Cyber Crime: बढ़ते साइबर अपराध, बनते नये 'जामताड़ा'
Cyber Crime: बीते हफ्ते, कर्नाटक पुलिस ने एक साइबर फ्रॉड गैंग का पर्दाफाश किया है। 854 करोड़ की इस ऑनलाइन धोखाधड़ी में गिरोह के सदस्यों ने शिकार लोगों को व्हाट्सएप्प, टेलीग्राम जैसे नेटवर्किंग प्लेटफॉर्मों के जरिए अपने जाल में फँसाया और उन्हें ज्यादा मुनाफे का लालच दिखाकर धन निवेश कराया। कम समय में ज्यादा लाभ कमाने के चक्कर में लोग निवेश की रकम ऑनलाइन उनके बताए बैंकखातों में जमा करते गए।
औसतन, एक लाख से दस लाख तक की राशि निवेश करने वाले लोगों ने जब अपना पैसा निकालने की कोशिश की तो वे इसमें नाकाम रहे। तब उन्हें पता चला कि वे ठगे जा चुके हैं। लेकिन, जो बात उन्हें पता नहीं थी, वह यह थी कि अपराधी उनसे मिलने वाली रकम को मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े खातों में भेजते जाते थे। यह राशि क्रिप्टो करेंसी, पेमेंट गेटवे, गेमिंग एप्प आदि विभिन्न ऑनलाइन भुगतान के जरिए इधर-उधर कर दी गई।

अगर हम इससे पहले के तीन सालों में हुए साइबर धोखाधड़ी के कुल मामलों से इस प्रकरण की तुलना करें तो पाएंगे कि यह साइबर फ्रॉड के जरिए औसतन एक साल में ठगी गई राशि के बराबर है। साइबर अपराधों की जॉंच करने वाली संसदीय समिति ने हाल ही में अपनी एक रिपोर्ट में रिजर्व बैंक को बताया है कि पिछले तीन सालों में साइबर फ्रॉड के मामलों की संख्या तीन गुना और उसमें फंसी रकम पॉंच गुना बढ़ गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में साइबर फ्रॉड के कुल दर्ज 7.05 लाख केस, 2023 के मध्य तक 19.94 लाख हो चुके थे और धोखाधड़ी की रकम 542.7 करोड़ से बढ़कर 2537.35 करोड़ हो गई थी। भारत में प्रतिदिन 38 करोड़ ट्रांजेक्शन होते हैं। इनमें हर साठ हजार में से एक ट्रांजेक्शन फ्रॉड का शिकार हो रहा है। और इस तरह की धोखाधड़ी से बचाने वाला सिस्टम हर सौ रुपए में से सिर्फ आठ रुपए की धोखाधड़ी को ही ट्रेस कर पा रहा है।
यह सिर्फ भारत की ही समस्या नहीं है। पूरा विश्व इस तरह के साइबर आर्थिक अपराधों की चपेट में है। फिशिंग, मालवेयर, रेंसमवेयर, डिनायल ऑफ सर्विसेज (जिसमें किसी सेवा को बाधित करने के लिए कई कंप्यूटरों और गेटवे का इस्तेमाल कर, ऑनलाइन उपलब्ध किसी सेवा विशेष को ओवरलोड कर दिया जाता है), जैसे साइबर अपराधों को ऑनलाइन स्कैम काफी पीछे छोड़ चुके हैं।
ग्लोबल साइबर सिक्युरिटी फर्म ग्रुप-आई बी की डिजिटल रिस्क ट्रेंड रिपोर्ट 2023 में बताया गया है कि वर्ष 2022 में ऑनलाइन स्कैम की तादाद, 2021 की तुलना में 162% बढ़ गई है। इस एक साल में हुए कुल स्कैम में 76% बैंकिंग व दूरसंचार, मीडिया, तेल और गैस, एविएशन, बीमा और इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में दर्ज किए गए। इनमें भी वित्त, स्कैमर का पसंदीदा क्षेत्र है, जहॉं एक साल में 23.9% स्कैम को अंजाम दिया गया। इन घोटालों में करीब साढ़े चार लाख करोड़ की रकम की हेराफेरी हुई।
इस तरह के घोटालों में एक जो बहुत आम प्रवृत्ति देखने में आ रही है, वह यह है कि इन्हें तकनीकी रूप से बहुत उन्नत समझी जाने वाले जगहों से नहीं, बल्कि अपेक्षाकृत अल्पविकसित या विकासशील देशों अथवा छोटे और अल्पज्ञात शहरों को आपराधिक गतिविधियों का केन्द्र बनाया जाता है। जामताड़ा तो सिर्फ एक शुरूआत थी। आज स्थिति यह है कि देश में होने वाले 80% साइबर अपराध सिर्फ दस जिलों से होते हैं।
