Congress CWC: असंतुष्टों और वफादारों के बीच संतुलन की कोशिश

राजनीतिक फिजा में चुनावी आहट सुनने के लिए कोशिश भी ना करनी पड़े, ऐसे माहौल में शायद ही कोई राजनीतिक दल होगा, जो समन्वय के भाव से काम ना करे। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अरसे के बाद जो कार्यसमिति घोषित की है, वह समन्वय का ही बेहतर उदाहरण है।

कांग्रेस अध्यक्ष ने अपनी कार्यसमिति में जिस तरह विरोधी धड़ों तक को साधने की कोशिश की है, उसका संदेश साफ है। संदेश यह कि सभी साथ आओ, मिलकर लड़ो और केंद्र की मजबूत मोदी सरकार को उखाड़ फेंको। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस गठन के बाद कांग्रेस विशेषकर उत्तर भारत में खो चुके अपने जनाधार को वापस हासिल कर पाएगी?

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राहुल गांधी के अध्यक्ष रहते वक्त तक कांग्रेस की कार्यसमिति में अधिकतम पंद्रह सदस्य रहे हैं। कांग्रेस की सर्वोच्च नीति नियामक कार्यसमिति में पहले सदस्य बनना मामूली बात नहीं होती थी। लेकिन इस बार की कार्यसमिति को देखिए तो उसमें सदस्यों की भरमार है। इसकी वजह यह है कि इसमें तमाम विरोधी धड़ों को समायोजित करने के साथ ही युवाओं और बुजुर्गों को समाहित करने की कोशिश की गई है।

2019 के आम चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। तब से कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व अनिर्णय की स्थिति में था। इसके बाद सोनिया गांधी ने कामकाज तो संभाला, लेकिन वह तदर्थ यानी कामचलाऊ ही रहा। इससे कांग्रेस पर पड़ रहे असर की आवाज उठाते हुए गुलाम नबी आजाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे कई ताकतवर नेता पार्टी से दूर होते चले गए।

साल 2022 के सितंबर में कांग्रेस के ताकतवर 23 नेताओं ने पार्टी को अनिर्णय से निकालने के लिए एक तरह से विद्रोह ही कर दिया था। उसमें कपिल सिब्बल, आनंद शर्मा, मनीष तिवारी जैसे कद्दावर नेता शामिल थे। उसके बाद ही अक्टूबर में नए कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हुआ और मल्लिकार्जुन खड़गे अध्यक्ष चुने गए। अक्टूबर में अध्यक्ष बनने के बाद से ही अंदाजा लग रहा था कि खड़गे अपनी कार्यसमिति बनाएंगे। लेकिन कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के चलते खड़गे के लिए अपनी कार्यसमिति बनाना आसान नहीं रहा।

अध्यक्ष का पद संभालने के दस महीने बाद मल्लिकार्जुन खड़गे ने जो कार्यसमिति बनाई है, वह बेहद भारी-भरकम है। अब तक जो कार्यसमिति बनती रही है, उसमें दस से पंद्रह तक सदस्य होते थे। एक दौर में ये दस-पंद्रह सदस्य ही एक तरह से कांग्रेस को चलाते रहे हैं। लेकिन मल्लिकार्जुन खड़गे ने जो कार्यसमिति बनाई है, उसमें तीस सदस्य हैं। इस कार्यसमिति में उन्होंने जहां अपने खिलाफ चुनाव मैदान में उतरे शशि थरूर को जगह दी है, वहीं जी 23 के मुखर सदस्य रहे आनंद शर्मा को भी शामिल किया गया है।

शशि थरूर भले ही मल्लिकार्जुन खड़गे के खिलाफ चुनाव मैदान में थे, लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने कांग्रेस के प्रथम परिवार - गांधी-नेहरू परिवार के खिलाफ ना तो विद्रोह किया और ना ही उसके खिलाफ कभी एक भी शब्द बोला। हां, आनंद शर्मा जरूर मुखर हुए थे। इसके बावजूद उन्हें कार्यसमिति का सदस्य बनाया जाना एक तरह से पूर्व में गांधी-नेहरू परिवार के प्रति उनकी वफादारी का ईनाम कहा जा सकता है। युवा कांग्रेस के अध्यक्ष रहे आनंद शर्मा कांग्रेस के दबंग नेता रहे हैं। ऐसा माना जा रहा है कि उन्हें कार्यसमिति का सदस्य बनाकर कांग्रेस में उठने वाले सवालों को संभालने की कोशिश की गई है।

