Congress Strategy: कांग्रेस बनाने लगी चुनावी रणनीति

कांग्रेस नेतृत्व को लगता है कि इस साल के आखिर में होने वाले पांच विधानसभाओं के चुनावों में से हिंदी पट्टी के तीन राज्य जीतने के बाद कांग्रेस लोकसभा चुनावों में विपक्ष का नेतृत्व करने की स्थिति में आ जाएगी।

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दिल्ली में कांग्रेस की मंथन बैठकों का दौर शुरू हो गया है। कांग्रेस के सामने इस समय तीन बड़े मुद्दे हैं, जिन पर चर्चाएं चल रही हैं। पहला- विपक्षी एकता के टेढ़े सवालों को सुलझाना। दूसरा- केजरीवाल को विपक्षी एकता में शामिल करने या नहीं करने पर फैसला लेना। तीसरा- राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के विवाद का हल निकालना। कर्नाटक जीतने के बाद कांग्रेस को ऐसा लगने लगा है कि अगर पार्टी के अंदरुनी विवाद सुलझा लिए जाएं, तो लोकसभा चुनाव आते आते वह हिन्दी पट्टी में भी अपनी खोई हुई ताकत वापस हासिल कर लेगी।

कर्नाटक का चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस ने कर्नाटक की चुनावी रणनीति बनाने वाले सुनील कानुगोलू को 2024 के लोकसभा तक सभी चुनावों की रणनीतिक जिम्मेदारी दे दी है। प्रशांत कुमार की टीम का हिस्सा रहे सुनील को कांग्रेस का 'प्रशांत किशोर' भी कहा जाने लगा है। कर्नाटक के बेल्लारी जिले के रहने वाले सुनील की राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में भी अहम भूमिका रही थी।

कर्नाटक में भाजपा के खिलाफ 40 पर्सेंट वाली सरकार, पेटीएम, क्यूआर कोड जैसे कैंपेन सुनील की रणनीति का हिस्सा थे। भाजपा ने कर्नाटक की तरह मध्यप्रदेश में भी कांग्रेस तोड़ कर अपनी सरकार बनाई थी, इसलिए सुनील को मध्यप्रदेश में चुनावी रणनीति काम सौंप दिया गया है, वह मध्य प्रदेश पहुंच चुके हैं, और उन्होंने काम शुरू भी कर दिया है।

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कर्नाटक का चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को लगता है कि इस साल के आखिर में होने वाले पांच विधानसभाओं के चुनावों में से हिंदी पट्टी के तीन राज्य जीतने के बाद कांग्रेस लोकसभा चुनावों में विपक्ष का नेतृत्व करने की स्थिति में आ जाएगी, जो कर्नाटक से पहले तक उसे खुद को संभव नहीं लगता था।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के जन्मदिन पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने लोकसभा चुनाव में नेतृत्व का दावा लगभग छोड़ने की पेशकश कर दी थी। उसके बाद ही राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने नीतीश कुमार को विपक्षी एकता की कमान संभालने का जिम्मा दिया था। नीतीश कुमार की कोशिशें कितनी सफल हुई हैं, उसका कुछ अंदाज 12 जून को पटना में होने वाली विपक्षी दलों की बैठक से पता चल जायेगा। यह बैठक कांग्रेस की रणनीति से ही हो रही है। जिसमें वे दल भी शामिल होंगे, जो फिलहाल कांग्रेस से सहमत नहीं हैं।

कांग्रेस ने 29 मई को आगामी रणनीति के लिए दिन भर बैठकें की। जिनमें सबसे अहम बैठक राजस्थान की गुटबाजी और केजरीवाल को लेकर कांग्रेस में उठे बवंडर का समाधान निकालने वाली बैठकें प्रमुख थीं। मध्यप्रदेश को लेकर भी अहम रणनीतिक बैठक हुई। जहां तक राष्ट्रव्यापी विपक्षी एकता का सवाल है, तो कांग्रेस अगर 12 जून से पहले केजरीवाल का समर्थन करने का फैसला करती है, तो विपक्षी एकता की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।

लेकिन अगर कांग्रेस केजरीवाल का विरोध करती है तो विपक्षी एकता की संभावनाएं धूमल हो जाएंगी। ऐसी सूरत में केजरीवाल, ममता, केसीआर का तीसरा मोर्चा बनेगा।