कुछ दिनों पहले स्टार्टअप फ्यूचर क्राइम रिसर्च फाउंडेशन की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिसमें बताया गया था कि साइबर अपराधों का गढ़ बने इन दस जिलों में से किसका कितना योगदान है। रिपोर्ट के मुताबिक 9.6 % हिस्सेदारी वाला जामताड़ा बदनाम जरूर है, लेकिन उससे करीब दोगुने अपराध (18%) तो राजस्थान के भरतपुर में होते हैं। यहॉं तक कि मथुरा (12%), नूंह (11%), देवघर (10%) जैसे शहर भी जामताड़ा से आगे निकल चुके हैं। इसके बाद गुरुग्राम (8.1%), अलवर (5.1%), बोकारो (2.4%), कर्मा टांड (2.4%) और गिरिडीह (2.3%) की बारी आती है।
देश के तीन चौथाई से ज्यादा साइबर आपराधिक गतिविधियों का केंद्र बनी इस सूची में आपको गुरुग्राम को छोड़कर कोई ऐसा नाम नजर नहीं आएगा, जो औद्योगिक या प्रौद्योगिकी की दृष्टि से विकसित तो क्या विकासशील भी कहा जा सकता हो। क्या आपको यह बात हैरान नहीं करती कि बेंगलुरू, हैदराबाद जैसे अत्याधुनिक तकनीकी सुविधाओं वाले शहरों की बजाय साइबर अपराधियों के लिए ये छोटे-छोटे शहर आदर्श हैं? दरअसल, अगर आप उनकी इस मोडस ऑपेरेंडी के पीछे के कारणों के बारे में थोड़ा सा भी गहराई से सोचेंगे तो आपको कोई हैरानी नहीं होगी।
इसकी सबसे बड़ी वजह है कि आज इंटरनेट और प्रौद्योगिकी हर किसी की आसान पहुंच में है। शहरों का आकार, इंटरनेट और प्रौद्योगिकी की उपलब्धता की दृष्टि से कोई ज्यादा माने नहीं रखता। वहीं, बड़े शहरों की तुलना में छोटे शहरों में अपराध नियंत्रण का जिम्मा संभालने वाली संस्थाएं तकनीकी रूप से इतना अपडेट या साधन-सम्पन्न नहीं होतीं कि समय रहते अपराध की पहचान या अपराधियों की धर-पकड़ कर सकें। जब तक वे हरकत में आते हैं, अपराधी अपने काम को अंजाम दे चुके होते हैं। उनकी इस कमजोरी के कारण साइबर अपराधियों को पकड़ना और उनका अपराध साबित करना, बड़े शहरों के बनिस्बत, मुश्किल होता है।
साइबर अपराधियों के लिए दूसरी अनुकूल बात यह है कि छोटे शहरों में आय के अवसर कम होने की वजह से लोग कम समय में ज्यादा फायदा उठाने के चक्कर में उनके फैलाए जाल में फँस जाते हैं। साथ ही संभावित शिकारों में साइबर जोखिमों को लेकर और उनसे खुद को बचाने के तरीकों के प्रति जागरुकता की कमी हो सकती है। जागरुकता और जानकारी हो भी तो साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों, एजेंसियों और वित्तीय संस्थानों से तुरंत संपर्क साधने के मामले में उनकी पहुँच सीमित हो सकती है। इन सब वजह से अपनी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए और संभावित शिकारों को फॉंसने के लिए साइबर अपराधी छोटे शहरों को प्राथमिकता देते हैं। यहॉं उन्हें लोगों को निशाना बनाने के अधिक और आसान अवसर मिलते हैं।
साइबर अपराधों की लगातार बढ़ती तादाद के खिलाफ एक बहुस्तरीय कार्ययोजना बनाने और उस पर गंभीरता से अमल करने की जरूरत है। हालांकि, लालच एक ऐसा फंदा है, जिसमें अच्छे-अच्छे जानकार लोग फँस जाते हैं। फिर भी कुछ कदम उठाकर इस तरह की गतिविधियों को कम तो किया ही जा सकता है। इसका सबसे अच्छा तरीका व्यापक जागरुकता अभियान चलाना है। इसके लिए स्कूल-कॉलेज स्तर पर नियमित पाठ्यक्रमों में एक विषय के रूप में शामिल किया जा सकता है।
विभिन्न स्थानीय कमेटियों और स्वयंसेवी संस्थाओं की सहायता से आम आदमी को ऑनलाइन फ्रॉड के तरीकों और उनसे बचाव के उपायों के बारे में प्रशिक्षित किया जा सकता है। उन्हें बताया जा सकता है कि किस तरह के लिंक संदिग्ध होते हैं जिन्हें क्लिक नहीं करना चाहिए, किस तरह के पासवर्ड नहीं रखने चाहिए, मल्टीलेवल वेरिफिकेशन क्या होता है और यह क्यों जरूरी है, कोई भी एप्प या वेबसाइट असेस करते हुए किस तरह की जानकारियॉं साझा नहीं करना चाहिए।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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