Congress: राम मंदिर पर कांग्रेस का निर्णय नेहरू की सोच पर आधारित
कांग्रेस ने श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर में राम लला की मूर्ति के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का बॉयकॉट करने का एलान किया है। कांग्रेस इसका एलान करने से बच सकती थी, वह कोई स्टैंड ही नहीं लेती। मन्दिर निर्माण को अधूरा और संघ परिवार का समारोह बताकर कांग्रेस ने बॉयकॉट कर दिया। हालांकि कांग्रेस के बॉयकॉट के फैसले का पार्टी के अंदर और बाहर उसी तरह विरोध हो रहा है, जैसे 370 पर कांग्रेस के स्टैंड का विरोध हुआ था।
कांग्रेस अपने फैसले के पक्ष में चारों शंकराचार्यों के न जाने का भी हवाला दे रही है। चारों शंकराचार्यों के मंदिर समारोह के विरोध की अफवाह मीडिया के एक वर्ग ने ही कांग्रेस की मदद करने के लिए फैलाई। जबकि श्रंगेरी शारदा पीठ के शंकराचार्य अनंत श्री विभूषित जगतगुरु भारती तीर्थ और द्वारकाशारदा पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने इन खबरों का खंडन करते हुए प्राण प्रतिष्ठा समारोह का स्वागत किया है, और इसे हर्ष का विषय बताया है।

कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों के विरोध से प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम तो रुकने वाला नहीं। यह शास्वत सत्य है कि प्राण प्रतिष्ठा के बाद मन्दिर भी यही रहेगा और मूर्ति भी यही रहेगी। सारे देश में उस दिन 22 जनवरी को दिवाली भी मनाई जाएगी। इसलिए कांग्रेस की ही कर्नाटक सरकार ने उस दिन मन्दिरों में भव्य आयोजन का कार्यक्रम बनाया है।
कर्नाटक में कांग्रेस कथित तौर पर मुस्लिम वोट बैंक के कारण जीती है, फिर कर्नाटक सरकार ऐसा क्यों कर रही है। शायद इसलिए कि कर्नाटक की 28 लोकसभा सीटें बहुत महत्वपूर्ण हैं, और उन्हें हिन्दू विरोध करके नहीं जीता जा सकता। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार और कांग्रेस पार्टी नेतृत्व का स्टैंड विरोधाभासी है।

आचार्य प्रमोद कृष्णन के बाद कांग्रेस की हिमाचल सरकार में मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बेटे और हिमाचल सरकार के मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने प्राण प्रतिष्ठा का निमन्त्रण स्वीकार करते हुए खुद को सौभाग्यशाली माना है कि उन्हें इस ऐतिहासिक अवसर का साक्षी होने का मौक़ा मिला है। गुजरात प्रदेश कांग्रेस के विधायक और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अर्जुन मोढवाडिया ने इस बात पर अफ़सोस जताया है कि कांग्रेस ने श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर के उद्घाटन समारोह का बायकाट करने का फैसला किया है। गुजरात के ही पूर्व विधायक अंबरीश ढेर ने भी सोशल मीडिया पर लिखा कि कांग्रेस के कार्यकर्ता कांग्रेस के इस फैसले से सहमत नहीं हैं।
श्रीरामजन्म भूमि को लेकर कांग्रेस नेतृत्व हमेशा से हिन्दू विरोधी स्टैंड लेता रहा है और कांग्रेस के भीतर हिन्दू नेता हमेशा असहज होते रहे हैं। जैसे आज आचार्य प्रमोद, या मोढवाडिया या विक्रमादित्य असहज महसूस कर रहे हैं, वैसे ही जब जवाहर लाल नेहरू ने विवादास्पद ढाँचे में रखी मूर्तियाँ हटाने की जिद्द पकड़ी थी तो कांग्रेस के बड़े नेता पुरषोतम दास टंडन, विशम्भर दयाल त्रिपाठी और राघव दास असहज महसूस कर रहे थे। उन्होंने भी उस समय खुली बयानबाजी की थी।