केजरीवाल को लेकर कांग्रेस की मुश्किल सिर्फ पंजाब, दिल्ली और गुजरात प्रदेश कांग्रेस ईकाइयों का विरोध ही नहीं है। बल्कि मुश्किल यह भी है कि अगर केजरीवाल राष्ट्रव्यापी एकता में शामिल होते हैं, तो वे इन राज्यों में तो कांग्रेस से लोकसभा सीटों में हिस्सा मांगेगे ही, बाकी राज्यों में भी हिस्सा मांगेंगे। मल्लिकार्जुन खड़गे ने 29 मई को पंजाब प्रदेश कांग्रेस के नेताओं और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के नेताओं से केजरीवाल के मुद्दे पर अलग अलग बात की। इन दोनों ही बैठकों में राज्यों के नेताओं ने विपक्षी एकता के नाम पर केजरीवाल को समर्थन करने का कड़ा विरोध किया।

अजय माकन ने अपने पक्ष को बहुत ही जोरदार ढंग से रखते हुए दिल्ली विधानसभा में पास किए उस प्रस्ताव का जिक्र किया, जिसमें राजीव गांधी का भारत रत्न वापस लेने की मांग की गई थी। उन्होंने कहा कि बावजूद इसके कि 2013 में कांग्रेस ने समर्थन देकर आम आदमी पार्टी की सरकार बनवाई थी, उसने कांग्रेस को ही नुकसान पहुंचाया। उन्होंने कांग्रेस को चेतावनी दी कि वह 2013 वाली गलती दोहराने का काम नहीं करे। अब ऐसा लग रहा है कि जुलाई में होने वाले संसद सत्र तक कांग्रेस कोई स्टैंड नहीं लेगी।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव नतीजों से कांग्रेस कार्यकर्ताओं के हौंसले बुलंद हैं, और केजरीवाल के साथ किसी तरह का तालमेल बिठा कर पार्टी हाईकमान बनी हुई फिजा खराब नहीं करना चाहती। वैसे भी बीजू जनता दल और वाईएसआर कांग्रेस से समर्थन के बाद अध्यादेश पर आधारित सरकारी बिल आसानी से पास होने वाला है, इसलिए हो सकता है कि बिल के मतविभाजन के समय विपक्ष की वाकआउट करने की ही रणनीति बने।

कांग्रेस इस स्थिति को इस साल के आखिर में होने वाले पांच विधानसभाओं के चुनाव नतीजों तक बना कर रखना चाहेगी। कांग्रेस को पूरी उम्मीद है कि कर्नाटक के बाद हिंदी पट्टी के तीनों राज्यों में उसकी सरकार बन जाएगी। हिन्दी पट्टी के जिन तीन राज्यों में इसी साल के आखिर में चुनाव हैं, इनमें से दो राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अभी भी कांग्रेस की सरकार है, जबकि दलबदल के कारण वह मध्यप्रदेश की जीती हुई बाजी हार गई थी।

सोमवार को मध्यप्रदेश की चुनावी रणनीतिक बैठक के बाद राहुल गांधी ने घोषणा की कि कांग्रेस मध्य प्रदेश में डेढ़ सौ सीटें जीत कर सरकार बनाएगी। उनके इतने आत्मविश्वास का कारण यह है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस से आए नेताओं के कारण भाजपा में असंतोष व्याप्त है, क्योंकि उन्हें भाजपा में शामिल होते ही सत्ता में हिस्सेदारी मिल गई, जबकि भाजपा में लंबे समय तक काम करने वाले दरकिनार कर दिए गए। जिन सीटों पर कांग्रेस के विधायक भाजपा में शामिल हुए हैं, उन सभी सीटों पर कांग्रेस ने कर्नाटक जैसी रणनीति बनानी शुरू कर दी है।

जिस तरह कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के कई बड़े नेता कांग्रेस में शामिल हुए थे, उसी तरह कांग्रेस की निगाह भाजपा के नाराज नेताओं पर टिकी है। कई नेता शामिल हो गए हैं और अन्य कई नेताओं से बातचीत चल रही है। एक तरफ कांग्रेस की नजर भाजपा के असंतुष्ट नेताओं पर है तो वहीं पार्टी के नेताओं को सक्रिय करने की हर संभव कोशिश हो रही है। दिग्विजय सिंह मिशन 66 पर लगे हुए हैं। ये 66 सीटें वे हैं जहां कांग्रेस लंबे अरसे से हार का सामना कर रही है। इसके लिए 16 नेताओं की एक टीम को काम पर लगाया है।

दूसरी तरफ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमल नाथ ने व्यापक दौरे शुरू कर दिए हैं। सोमवार को हुई बैठक में उन कारणों पर चर्चा हुई, जिनके कारण कर्नाटक में कांग्रेस जीती। उन सभी कारणों को मध्य प्रदेश, राजस्थान में भी आजमाया जाएगा। जैसे सस्ती बिजली, 500 रुपये में सिलेंडर, पुरानी पेंशन योजना लागू करने का वादा, कर्जमाफी और ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) को 27 प्रतिशत आरक्षण जैसे मुद्दे। कांग्रेस ने रणनीति बनाई है कि चुनाव से दो महीने पहले अधिकांश उम्मीदवार घोषित कर देगी। इससे टिकट न मिलने पर जो नेता बगावत कर सकते हैं, उन्हें बिठाने या दावेदारी वापस लेने के लिए मनाने का भी पार्टी को पर्याप्त वक्त मिलेगा।

