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Rahul Gandhi in London: राहुल गांधी का लंदन में लाल सलाम

अगर राहुल गांधी की लंदन यात्रा के सारे पड़ावों का विश्लेषण करें तो ऐसा लगता है जैसे भारत के किसी जंगल से निकलकर कोई नक्सली कॉमरेड लंदन पहुंच गया था, जिसे सबसे बड़ी 'वैचारिक' समस्या भारत में भाजपा के होने से है।

Congress leader Rahul Gandhi London visit Analysis

Rahul Gandhi in London: राजनीति दल की विचारधारा होनी चाहिए या राजनीतिक दल को विचारधाराओं का संगम होना चाहिए? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब जानना कांग्रेस के संदर्भ में बहुत जरूरी है। कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही विचारधाराओं का संगम थी। नरम दल और गरम दल इसके दो हिस्से हुआ करते थे। इसके साथ ही एक ओर हिन्दुवादी नेता हुआ करते थे तो दूसरी ओर मुस्लिम लीडरशिप भी कांग्रेस में मौजूद रहती थी। इन सबका जो कॉमन ग्राउण्ड था उसी का नाम कांग्रेस था।

स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के इस चरित्र में बदलाव आना शुरु हुआ जब जवाहर लाल नेहरु ने अपने प्रिय फेबियन सोशलिज्म को कांग्रेस की मुख्यधारा बनाने का प्रयास किया। नेहरु का पहला टकराव हुआ हिन्दू महासभा वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी से। श्यामा प्रसाद मुखर्जी नेहरु सरकार में मंत्री थे और उन्होंने ईस्ट पाकिस्तान में हिन्दुओं के साथ हो रहे अत्याचार पर नेहरु से हस्तक्षेप की मांग की। उन्होंने अप्रैल 1950 में हुए उस नेहरु लियाकत समझौते पर भी सवाल उठाया जिसमें अपने-अपने देश में अल्पसंख्यकों को जान माल की सुरक्षा देने का वादा किया गया था।

मुखर्जी के सवालों पर नेहरु ने जो लाइन ली वही कालांतर में कांग्रेस की लाइन बन गयी। उस समय संसद में नेहरु ने कहा था कि "यह उनका आंतरिक मामला है और जो करना है वहां की सरकार को ही करना है।" हिन्दुओं के मुद्दे पर नेहरु का न केवल श्यामा प्रसाद मुखर्जी बल्कि पुरुषोत्तम दास टंडन से भी टकराव हुआ। 2 सितंबर 1950 को पुरुषोत्तम दास टंडन आचार्य जेबी कृपलानी को सीधी टक्कर में हराकर कांग्रेस अध्यक्ष बन गये। टंडन भी मुखर्जी की तरह नेहरु लियाकत समझौते पर सवाल उठा चुके थे। ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी पर टंडन का बैठना उनके लिए सीधी चुनौती थी।

नासिक अधिवेशन में नेहरु ने इस्तीफे की धमकी देते हुए साफ कहा कि "मैं भीड़ की इच्छा के आगे नहीं झुक सकता।" यहां उनके लिए बहुसंख्यक एक ऐसी भीड़ नजर आया जिसकी अपनी कोई सोच समझ नहीं होती। अगर मुखर्जी और टंडन के साथ नेहरु के टकराव को देखें तो जो बात मुख्य रूप से उभरकर सामने आती है वह है बहुसंख्यक की इच्छाओं, परंपराओं, संस्कृति, सभ्यता को महत्व इसलिए नहीं दिया जा सकता क्योंकि वो बहुसंख्यक हैं। बहुसंख्यक होने का अर्थ नेहरु के लिए संभवत: माइंडलेस मॉब या भीड़ था।

नेहरु की ये सोच असल में कम्युनिस्ट सोच थी। जैसे इस्लाम ने पूरी दुनिया को मोमिन और काफिर में बांट रखा है वैसे ही कम्युनिस्टों ने भी इस संसार को दो हिस्से में बांट रखा है। अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक। कम्युनिस्टों का यह एक ऐसा शातिर बंटवारा है जिसकी आड़ में उन्होंने बड़े बड़े नरसंहार को अंजाम दिया है। उनकी परिभाषा के अनुसार अगर कोई हिंसक समुदाय है तो भी उसका बचाव सिर्फ इसलिए किया जाना चाहिए क्योंकि वह अल्पसंख्यक है।

कांग्रेस के लंबे शासनकाल में जब-जब पाकिस्तान में हिन्दुओं के शोषण का मामला सामने उठा तो उसे पाकिस्तान का आंतरिक मामला बताकर रफा दफा कर दिया गया जबकि भारत में इस्लामिक हिंसा का यह कहकर बचाव किया गया कि वो हमारे अल्पसंख्यक हैं। हमें उनकी हिंसा का प्रतिकार करने की बजाय अपनी सहनशक्ति बढ़ानी चाहिए।

कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता भले ही कांग्रेस से अलग रास्ते पर चलते रहे हों लेकिन कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों का पालन पोषण कांग्रेस की सरकारों में ही हुआ। ऐसे में कब कांग्रेस 'विचारधाराओं की पार्टी' से अलग हटकर कम्युनिस्ट विचारधारा वाली पार्टी हो गयी यह बात कांग्रेस के नेताओं को ही पता नहीं चली। बचा खुचा काम राहुल और प्रियंका गांधी ने अपने आसपास कम्युनिस्ट कैडर को भर्ती करके पूरा कर लिया। प्रियंका गांधी तो आइसा के युवा कॉमरेडों का कांग्रेस में भर्ती अभियान ही चला चुकी हैं जिन्हें भविष्य में कांग्रेस की लीडरशिप लेनी है।

