Cricket World Cup: कोई लौटा दे पुराने वर्ल्डकप वाले दिन
13वें क्रिकेट विश्व कप का आगाज हो चुका है और पहले ही मैच में न्यूजीलैंड ने धमाकेदार तरीके से इंग्लैंड को 9 विकेट से हरा भी दिया है, लेकिन विश्व कप के मैच का पहला मैच जिस नरेंद्र मोदी स्टेडियम अहमदाबाद में हुआ, वह खाली-खाली नजर आया। जिस शान शौकत के साथ ये स्टेडियम बनवाया गया है, मानों उसकी शान में धब्बा लग गया। 1,30,000 से अधिक सीटों की क्षमता वाला दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम खाली-खाली दिखाई दे रहा था।
सवा लाख की क्षमता वाले स्टेडियम में 3 से 4 हजार लोग ही मैच देखने पहुंचे। सोशल मीडिया पर इसके वीडियो भी काफी वायरल हुए। विश्व कप का ओपनिंग मैच और स्टेडियम में इतने कम दर्शक? साफ है एक दिवसीय क्रिकेट में दर्शकों का लगाव लगातार कम हो रहा है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। जैसे, अत्यधिक क्रिकेट मैच का होना, आईपीएल का ओवरडोज आदि।

क्या अब लोगों में क्रिकेट के प्रति, खिलाड़ियों के प्रति वह दीवानगी नहीं रही, जो कभी हुआ करती थी? याद कीजिए 1983 का पहला विश्व कप, जिसमें भारत ने विजय पताका फहरायी थी, मोहिंदर अमरनाथ का आखिरी विकेट मिलते ही पवेलियन की तरफ दौड़ना कौन भारतीय भूल सकता है? कपिल देव की 175 रन की पारी, यशपाल शर्मा, संदीप पाटिल और श्रीकांत की शानदार बल्लेबाजी को लोग आज भी याद करते है। कपिल देव ने तो उस वर्ल्ड कप पर अपनी ऑटोबायोग्राफी स्टेट फ्रॉम द हार्ट भी लिख दी थी।
1996 के विश्वकप क्वार्टर फाइनल में भारत पाकिस्तान मैच के दौरान वेंकटेश प्रसाद द्वारा आमिर सौहेल को आउट करना सिर्फ विकेट मिलना नही था, वो एक देश की आहत हुई भावना पर मरहम था। लोगों को याद होगा कि ठीक उससे पहले वाली गेंद पर आमिर सोहेल ने कवर पर चौका मार कर वेंकटेश को अपमानित करते हुए इशारा किया था कि 'ऐसे ही मारूंगा।' आहत वेंकटेश ने आमिर को बोल्ड कर 'चलता बन' का इशारा कर देश के लोगों को बहुत बड़ी राहत दी थी। इसी विश्वकप के सेमीफाइनल में श्रीलंका से हार जाने के बाद कोलकाता के दर्शकों का हंगामा कौन भूल सकता है।
1999 के विश्वकप के बीच में सचिन तेंदुलकर के पिता का निधन होना और सचिन का लौटना फिर लौटकर शतक जड़ देना आज भी दर्शक याद करते हैं। हालांकि जिम्बाब्वे के खिलाफ भारत की हार ने सबको चौंका दिया था और 2003 का विश्व कप तो हाथ आते आते रह गया था, जिसकी टीस सौरव गांगुली को हमेशा सताती है। पाकिस्तान के खिलाफ सचिन का थर्ड मैन के ऊपर मारा गया छक्का आज भी दुनिया के बेस्ट छक्कों में माना जाता है। इसके अलावा सचिन, सहवाग और सौरभ की बैटिंग, आशीष नेहरा की शानदार गेंदबाजी आज तक लोगों को याद है। इस टूर्नामेंट में भारत कप के नजदीक पहुंचकर भी दूर हो गया था।
2011 का मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में धोनी का छक्का फिल्मों की कहानी का हिस्सा है। क्योंकि क्रिकेट तब दिल से खेला जाता था। तब उसमें बेशुमार पैसा नहीं था। पिछले कुछ सालों में अगर क्रिकेट की बात की जाए तो ऐसी पारी यकीनी तौर पर किसी की नहीं है जिसको भारत का हर आदमी याद करे। क्या आज के दर्शकों को कोई ऐसी पारी याद है जो मुकाबला कर पाए कपिल देव की 1983 विश्व कप की जिंबॉब्वे के खिलाफ 175 रन की पारी की? या 1996 के विश्वकप में वेंकटेश प्रसाद का आमिर सोहेल को आउट करने का वह जज्बा? हाल फिलहाल के किसी मैच में वह रोमांच पैदा नहीं हुआ है।
13 मार्च 1996 का वो दिन था, जब वर्ल्ड कप के पहले सेमीफाइनल मैच में श्रीलंका ने भारत को हरा दिया। ये मैच आक्रोशित फैंस की वजह से पूरा ना हो सका और मैच रेफरी क्लाइव लॉयड ने श्रीलंका को विजेता घोषित कर दिया। कलकत्ता के ईडन गार्डन्स में 110,000 दर्शको की भीड़ ने बवाल मचाना शुरू कर दिया जिसके चलते मैच को रोकना पड़ा। जैसे ही सचिन तेंदुलकर आउट हुए, पूरी भारतीय बल्लेबाजी लाइनअप चरमरा गयी। लोग उग्र हो गए, उपद्रव पर उतर आये। देशभर के लोगों ने कोलकाता वालों की आलोचना की, लेकिन उस उपद्रव में क्रिकेट के प्रति दीवानगी थी, जो अब नही दिखती।
