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Deendayal Upadhyaya: उभरते भारत में दीनदयाल उपाध्याय के विचारों का महत्व

Deendayal Upadhyaya: सोशल मीडिया के आज के युग में जब विचार ही नहीं विचारधाराएं भी जन मन के बीच बहस का मुद्दा है तब विचारधारा को लेकर चल रही किसी भी चर्चा में इको सिस्टम और नैरेटिव की बात आ ही जाती है। इस बहस में 'भारतीय दृष्टिकोण सर्वोपरी' का महत्व बताने वाले राजनीतिक विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय सहज ही प्रासंगिक हो जाते हैं। भारतीय दृष्टिकोण के वो अपने समय के सबसे प्रभावी व्याख्याता थे। अपनी विचारधारा को पुष्ट करने के लिए पत्रों का संपादन, प्रकाशन, स्तंभ लेखन, पुस्तक लेखन उनकी रुचि का विषय था। उन्होंने अपनी बात समाज के बीच ना सिर्फ लिखकर बल्कि एक प्रखर वक्ता बनकर भी पहुंचाई।

यह ऐतिहासिक तथ्य है कि कांग्रेस की स्थापना एओ ह्यूम ने एक सेफ्टी वॉल्व के रूप में की थी ताकि भारत की जनता में उठने वाले असंतोष को मुखर होने से रोका जा सके। हालांकि यह असंतोष मुखर हुआ और बीसवीं सदी में महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता का वाहक बन गया। लेकिन कांग्रेस के एक धड़े पर ब्रिटिश प्रभाव और लंदन के उसूल तब भी दिखाई देते थे। खासकर नेहरु के ऊपर जो स्वतंत्रता के बाद एक नये इंडिया का निर्माण करना चाहते थे। इस नये इंडिया में वो भारतीय दृष्टिकोण को पिछड़ा हुआ मानते थे जबकि पश्चिमी दृष्टिकोण को आधुनिक और साइंटिफिक समझते थे।

Deendayal Upadhyaya: Importance of Deendayal Upadhyayas thoughts in emerging India

इसी का परिणाम यह हुआ कि स्वतंत्रता के बाद गांधीवादी धारा कांग्रेस में धीरे धीरे कमजोर होकर किनारे होती गयी और जवाहरलाल नेहरु की आधुनिक प्रगतिशील और साइंटिफिक सेकुलर धारा का प्रभाव बढता गया। इसके कारण भारतीय शासन से लेकर शिक्षा और संस्कृति पर पश्चिम का प्रभाव साफ दिखने लगा।

स्वतंत्रता के बाद समाजवादियों की एक धारा जेपी और राम मनोहर लोहिया की अगुवाई में मुखर हुई तो दूसरी राष्ट्रवादी धारा को मुखर आवाज देने का काम श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने किया। पंडित दीनदलाय का स्पष्ट मानना था कि ''हम विदेशी परिस्थिति एवं विदेशी चित्त में उत्पन्न विचारों का अध्ययन तो करें, किंतु स्वतंत्र भारत की विचारधारा का स्रोत तो भारतीय चित्त ही होना चाहिए।"

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने इसी विचार को केन्द्र में रखकर न केवल जनसंघ का काम किया बल्कि उनके निधन के बाद बनी भारतीय जनता पार्टी का मूल वैचारिक अधिष्ठान यही विचार बना रहा। लेकिन किसी भी देश की राजनीतिक निष्ठाएं एक रात में नहीं बदलती। उसे बदलने में दशकों लगते हैं। दीनदयाल उपाध्याय, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, नरेंद्र मोदी तक पहुंची राजनीति की राष्ट्रवादी विचार यात्रा ने असाधारण उपलब्धि हासिल की है और देश के मुख्यधारा का चिंतन बना है।

आज के इंस्टाग्राम, एक्स, यू ट्यूब के सोशल मीडिया युग में दीनदयालजी के विचार की प्रासंगिकता पर यदि हम विचार करें तो बीते आठ सालों में एक व्यापक अंतर दिखाई देता है। विचार रूप में दीनदयाल उपाध्याय ने जो बिरवा रोपा था अब वह वटवृक्ष हो गया है। उनका विचार आगे की तरफ बढ़ रहा है और भारतीयता के विचार को छोड़कर इंडिया वाली मानसिकता को अपनाने वाली कांग्रेस अपनी चमक खो रही है।