इसलिए कांग्रेस भी कम्युनिस्टों की तरह 'अल्पसंख्यक बहुसंख्यक' के सांचे में सोचने लगी। बहुसंख्यक का सम्मान करने की बजाय उनमें बंटवारा और उनके तिरस्कार की रणनीति पर काम करना शुरु कर दिया। हिन्दू मुस्लिम संतुलन के नाम पर जिस आरएसएस को कांग्रेस के पुराने नेता परोक्ष रूप से मदद करते रहे थे उसी आरएसएस की विचारधारा पर निरंतर प्रहार करना कांग्रेस की वैचारिक पहचान बन गयी। वैसे तो पर्दे के पीछे ये कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों का एजंडा है लेकिन पर्दे के पीछे जाकर देखता कौन है? पर्दे पर तो सारी बातें राहुल गांधी ही बोलते हैं तो स्वाभाविक है, उसे राहुल गांधी और कांग्रेस की ही बात समझा जाएगा।

जैसे लंदन के इंडियन जर्नलिस्ट एसोसिएशन के प्रोग्राम में या फिर चैथम हाउस में बोलते हुए उन्होंने कहा कि वो बीजेपी और आरएसएस की विचारधारा के खिलाफ इसलिए लड़ रहे हैं क्योंकि ये लोग 'सरकारी संस्थाओं पर कब्जा' कर चुके हैं। आरएसएस की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड से करते बुए उसे फासिस्ट आर्गेनाइजशन बता दिया। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि ब्रिटेन में दो राजनीतिक दल लड़ते हैं लेकिन सरकारी संस्थाएं न्यूट्रल रहती हैं। परंतु भारत में ऐसा नहीं है। आरएसएस सरकारी संस्थाओं पर कब्जा कर चुका है। इसलिए वो आरएसएस के खिलाफ लड़ रहे हैं।

यही वह समझ है जिससे वो कांग्रेस नेता की बजाय कॉमरेड नजर आने लगते हैं। उनकी ये अपनी समझ है या बनायी गयी, इसे खोजने की जरूरत है। भारत में आरएसएस से सबसे अधिक कोई लड़ता रहा है तो वह कम्युनिस्ट विचारधारा रही है। कांग्रेस ने कभी इस तरह खुलकर न तो आरएसएस पर हमला बोला, न मुद्दा बनाया। इसका कारण यह था कि कांग्रेस में एक सीमित सीमा तक ही सही अलग अलग विचारधाराओं का समन्वय था। लेकिन कम्युनिस्ट और आरएसएस सदैव एक दूसरे के खिलाफ ही खड़े रहे हैं क्योंकि दोनों के लिए अपनी विचारधारा महत्वपूर्ण रही है।

कांग्रेस की सरकारों पर भी तो यही आरोप है कि उनके शासनकाल के दौरान 'सरकारी संस्थानों पर कम्युनिस्टों का कब्जा' हो गया था। इसकी विधिवत शुरुआत इंदिरा गांधी के समय से हुई। कांग्रेस के आसपास जो बुद्धिजीवी इकट्ठा हुए वो लगभग सभी कम्युनिस्ट ही थे। सोशलिस्ट और गांधीवादियों की जो उपस्थिति थी उसे भी कम्युनिस्टों ने खत्म कर दिया। बचे खुचे सोशलिस्ट और गांधीवादी या तो कम्युनिस्ट बन गये या फिर कम्युनिस्ट ही सोशलिस्ट और गांधीवादी बनकर सामने आ गये। क्या राहुल गांधी नहीं जानते कि पूरनचंद जोशी कौन थे जिन्होंने जेएनयू को एक कम्युनिस्ट भूमि के रूप में तैयार किया?

अगर जानते तो उन्हें यह भी पता होता कि आज संस्थाओं पर आरएसएस के कब्जे का जो रोना वो रो रहे हैं उसकी शुरुआत उन्हीं की दादी इंदिरा गांधी के समय में हो गयी थी जब आपातकाल के दौरान कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के साथ मिलकर उन्होंने लोकतंत्र का गला घोंटा था। राहुल गांधी के परिवार द्वारा ही मीडिया, राजनीतिक दल सबका गला दबा दिया गया था लेकिन उस समय भी कम्युनिस्ट ही थे जो कांग्रेस का समर्थन कर रहे थे। उसी समय से कम्युनिस्टों ने सरकारी संस्थानों पर कब्जा करके उन्हें जहरीला बनाने का अभियान शुरु कर दिया था।

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    आज भी कम्युनिस्ट ही हैं जो राहुल गांधी को विचारधारा की लड़ाई का मोहरा बना रहे हैं। राहुल गांधी जो कुछ बोल रहे हैं वो कांग्रेस की नहीं, कम्युनिस्ट शब्दावली है। फिर चाहे वो फासिज्म हो, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक हो या फिर विचारधारा के खिलाफ जंग वाली बात हो। ये सब कम्युनिस्ट शब्दावली है। अच्छा हो कि वो कांग्रेस की उन जड़ों तक जाएं जिसकी बुनियाद में महात्मा गांधी भी हैं और मदनमोहन मालवीय भी। सरदार पटेल भी हैं और श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी। आइडिया ऑफ भारत उन्हें वहीं से मिलेगा। बहुसंख्यक विरोधी कॉमरेड बनकर लंदन में लाल सलाम करने से नहीं। इससे वो अधिक संकीर्ण होंगे और अप्रासंगिक भी।

    यह भी पढ़ें: कैंब्रिज में राहुल गांधी के भाषण पर किरन रिजिजू का तंज, भारतीयों को पता है वह पप्पू हैं, विदेशी नहीं जानते

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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