2019 के विश्वकप पर आईसीसी खूब खुश हुआ था, जिसे 160 करोड़ लोगो ने देखा था। यह आंकड़ा 2015 के विश्वकप से 38 फीसदी ज्यादा था। लेकिन इस बार क्रिकेट विश्वकप शुरु हो गया लेकिन स्टेडियम से लेकर टेलीविजन और इंटरनेट तक दर्शक गायब हैं। सोशल मीडिया पर भी दूसरे सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे हावी हैं।
5 अक्टूबर से शुरू हुए आईसीसी क्रिकेट वर्ल्ड कप को लेकर आईसीसी और बीसीसीआई की सभी तैयारियां पूरी है। पहला मैच भी हो चुका है। भाग ले रही टीमों के दस टीमों के कप्तानों का फोटो सेशन हो चुका है। फेवरेट टीम के तौर पर भारत, पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया की टीम मुख्य दावेदार हैं। लोगों की उम्मीद है कि भारत में हो रहे इस विश्व कप में भारत एक बार फिर क्रिकेट का विश्व विजेता बनेगा। रोहित शर्मा, विराट कोहली, और तमाम भारतीय टीम अच्छे फॉर्म में भी है लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि इस विश्व कप को लेकर देश का आम जनमानस उतना जागरूक और इंटरेस्टेड दिखाई नहीं देता जैसा कि आमतौर पर क्रिकेट के साथ देश में होता रहा है।
याद कीजिए 2011 के विश्व कप को लेकर तैयारियां, भारत-पाकिस्तान के मोहाली में हुए मैच को लेकर पाकिस्तान से आए दर्शक और भारत के दर्शकों के बीच में प्रतिबंध की खबरें। उससे पहले 2007 के विश्व कप में भारत के निराशाजनक प्रदर्शन पर पूरे देश का आक्रोश। उससे भी पहले 2003 के विश्व कप में सौरव गांगुली और सचिन तेंदुलकर की बैटिंग के जलवे और उसको लेकर पूरे देश में हर गली नुक्कड़ चौराहों पर होनेवाली चर्चा। 1996 के विश्व कप में भारत की हार और विनोद कांबली का रोना ये वे लम्हे हैं जो कि इस देश का हर आम जनमानस जीता रहा है।
क्रिकेट इस देश में सिर्फ एक खेल नहीं रहा है। यह एक जुनून रहा है। पागलपन की हद तक हर शहर हर गली हर नुक्कड़ पर इसको लेकर चर्चा की वह भरमार रही है। लेकिन ऐसा लगता है कि क्रिकेट के उस आकर्षण को खो दिया है जो कि इस देश में हुआ करता था। आज खिलाड़ियों पर पैसा बरसता है। एक आईपीएल मैच खेलने के लिए पूरी दुनिया के हर टीम का खिलाड़ी तरसता है। जिस तरह हर खिलाड़ी की नीलामी होती है वह अखबारों की सुर्खियां तो बनता है लेकिन यही सुर्खियां पढ़कर लोगों का उन क्रिकेट खिलाड़ियों से लगाव भी खत्म हो जाता है। उसे लगता है कि ये सिर्फ पैसे के लिए खेल रहा है।
सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, अनिल कुंबले, राहुल द्रविड़, महेंद्र सिंह धोनी, वीरेंद्र सहवाग, वीवीएस लक्ष्मण, हरभजन सिंह, युवराज सिंह या उससे पहले सुनील गावस्कर, कपिलदेव, दिलीप वेंगसरकर, श्रीकांत जैसे वो खिलाड़ी रहे हैं जिनके साथ न केवल भारतीय टीम की रचना की जाती थी बल्कि क्रिकेट में भारत की कल्पना की जाती थी। उनके साथ हर भारतीय भावनात्मक रूप से जुड़ जाता था। लेकिन यही खिलाड़ी आज इस टीम से खेल रहे हैं कल को दिल्ली से खेल रहे हैं परसों मुंबई से। क्रिकेट के इस आधुनिक व्यापार में क्रिकेट से आकर्षण और खिलाड़ियों से लोगों के लगाव दोनों को बहुत हद तक खत्म कर दिया है।
पैसों की बरसात में इस खेल को बाजारू बना दिया है। आईपीएल के इस युग में टीम को खरीदनेवाले ओनर अपने लिए चीयर गर्ल्स और म्यूजिक बैंड तो खरीद कर स्टेडियम में शोर मचा सकते हैं लेकिन स्टेडियम का यह प्रायोजित शोर गली मोहल्लों के शोर के आगे फीका ही रहता है। अब सामूहिक रूप से टीवी के आगे बैठकर क्रिकेट देखना और हर बाल पर हर घर में शोर शराबा होना खत्म सा हो गया है।
यकीनन इस विश्वकप में भी छक्के बरसेंगे, खिलाड़ियों के रिकॉर्ड टूटेंगे, शतक बनेंगे, नए-नए आंकड़ों के साथ अखबारों में खबरें भी छपेंगी, लेकिन वह आकर्षण शायद ही देखने को मिले जिसके लिए हम और आप जैसे लोग इस खेल के लिए अपना समय खर्च करते थे।
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