UP Chunav 2027 में क्या होगा बड़ा खेल? सपा या बसपा किसके साथ ओवैसी का गठबंधन? खोले सारे पत्ते, रखी ये डिमांड
UP Chunav 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की सरगर्मी शुरू हो चुकी है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने बहराइच से जोरदार चुनावी अभियान की शुरुआत कर दी है। उन्होंने न सिर्फ पार्टी का पहला प्रत्याशी घोषित किया, बल्कि भाजपा को रोकने के लिए गठबंधन की भी पेशकश कर दी।
अब सवाल यह है कि ओवैसी अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी (सपा) या मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ हाथ मिलाएंगे? AIMIM किस रणनीति के साथ मैदान में उतर रही है? आइए विस्तार से समझते हैं...

ओवैसी ने बहराइच में किया बड़ा ऐलान
15 जून 2026 को ओवैसी बहराइच पहुंचे और मटेरा विधानसभा क्षेत्र में जनसभा को संबोधित किया। यहां उन्होंने AIMIM के उत्तर प्रदेश प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली को मटेरा सीट से पार्टी का पहला उम्मीदवार घोषित किया।
ओवैसी ने कहा कि अब दरी नहीं बिछाई जाएगी, बल्कि हिस्सेदारी और बराबरी की बात होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि AIMIM भाजपा को हराने के लिए गठबंधन को तैयार है, लेकिन शर्त है कि इज्जत और बराबरी का रुतबा।
लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी ओवैसी ने दोहराया कि पार्टी पूरे जोर-शोर से 2027 का चुनाव लड़ रही है। शौकत अली और कार्यकर्ता पूरे प्रदेश में मेहनत कर रहे हैं।
गठबंधन की रणनीति: सपा या बसपा?
ओवैसी ने गठबंधन पर साफ कहा कि हम भाजपा को रोकने के लिए तैयार हैं, बशर्ते हमें बराबरी की नजर से देखा जाए।
- सपा के साथ: मुस्लिम वोट बैंक पर सपा की मजबूत पकड़ है। 2022 में AIMIM ने 95 सीटों पर चुनाव लड़ा और करीब 4.5 लाख वोट मिले। कई सीटों पर AIMIM के वोटों से सपा हारी। ओवैसी का कहना है कि कोई किसी के साथ नहीं है, AIMIM अब खुद मजबूत हो रही है। अखिलेश यादव की सपा के साथ गठबंधन की अटकलें तेज हैं, लेकिन सीट शेयरिंग पर टकराव संभव है।
- बसपा के साथ: बसपा के पास खोने को कम है। मायावती और ओवैसी का दलित-मुस्लिम गठजोड़ कुछ सीटों पर फायदेमंद साबित हो सकता है। बिहार चुनाव के बाद बसपा-AIMIM की नजदीकियां बढ़ी थीं, लेकिन मायावती ने पहले स्पष्ट किया था कि वे किसी के साथ गठबंधन पर विचार नहीं कर रही हैं।
ओवैसी ने मुस्लिम वोटों के सपा के साथ होने की बात पर नाराजगी जताई और कहा कि AIMIM अब स्वतंत्र ताकत के रूप में उभर रही है।
2022 का प्रदर्शन Vs 2027 की चुनौती
2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 95 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। पार्टी को करीब 4,50,900 वोट मिले, लेकिन कोई सीट नहीं जीत सकी और सभी जगह जमानत जब्त हो गई।
हालांकि, कई सीटों पर सपा की हार का अंतर AIMIM के वोटों से कम था। यानी मुस्लिम वोट बंटने से भाजपा को फायदा हुआ। ओवैसी अब 2027 में ज्यादा सीटों करीब 200 तक पर लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।
मटेरा सीट का महत्व समझें...
मटेरा (बहराइच) सीट पर वर्तमान में सपा का विधायक है। ओवैसी ने यहां शौकत अली को उतारकर सपा के पारंपरिक गढ़ में सेंध लगाने की कोशिश की है। बहराइच मुस्लिम बहुल क्षेत्र है और यहां से AIMIM अपनी पैठ मजबूत करना चाहती है।
ओवैसी ने कहा कि भाजपा शासन में बुलडोजर किसके घरों पर चलता है, यह सब जानते हैं। उन्होंने अल्पसंख्यकों, पिछड़ों और वंचितों की आवाज बनने का दावा किया।
राजनीतिक विश्लेषण: ओवैसी की रणनीति क्या है?
ओवैसी मुस्लिम युवाओं और वंचित वर्गों में बढ़ती लोकप्रियता का फायदा उठाना चाहते हैं। गठबंधन में बराबरी की मांग करके वे अपनी पार्टी की अहमियत बढ़ाना चाहते हैं। बिहार, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे राज्यों में AIMIM ने सीटें जीती हैं, जिससे आत्मविश्वास बढ़ा है। उधर, विपक्षी दलों का आरोप है कि ओवैसी मुस्लिम वोट बांटकर भाजपा को फायदा पहुंचाते हैं। 2022 में AIMIM के वोटों ने कई सीटों पर सपा को नुकसान पहुंचाया। ओवैसी पर 'ब्लैकमेलिंग' की राजनीति करने का आरोप लगता है, कुछ सीटें मांगकर गठबंधन में दबाव बनाना। वे मुख्य मुद्दों (नीट पेपर लीक, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार) पर कम बोलते हैं, जबकि सांप्रदायिक मुद्दों पर ज्यादा सक्रिय रहते है।
यूपी की सियासी हकीकत
यूपी में मुस्लिम वोट (करीब 19%) निर्णायक भूमिका निभाते हैं। सपा का PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला अभी तक मजबूत है, लेकिन AIMIM की एंट्री से समीकरण बिगड़ सकते हैं। बसपा अगर AIMIM के साथ जाती है, तो दलित-मुस्लिम गठजोड़ मजबूत हो सकता है, लेकिन मायावती की रणनीति अभी साफ नहीं है।
भाजपा के लिए यह स्थिति फायदेमंद साबित हो सकती है अगर विपक्षी वोट बंटे। योगी आदित्यनाथ की सरकार तीसरी बार सत्ता में आने का लक्ष्य रख रही है।
गठबंधन या स्वतंत्र लड़ाई?
असदुद्दीन ओवैसी की बहराइच यात्रा और मटेरा से उम्मीदवार घोषणा यूपी 2027 की शुरुआती हलचल है। वे बराबरी का दर्जा मांग रहे हैं, जो बड़े दलों के लिए चुनौती है। अगर, गठबंधन हुआ तो विपक्षी वोटों का बंटवारा रुक सकता है, लेकिन AIMIM अकेले लड़ी तो मुस्लिम वोट बंटने से भाजपा को फायदा हो सकता है।













Click it and Unblock the Notifications