कार्यसमिति में राजस्थान के असंतुष्ट नेता सचिन पायलट को भी शामिल किया गया है। सचिन पायलट कुछ महीने पहले एक तरह से कांग्रेस तोड़ने और अशोक गहलोत की सरकार गिराने की तैयारी कर चुके थे, लेकिन प्रियंका गांधी के हस्तक्षेप के बाद उन्होंने अपनी राह बदली। हालांकि अशोक गहलोत ने उन्हें नमकहराम तक कहा था। ऐसा माना जा रहा है कि प्रियंका के दबाव में उन्हें कांग्रेस कार्यसमिति का सदस्य बनाया गया है। राजस्थान चुनावों को देखते हुए सचिन को कार्यसमिति में शामिल किया जाना एक तरह से विधानसभा चुनावों के दौरान असंतोष को थामने की कोशिश है। इसी तरह छत्तीसगढ़ से ताम्रध्वज साहू को शामिल करना भी एक तरह राज्य के विधानसभा चुनाव में असंतोष पर ही लगाम लगाने का प्रयास है।

कांग्रेस कार्यसमिति में शायद यह पहला मौका है, जब कांग्रेस के प्रथम परिवार के तीन सदस्यों को शामिल किया गया है। सोनिया और राहुल गांधी पूर्व अध्यक्ष के नाते इस समिति के सदस्य हो सकते हैं, लेकिन प्रियंका गांधी को पहली बार कार्यसमिति को शामिल किया गया है। बेशक कुछ सालों से वे कांग्रेस के फैसलों में शामिल रही हैं। लेकिन अब वे वैधानिक तरीके से कांग्रेस के सर्वोच्च फैसलों में हिस्सेदारी करेंगी। वैसे इस कार्यसमिति में ज्यादातर सोनिया-राहुल के वफादार ही शामिल किए गए हैं। जिनमें पंजाब का चुनाव हार चुके चरणजीत सिंह चन्नी भी है। बाकी ऊपर से नीचे तक देखिए तो इस पूरी टीम में कांग्रेस के प्रथम परिवार के वफादार भरे पड़े हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष ने 18 स्थायी आमंत्रित सदस्य भी अपनी कार्यसमिति में शामिल किए हैं। जिसमें वीरप्पा मोइली जैसे वरिष्ठ नेता के साथ ही मोहन प्रकाश आदि के भी नाम हैं। इसी तरह विशेष आमंत्रित लोगों की सूची में अलका लांबा, पवन खेड़ा और सुप्रिया श्रीनेत्र जैसे नाम शामिल हैं। ये सभी युवा हैं और माना जा रहा है कि कांग्रेस ने अपने रायपुर अधिवेशन के उस वायदे को पूरा किया है, जिसमें उसने युवाओं को तरजीह देने की कोशिश की है। महासचिवों की सूची में सबसे चौंकाने वाला नाम युवा नेता कन्हैया कुमार और गुरदीप सप्पल का है। गुरदीप सप्पल राज्यसभा टीवी चैनल के सीईओ रहे हैं और कन्हैया कुमार युवा नेता हैं।

कांग्रेस कार्यसमिति के जो प्रमुख सदस्य हैं, उनमें एकमात्र युवा सचिन पायलट हैं। राहुल गांधी को अब युवाओं की टीम से बाहर निकल जाना चाहिए। वे पचास की उम्र को लांघ चुके हैं। इस समिति को देखकर लगता है कि मल्लिकार्जुन खड़गे ने सभी पक्षों को संतुष्ट करने और आगामी चुनावों के दौरान उठ सकने वाली विरोधी आवाजों को थामने की कोशिश है।

पिछली सदी के सत्तर के दशक से कांग्रेस भले ही वामपंथी वैचारिकी को शैक्षिक और सांस्कृतिक जगत में काम करने देती रही है, लेकिन मोहन कुमार मंगलम जैसे अपवादों को छोड़ दें तो वामपंथी वैचारिकी को अपनी सर्वोच्च नियामक इकाइयों में जगह देने से बचती रही है। लेकिन अब वह खुलकर ऐसी वैचारिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को अपनी सर्वोच्च नियामक व्यवस्था में शामिल कर रही है। कन्हैया कुमार को ताकतवर बनाना इसका उदाहरण है। जाहिर है कि कांग्रेस भविष्य में भी वाम वैचारिकी केंद्रित नैरेटिव की लड़ाई के ही जरिए आगे बढ़ती रहेगी।

सही मायने में देखें तो मौजूदा कार्यसमिति युवाओं और बुजुर्गों के साथ ही असंतुष्टों और वफादारों को बीच सामंजस्य बनाने की कोशिश है। जिसके जरिए कांग्रेस अगले आम चुनाव में जहां अपनी खोई हुई साख हासिल करने की कोशिश करती नजर आ रही है, वहीं आम चुनावों से पहले होने वाले विधानसभा चुनावों में अपनी हनक बनाए रखना चाहती है। देखना यह है कि बुजुर्गों और युवाओं के साथ ही असंतुष्टों और वफादारों का यह मेल आने वाले दिनों में कांग्रेस के लिए कितना लाभकारी हो पाता है?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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