ढाँचे के बाहर ही निर्मोही अखाड़े के नियन्त्रण वाले राम चबूतरे में राम लला का विग्रह रखा था, कहते हैं यह विग्रह तब से वहां था, जबसे बाबर ने मन्दिर तुड़वाया था। 22 दिसंबर 1949 को जब हिन्दुओं की भीड़ ने विग्रह को उठा कर विवादास्पद ढाँचे में रख दिया था तब जवाहर लाल नेहरू का उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पन्त और गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के साथ हुआ पत्रव्यवहार इस बात का गवाह है कि नेहरू ने भी वही स्टैंड लिया था जो आज सोनिया गांधी ने लिया है।
जवाहर लाल नेहरू ने फैजाबाद के उस डीएम के. के. नायर को रिटायर कर दिया था, जिसने विवादास्पद ढाँचे से विग्रह हटाने से इंकार कर दिया था। जबकि उस समय के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पन्त डीएम के इस फैसले से सहमत थे कि इसका फैसला कोर्ट से होना चाहिए। अभी अयोध्या में रामलला के जिस विग्रह की पूरी दुनिया पूजा करती है, ये वही विग्रह है जो 22 दिसंबर 1949 की रात को मस्जिद के अंदर प्रकट हुआ था।
जवाहर लाल नेहरु ने 23 दिसंबर को सुबह ही गोविंद बल्लभ पन्त से बात करके डीएम के.के. नायर को निर्देश पहुंचाया कि अयोध्या में तुरंत पहले वाली स्थिति बहाल की जाए। लेकिन डीएम ने इस आदेश को मानने से इंकार कर दिया। उन्होंने गृह सचिव को लिखा कि ऐसा करने से अयोध्या और आसपास की कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हो सकती है। इसके अलावा कोई भी पुजारी विवादास्पद ढाँचे से निकालकर मूर्ति को फिर से राम चबूतरे पर विधिवत स्थापित करने को तैयार नहीं होगा।
नेहरू के दबाव में आए मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत डीएम के.के. नायर के तर्क से सहमत नहीं थे। गोविंद बल्लभ पंत ने फिर से डीएम के.के. नायर पर दबाव डाला, जिस पर उन्होंने अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी थी। दो दिन बाद 25 दिसंबर 1949 को अपनी चिठ्ठी में नायर ने लिखा था- ''अगर सरकार अब भी चाहती है कि रामलला की मूर्ति को वहां से हटाकर बाहर किया जाए, तो मेरी गुजारिश है कि मेरी जगह पर किसी और अधिकारी की नियुक्ति कर दी जाए।''
26 और 27 दिसंबर, 1949 को यूपी सरकार के मुख्य सचिव भगवान सहाय को नायर ने लिखा कि 23 दिसंबर को जो घटना घटित हुई, वह अप्रत्याशित थी और उसे वापस करना मुश्किल है। उन्होंने सुझाव दिया कि अब इस मामले को अदालत के निर्णय पर छोड़ दिया जाए और जब तक अदालत का फैसला नहीं आता, मूर्ति जहां रखी है, वहीं रखी रहे, उसे जाली से घेर दिया जाए।
इस बार गोविंद बल्लभ पन्त ने डीएम का सुझाव मान लिया, जिस पर नेहरू बहुत खफा हुए। नेहरू ने खुद डीएम को फोन कर के मूर्तियाँ हटवाने को कहा, लेकिन डीएम नायर ने उनकी बात सुनने से भी इंकार कर दिया। जिस पर 14 मार्च 1950 को उन्हें डीएम पद से मुक्त करके रिटायर कर दिया गया।
केके नायर केरल के थे, लेकिन उनके स्टैंड के कारण उत्तर प्रदेश की जनता ने उन्हें इतना प्यार दिया कि 1967 में वह जनसंघ की टिकट पर बहराइच से सांसद चुने गए और अयोध्या के आस-पास के इलाके के लिए हिंदुत्व के बड़े चेहरे के तौर पर याद किए गए। उनकी पत्नी सुशीला नायर तो 1952 में कैसरगंज से सांसद चुनी गई, वह 1967 और 1971 में भी सांसद बनीं।
