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Rahul Gandhi Membership: राहुल गांधी की संसद सदस्यता जाने के बाद की सियासत

देश की फर्स्ट पॉलिटिकल फैमिली का दर्जा प्राप्त कर चुके नेहरू परिवार ने शायद ही सोचा होगा कि एक दिन उसके ही कर्णधार की संसद सदस्यता छिन जाएगी। हालांकि कांग्रेस इसमें भी अपना फायदा देख रही है।

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Rahul Gandhi Membership: आजकल जिस तरह की राजनीति हो रही है, उसमें अगले कुछ दिनों तक देश का राजनीतिक माहौल हंगामेदार रहने की आशंका बढ़ गई है। आजादी के आंदोलन की प्रतिनिधि पार्टी और बाद के दिनों में लंबे समय तक सत्ता में रहने की वजह से कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा पूरे देश में है। हो सकता है कि कहीं वह सिर्फ नाम का हो तो कहीं मरणासन्न स्थिति में हो। लेकिन इस ढांचे के जरिए जिले-जिले तक कांग्रेसी कार्यकर्ता लोकसभा अध्यक्ष के उस फैसले के खिलाफ हंगामा करते रहेंगे, जिसमें उन्होंने राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता को खत्म कर दिया है।

कर्नाटक, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के भावी विधानसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस की कोशिश होगी कि वह खुद और अपने कर्णधार को शहीद दिखाए। वैसे कांग्रेस ने ऐसा करना शुरू भी कर दिया है। कांग्रेस के प्रवक्ता और वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा है कि चूंकि संसद और संसद से बाहर - दोनों ही जगहों पर राहुल गांधी निडर होकर सरकार पर हमलावर हैं, इसलिए उन्हें निशाना बनाया गया। कांग्रेस की नजदीकी बनी शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे तो इससे भी आगे बढ़ गए। उनका कहना है कि राहुल को 'चौकीदार चोर है' कहने के लिए निशाना बनाया गया है।

उद्धव ठाकरे ने यह भी कहा है कि चोर और लुटेरे खुलेआम घूम रहे हैं और राहुल गांधी जैसे लोगों को सजा दी जा रही है। कांग्रेस की कोशिश यह है कि इस मुद्दे को लेकर जनता को उद्वेलित करें। वह दिखाए कि मोदी राज में उसे लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है। भारतीय समाज प्रताड़ित लोगों के साथ सहानुभूति के साथ खड़ा हो जाता है। कांग्रेस को उम्मीद होगी कि इस हमदर्दी के साथ वह जहां राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अपनी सरकारों को वापस हासिल कर ले, वहीं मध्य प्रदेश और कर्नाटक में भाजपा को शिकस्त दे दे।

ऐसा नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया होगा। उसे भी पता होगा कि राहुल गांधी की सदस्यता रद्द होने के बाद यह मामला अदालती नहीं रह जाएगा। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी की कोशिश होगी कि वह इस फैसले के जरिए यह साबित करने की कोशिश करे कि राहुल गांधी बड़बोले तो हैं हीं, कानून का लिहाज नहीं करते और उनके व्यक्तित्व में शालीनता नहीं है। इसीलिए वे बार-बार बदजुबानी करते हैं। प्रधानमंत्री तक को सार्वजनिक तौर पर भला बुरा कहते हैं। राहुल प्रधानमंत्री मोदी पर डंडे पड़ने की बात कह ही चुके हैं। भाजपा इसे भी मुद्दा बना सकती है।

कांग्रेस और उसके सहयोगी विपक्षी दलों की कोशिश यह है कि राहुल की सदस्यता रद्द होने के लिए जिम्मेदार साल 2013 का सर्वोच्च न्यायालय का फैसला परिदृश्य में आए ही नहीं। जनता के दिमागों में भी ना हो कि उस फैसले के मुताबिक, दो या दो साल से ज्यादा की सजा मिलने के बाद जनप्रतिनिधि की सांसदी या विधायकी अपने आप खत्म हो जाती है। यह मामला सियासी हिसाब से तूल पकड़ेगा, तभी कांग्रेस को फायदा हो सकता है।

कांग्रेस के लिए ऐसा झटका ठीक सैंतालिस साल बाद आया है, जब उसके सर्वोच्च नेता को किसी अदालत ने सजा दी है। बारह जून 1975 को भी कांग्रेस की तत्कालीन सर्वोच्च नेता इंदिरा गांधी के खिलाफ कुछ ऐसा ही फैसला आया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने तब इंदिरा गांधी को चुनावी कदाचार का दोषी माना था और उनके चुनाव को रद्द कर दिया था।