कांग्रेस हाईकमान ऐसा मानकर चल रहा है कि छत्तीसगढ़ में उसकी जीत बहुत आसान है क्योंकि भाजपा ने 15 साल तक मुख्यमंत्री रहे रमन सिंह को बिलकुल किनारे लगा दिया है, जबकि उनका कोई विकल्प खड़ा ही नहीं किया गया। छत्तीसगढ़ में भाजपा की कमजोरी यह भी है कि आदिवासी के नाम पर बने इस राज्य में उसके पास दमदार आदिवासी नेतृत्व ही नहीं है। मध्यप्रदेश के बंटवारे से पहले भी भाजपा यहाँ मजबूत स्थिति में नहीं थी, बंटवारे के बाद भाजपा में आए लगभग सभी कांग्रेसी नेता अपनी मूल पार्टी में लौट चुके हैं।

अजीत जोगी के कांग्रेस छोड़ अलग पार्टी बनाने के कारण कांग्रेस के वोटों में विभाजन का फायदा भाजपा को होता रहा, लेकिन अजीत जोगी के देहांत के बाद तीसरी ताकत रही नहीं। आज भी अगर आम आदमी पार्टी छत्तीसगढ़ में तीसरी ताकत के रूप में खड़ी हो जाए, तो भाजपा कांग्रेस में कड़ी टक्कर हो सकती है।

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा संकट राजस्थान की गुटबाजी है। कई बार की कोशिशों के बाद आखिर 29 मई की रात को मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने अशोक गहलोत और सचिन पायलट को आमने सामने बिठाया, केसी वेणुगोपाल भी बैठक में मौजूद थे। चार घंटे की तू तू, मैं मैं के बाद सिर्फ इतना कहा गया कि मिल कर चुनाव लड़ेंगे। सिर्फ इतना बयान गहलोत और सचिन पायलट की कड़वाहट खत्म होने का प्रमाण नहीं हो सकता। गहलोत किसी भी हालत में सचिन पायलट को संगठन या सरकार में समाहित करने को तैयार नहीं हैं। अगर गहलोत को मजबूरी में किसी बात पर सहमत होना भी पड़ता है, तो कांग्रेस में एक दूसरे को पटखनी देने की पुरानी परंपरा है।

मध्यप्रदेश कांग्रेस में अर्जुन सिंह खेमा और शुक्ल बंधु खेमा एक दूसरे के खिलाफ खुल कर राजनीति करता था। दोनों कांग्रेस में रहते हुए भी अलग अलग पार्टियों की तरह काम करते थे, एक बार प्रदेश अध्यक्ष पद के चुनाव में एक दूसरे के खिलाफ गोलियां तक चल गई थीं। अर्जुन सिंह के खिलाफ शुक्ल खेमे को नरसिंह राव का समर्थन था। नरसिंह राव के समय श्यामाचरण शुक्ल मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और विद्याचरण शुक्ल केंद्र में मंत्री थे। नरसिंह राव से टकराव के कारण अर्जुन सिंह ने कांग्रेस छोड़कर तिवारी कांग्रेस बना ली थी। उसी गुटबाजी का नतीजा निकला कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस बीच के एक साल को छोड़ कर बीस साल से सत्ता से बाहर है।

मध्यप्रदेश के बंटवारे के बाद शुक्ल खेमा छत्तीसगढ़ चला गया, वहां भी शुक्ल खेमे ने अर्जुन सिंह खेमे के अजीत जोगी से मात खाई। श्यामाचरण शुक्ल और विद्याचरण शुक्ल के देहांत के बाद शुक्ल खेमा समाप्त हो गया। कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और अजीत जोगी तीनों अर्जुन खेमे में थे। राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलोत के खेमे अर्जुन सिंह और शुक्ल खेमे की तरह आमने सामने खड़े हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि दोनों खेमों में अभी तक गोलियां नहीं चली।

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    सचिन पायलट यह ठान कर बैठे हैं कि अशोक गहलोत को चौथी बार मुख्यमंत्री किसी भी हालत में नहीं बनने देना है, जबकि अशोक गहलोत यह ठान चुके हैं कि वह सचिन पायलट को राजस्थान का मुख्यमंत्री नहीं बनने देंगे। यह स्थिति भारतीय जनता पार्टी के लिए फायदेमंद हो सकती है।

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