के.के. नायर अगर उस वक्त प्रधानमंत्री नेहरू का आदेश मान कर मूर्ति हटवा देते तो शायद परिस्थितियां कुछ और होतीं और आज जो रामजन्मभूमि मन्दिर बन कर तैयार हुआ है, वह नहीं हुआ होता। उत्तर प्रदेश के कई कांग्रेस नेता भी राम लला की मूर्ति हटाए जाने की नेहरू की जिद्द से कतई सहमत नहीं थे। कई नेता खुलेआम हिन्दू हितों की बात करने लगे थे। जिनमें पुरषोतम दास टंडन, राघवदास और विशंभर दयाल त्रिपाठी जैसे कई कद्दावर कांग्रेसी शामिल थे। इसकी झलक पंडित नेहरू की ओर से उत्तर प्रदेश के गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को 9 जुलाई 1950 को लिखी चिठ्ठी से मिलती है।
नेहरू ने इस चिठ्ठी में विवादास्पद ढाँचे को बाबरी मस्जिद लिखते हुए लिखा, ''यह घटना दो-तीन महीने पहले घटी थी और मैं इससे बेहद परेशान हूं। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मुद्दे पर बहादुरी दिखाई, लेकिन कुछ खास किया नहीं। उनके फैजाबाद के जिलाधिकारी ने गलत व्यवहार किया और इस घटना को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाए।''
इस चिठ्ठी में नेहरू ने शास्त्री को लिखा- "जैसा कि आप जानते हैं कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद का मामला हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है। यह ऐसा मुद्दा है जो हमारी संपूर्ण नीति और प्रतिष्ठा पर गहराई से बुरा असर डाल रहा है, लेकिन इसके अलावा मुझे ऐसा लगता है कि अयोध्या में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। इस बात का पूरा अंदेशा है कि इस तरह की समस्याएं मथुरा और दूसरे स्थानों पर फैल जाएं। मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात से हो रही है कि हमारा कांग्रेस संगठन इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहा है और राघवदास और विशंभर दयाल त्रिपाठी जैसे कई कद्दावर कांग्रेसी नेता उस तरह का प्रोपोगंडा चला रहे हैं, जिसे हम सिर्फ सांप्रदायिक कह सकते हैं और जो कांग्रेस की नीति के खिलाफ है।"
नेहरू की इस चिठ्ठी में साफ़ लिखा है कि रामजन्म भूमि मन्दिर की बात करना कांग्रेस की नीति के खिलाफ है, नेहरू की उसी नीति का राजीव गांधी ने भी पालन किया। कांग्रेस के नेता आजकल अपने बचाव में कहते हैं कि राजीव गांधी ने राम जन्मभूमि के ताले खुलवाए थे, जोकि बिलकुल गलत है। राजीव गांधी ने राम जन्मभूमि के ताले नहीं खुलवाए थे, ताले कोर्ट ने खुलवाए थे।
अगर कोर्ट की ओर से ताले खुलवाने का श्रेय राजीव गांधी को दिया जाना चाहिए, तो रामजन्मभूमि मन्दिर बनवाने का श्रेय सुप्रीम कोर्ट के बजाय मोदी क्यों न लें। सच यह है कि शाहबानो पर सुप्रीमकोर्ट का फैसले पलटने से बनी मुस्लिम तुष्टिकरण की छवि बदलने के लिए राजीव गांधी के गृहराज्यमंत्री अरुण नेहरू मन्दिर के समर्थन में स्टैंड लेकर हवा को बदलना चाहते थे। अरुण नेहरू के कहने पर 9 नवंबर 1989 को विश्व हिन्दू परिषद को रामजन्मभूमि का शिलान्यास करने दिया गया था। विश्व हिन्दू परिषद ने शिलान्यास का फैसला उसी वर्ष मार्च में हुई धर्म संसद में लिया था। लेकिन जहां शिलान्यास हुआ वह भगवान श्रीराम के जन्मस्थान पर नहीं था।
राजीव गांधी ने 1989 के चुनाव प्रचार का श्रीगणेश अयोध्या से जरुर किया था, रामजन्मभूमि मन्दिर बनवाने का वायदा भी किया था, लेकिन वह विवादास्पद ढांचा तोड़कर श्रीराम के जन्म स्थान पर मन्दिर नहीं बनवाना चाहते थे। विवादास्पद ढांचा तोड़कर जहां आज श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर बन कर तैयार खड़ा है, उसे जवाहर लाल नेहरू से लेकर मल्लिकार्जुन खड़गे तक बाबरी मस्जिद ही कहते हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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