भूमिदान दी है और आपने उसे तीन दिनों में तीन पगों द्वारा नाप लिया है, अतः आज से लेकर तीन दिनों तक प्रतिवर्ष पृथ्वी पर मेरा राज्य रहे। उस समय जो मनुष्य पृथ्वी पर दीपदान करें, उनके घर में आपकी पत्नी लक्ष्मी स्थिरभाव से निवास करें।"

स्कंद पुराण के अनुसार दैत्य राज बलि को भगवान विष्णु ने चतुर्दशी से लेकर तीन दिनों का राज्य दिया है। इसलिए इन तीन दिनों में यहाँ महोत्सव करना चाहिए।

सातवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन द्वारा रचित काव्य नागनंदा में भी दिवाली को 'दीपप्रतिपदुत्सवे' के नाम से संबोधित किया गया है। दसवीं शताब्दी के राष्ट्रकूट राजा कृष्ण तृतीय के कालखंड में भी दीपोत्सव मनाने का जिक्र मिलता है।

मध्यकालीन भारत
मुस्लिम पर्शियन इतिहासकार अलबरूनी ने ग्यारहवीं शताब्दी में दिवाली का वर्णन इस प्रकार किया है, "कार्तिक की पहली या अमावस्या का दिन, जब सूर्य तुलाराशि में जाता है, दिवाली कहलाती है। तब लोग स्नान करतें हैं, आमोद के वस्त्र पहनते हैं, एक-दूसरे को पान और सुपारी उपहार देते हैं। वे दान देने के लिए मंदिरों में जाते और दोपहर तक एक-दूसरे के साथ हर्ष से खेलते हैं। रात को वे प्रत्येक स्थान में बहुत बड़ी संख्या में दीपक जलाते है, जिससे वायु पूर्ण रूप से निर्मल हो जाती है।"

मुगलों का दौर
आईने अकबरी के अनुसार एक बार बादशाह अकबर भी दीपावली के उत्सव में शामिल हुआ था। हालाँकि, इतिहासकार श्रीराम शर्मा अपनी पुस्तक 'The Religious Policy Of The Mughal Emperors' में यह भी लिखते है कि वह देवी लक्ष्मी की पूजा में शामिल नहीं हुआ था।

जहाँगीर की आत्मकथा 'जहाँगीरनामा' के अनुसार बादशाह ने अपने दरबारियों से एक बार कहा था कि वे दिवाली (22 अक्टूबर 1614 को) का उत्सव हर्सोल्लास के साथ मेरी यानि जहाँगीर की उपस्थिति में मना सकते है। सिखों के छठवें गुरु, हरगोबिन्द सिंह, जहाँगीर की कैद से दिवाली वाले दिन ही स्वतंत्र हुए थे इसलिए सिखों में इस दिन को बंदी छोड़ दिवस के नाम से जाना जाता है।

इटली का एक व्यापारी पीटर मुंडी, बादशाह शाहजहाँ के दरबार में आया था। उसने अपनी भारत यात्रा के संस्मरण 'The Travels of Peter Mundy in Europe and Asia, 1608-1667' में विस्तार से लिखे है। 1632 में वह आगरा में था और उसने भी उस दौर में दिवाली का उत्सव मनाते हुए लोगों को देखा था। पीटर लिखता है, "जब एक पवित्र समय दीपावली आई तो हिन्दुओं ने अपनी छतों और खिड़कियाँ इत्यादि पर दीपक और रोशनियाँ जलाई थी।"

1665 में मुगलों ने दीपावली पर प्रतिबन्ध लगा दिया और बाद में औरंगजेब ने आतिशबाजी पर रोक लगा दी। मगर इसका जनता पर प्रभाव नहीं पड़ा और वे हमेशा की तरह अपने इस त्यौहार को मानते रहे। इसका एक उदाहरण 1680 में मिलता है, जब गुरु गोविन्द सिंह से मिलने असम के राजा रतन राय आनंदपुर साहिब आये थे।

बम्बई स्थित खालसा कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष रह चुके जगजीत सिंह, साल 1967 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'गुरु गोबिंद सिंह - ए स्टडी' में लिखते है कि राजा रतन राय दिवाली के दिन आनंदपुर आये थे और अपने साथ बांटने के लिए कई उपहार भी लाये थे।

अठारवीं शताब्दी के दौरान, सिखों ने मुगलों और अफगानों के अमानवीय अत्याचारों के खिलाफ गुरमत नाम से एक नयी परंपरा शुरू की थी। इसका शाब्दिक अर्थ है गुरु का मत यानि गुरु के नाम पर संकल्प। यह सिखों द्वारा किसी भी धार्मिक, सामाजिक अथवा राजनीतिक मुद्दे से संबंधित आयोजित सभा में अपनाई गई सलाह या संकल्प होता है। सिखों के अधिकतर गुरमत वैसाखी और दिवाली के दिन लिए जाते थे।

ब्रिटिश भारत
1891 में महात्मा गाँधी ने दीपावली का वर्णन इस प्रकार किया है, "दिवाली के दिन खूब पटाखें छोड़े जाते है। रात में आखों को चौधियां देने वाली रोशनी दमकती है। इस रात विद्या की देवी सरस्वती के पूजन की रात भी है। व्यापारी लोग पहली मद दर्ज करके अपने नए बहीखातें भी आज रात को शुरू करते है। पूजा के अंत में बिलकुल अधीर बच्चे पटाखे सुलगाते है और चूँकि यह पूजा सब जगह एक निश्चित समय पर होती है, सड़कें पटाखों के धडाकों, पटपटाहट और सुरसुराहट से गूंज उठती है। बाद में धार्मिक वृत्ति के लोग मंदिरों में जाते हैं। परन्तु वहां भी हर्ष और उल्लास, चकाचौंधकारी प्रकाश और भव्यता ही भव्यता दिखाई देती है।"

इस प्रकार दिवाली का त्यौहार हर कालखंड में बिना किसी अवरोध के हजारों सालों से मनाया जा रहा है। इसी निरंतरता के चलते इसे विश्व का सबसे प्राचीनतम त्यौहार भी कहा जा सकता है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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