यह बात और है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले पर स्टे दे दिया था। इस वजह से इंदिरा की राजनीतिक सेहत पर तत्काल असर नहीं पड़ा। लेकिन सूरत की अदालत के फैसले के बाद राहुल गांधी को मौका भी नहीं मिला। अगर सर्वोच्च न्यायालय के 2013 के लिली थॉमस बनाम भारतीय संघ वाले मुकदमे पर दिए फैसले को देखें तो सूरत की अदालत से दो साल की सजा मिलने के बाद राहुल गांधी अपने-आप ही संसद सदस्यता के लिए अयोग्य हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दो या उससे ज्यादा साल की सजा पाने वाले जन प्रतिनिधियों को तब तक मिलती रही तीन महीने की मोहलत को ही खारिज कर दिया था।

मनमोहन सरकार उसी फैसले को बदलने के लिए साल 2013 में अध्यादेश ला रही थी, जिसकी घोषणा तब के कांग्रेसी प्रवक्ता अजय माकन करने जा रहे थे। लेकिन बीच प्रेस कांफ्रेंस में पहुंचकर राहुल गांधी ने उस अध्यादेश को ही फाड़ दिया था। पता नहीं राहुल सोच रहे होंगे कि नहीं कि उनका यह कदम सही था या गलत। लेकिन एक बात तय है कि अगर उन्होंने अध्यादेश नहीं फाड़ा होता, और उसके दबाव में मनमोहन सरकार अपना विचार नहीं बदलती तो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में संशोधन होता और शायद आज राहुल गांधी की सदस्यता नहीं जाती।

आपत्तिजनक टिप्पणी मामले में सूरत का मामला कोई पहला मामला नहीं है, जो राहुल गांधी के खिलाफ चल रहा है। राहुल के खिलाफ ऐसे चार और मामले चल रहे हैं। पटना, अहमदाबाद, भिवंडी और गुवाहाटी में भी उनके खिलाफ मानहानि के मामले चल रहे हैं और हर मामले में वे जमानत पर हैं। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या सूरत के मामलों का असर बाकी मामलों पर भी पड़ेगा?

निश्चित तौर पर ऐसा असर नजर आ सकता है। यह सच है कि कानून के सामने सभी बराबर हैं। अदालतें ऐसा करती भी हैं। इसके साथ ही भूलना नहीं चाहिए कि हमारे मानस की बनावट कैसी है। आखिरकार हमारा मानस अब भी उसी औपनिवेशिक सोच से ग्रस्त है, जिसमें कुलीनतंत्र को महत्व देने का भाव रहता है। इसका असर जाने और अनजाने में अदालतें भी ऐसे मामलों में राजनीतिक नेतृत्व को राहत दे ही देती हैं।

लेकिन सूरत के फैसले के बाद अदालतों का मानस बदलेगा। ऐसे मामलों की सुनवाई करते वक्त सजग रहने की कोशिश करेंगी और कानून के सामने समानता के सिद्धांत का कड़ाई से पालन करेंगी। आने वाले दिनों में ऐसे मामलों में कुछ और राजनेता कानूनी कठघरे में खड़े दिखाई दें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
ऊपरी अदालत से राहुल को राहत मिलती है या नहीं, दोनों ही स्थितियों में कांग्रेस बनाम भारतीय जनता पार्टी की जंग दिलचस्प होने जा रही है। कांग्रेस अपने विस्तारित संगठन की वजह से जहां भाजपा को परेशान और एकाधिकारवादी साबित करने की कोशिश करेगी, वहीं भारतीय जनता पार्टी राहुल गांधी को नौसिखुआ, बड़बोला और सतही बताने की कवायद में जुटेगी।

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    ऐसे में हो सकता है कि भाजपा को तत्कालिक तौर पर कुछ नुकसान हो जाए, लेकिन दीर्घकालिक स्तर पर वह फायदे में रहेगी। वह यह साबित करने में कामयाब हो सकती है कि ऐसी सोच वाला सजायाफ्ता नेता देश के नेतृत्व के काबिल नहीं है। जब तक ऐसा स्थापित होगा भाजपा साल 2024 की आधी जंग जीत चुकी होगी।

    यह भी पढ़ेंः 2009 की जीत से चमके, 2019 आते-आते पूरी तरह से हुए फ्लॉप, जानें राहुल गांधी का पूरा राजनीतिक सफर

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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