कांग्रेस के पास जिन दिनों सत्ता का बल हुआ करता था, उन दिनों भरोसा करना कठिन है कि दीनदयाल उपाध्याय जैसे साधारण कद-काठी और सामान्य से दिखने वाले मनुष्य ने कांग्रेसी सरकार की चुनौती को स्वीकार किया होगा। पश्चिम से प्रभावित शासन के नेहरू मॉडल के बरक्स उन्होंने भारतीय राजनीति और समाज को एक ऐसा वैकल्पिक विचार और दर्शन प्रदान किया, जिससे प्रेरणा लेकर हजारों युवाओं की लड़ी तैयार हुई। परिणाम यह कि आज वह विचार भारतीय राजनीति का केन्द्रीय विचार है।

दीनदयाल उपाध्याय ने कभी नहीं कहा कि पश्चिम की बहसों में कुछ सीखने के लिए नहीं है, उनसे भी सीखा जा सकता है। लेकिन वे साथ ही साथ मानते थे कि हमें पश्चिम के द्वंद्व मूलक निष्कर्षों का अनुयायी नहीं बनना है। प्रकृति बनाम मानव, भौतिकवाद बनाम अध्यात्म, स्टेट बनाम चर्च, रिलिजन बनाम सांइस जैसे इस तरफ या उस तरफ वाले विचार को वे खंडित दृष्टि मानते थे।

वह भारत में कांग्रेस राज का समय था। वे अपने कारखाने से वामपंथी इको सिस्टम वाले लेखक और विचारकों का उत्पादन कर रहे थे, जिससे देश में एक खास तरह का नैरेटिव स्थापित हो। वे इसमें दशकों तक सफल हुए। यह समय ऐसा था जब जनसंघ की आवाज अधिक लोगों तक नहीं पहुंच रही थी। कहने के हर एक माध्यम पर कांग्रेसियों और उनके वामपंथी इको सिस्टम का कब्जा था। ऐसी विपरीत परिस्थितियों के बीच मौलिक भारतीय चिन्तन के आधार पर विकल्प देने की जिम्मेदारी दीनदयालजी ने स्वयं स्वीकार की।

भारतीय जनसंघ की पहली पीढ़ी के सभी कार्यकर्ता इस काम में लगे। 1959 का पूना अभ्यासवर्ग, 1964 का ग्वालियर अभ्यास वर्ग तथा 1964 के संघ शिक्षा वर्गों का इस दृष्टि से विशेष महत्व है। इन वर्गों में परिपक्व हुए विचारों को दीनदयाल जी ने सिद्धांत और नीति प्रलेख में 'एकात्म मानववाद' नाम से प्रस्तुत किया। 1965 में भारतीय जनसंघ के विजयवाड़ा वार्षिक अधिवेशन में इसे मूल दर्शन के रूप में स्वीकार किया गया तथा 1985 में भारतीय जनता पार्टी ने भी इसे अपने मूल दर्शन के रूप में स्वीकार किया। दीनदयालजी ने बताया कि राष्ट्रीय विचार, मानव बनाम प्रकृति नहीं बल्कि मानव के साथ प्रकृति की एकात्मता का विचार है। भौतिक बनाम अध्यात्मिक नहीं बल्कि इन दोनों की एकात्मता का विचार है।

अब समय बदल रहा है। आज का युवा पश्चिम से प्रभावित नहीं बल्कि भारतीयता पर गौरव कर रहा है। वह स्टालिन और माओ के जाल में फंसने को तैयार नहीं है। वह समेकित और एकात्मता के विचार को समझ चुका है। दीनदयालजी के ही विचार को प्रधानमंत्री मोदी अपने शब्दों में जब अभिव्यक्त करते हैं तो वह सबका साथ सबका विकास बन जाता है। इसलिए सोशल मीडिया के इस युग में अप्रासंगिक होने की बजाय दीनदयाल उपाध्याय नये सिरे से प्रासंगिक हो गये हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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