Caste Politics: राजस्थान में मुखर हुई जाति की राजनीति
Caste Politics: हाल ही में विश्व आदिवासी दिवस (9 अगस्त) पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर अपना भाषण देने के बाद राजस्थान के बांसवाड़ा के मानगढ़ धाम में पहुंचे थे जहां उन्होंने एक रैली को संबोधित किया था। इसी मंच से राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राजस्थान में जातिगत जनगणना करवाने के साथ ही ओबीसी आरक्षण 21% से बढ़ाकर 27% करने जिसमें अत्यंत पिछड़े वर्ग के लिए अलग से 6% आरक्षण करने की घोषणा की। गहलोत ने सभा में कहा कि राहुल गांधी की भावना है कि जातिगत जनगणना होनी चाहिए तो आपकी भावना के हिसाब से राजस्थान में जातिगत जनगणना शुरू होगी। जाति के आधार पर जिसका जितना हक है, उसे मिलेगा।
ओबीसी का आरक्षण बढ़ाकर 27% करने के बाद राजस्थान में 70% आरक्षण हो जाएगा। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि राजस्थान आरक्षण देने में कोई पहले ही पिछड़ा राज्य नहीं है। भारत में राज्यों के आरक्षण प्रतिशत को देखें तो 64 फीसदी आरक्षण के साथ राजस्थान फेहरिस्त में तीसरे नंबर पर है। इस लिस्ट में पहले स्थान पर मध्य प्रदेश (73 फीसदी आरक्षण) और दूसरे स्थान पर तमिलनाडु (69 फीसदी आरक्षण) हैं। राजस्थान में अन्य पिछड़ा वर्ग को 21, अनुसूचित जाति को 16, अनुसूचित जनजाति को 12 फीसदी और गुर्जर सहित पांच जातियों को मोस्ट बैकवर्ड क्लास (एमबीसी) श्रेणी में 5 फीसदी आरक्षण मिलता है। इसके साथ ही आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों के लिए 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है।

राजस्थान में सबसे बड़ी सियासी ताकत ओबीसी वर्ग की है। इस वर्ग के 61 विधायक और 11 लोकसभा सांसद हैं। अनुसूचित जाति वर्ग से 34 विधायक और 4 सांसद तथा अनुसूचित जनजाति वर्ग से 33 विधायक और 3 सांसद हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग को लोकसभा और विधानसभा के साथ नगरीय निकाय और पंचायतराज संस्थानों में आरक्षण हासिल है। ओबीसी वर्ग को नगरीय निकाय और पंचायतराज संस्थानों के चुनावों में 21 फीसद आरक्षण मिला हुआ है जबकि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इस वर्ग के लिए सीटें आरक्षित नहीं हैं। अति पिछड़ा वर्ग (एमबीसी) को नगरीय निकायों और पंचायतराज संस्थाओं में एक प्रतिशत आरक्षण दिया गया है, जबकि ईडब्ल्यूएस को प्रदेश में शिक्षण संस्थानों और सरकारी भर्तियों में 10 फीसदी आरक्षण प्राप्त है।
विधानसभा चुनावों से 90 दिन पहले ओबीसी आरक्षण बढ़ाने और मूल ओबीसी को अलग से आरक्षण देने का ऐलान करके गहलोत ने बड़ा सियासी दांव खेला है। गौरतलब है कि विधानसभा में पिछले दिनों सरकार ने जातिगत जनगणना को लेकर संकल्प पारित करके केंद्र सरकार को भिजवाया था। इस संकल्प में केंद्र सरकार से जातिगत जनगणना करवाने और पुराने आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग की थी। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जातिगत जनगणना करवाने की घोषणा ऐसे समय में की है, जब विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लगने में तीन महीने से भी कम समय बचा है। इतने कम समय में जातिगत जनगणना पूरी करना संभव नहीं है।
इसके अलावा राजस्थान में आयोजित हो रहे अलग अलग जाति महापंचायतों को भी साधने के लिए अशोक गहलोत ने कोई कसर नहीं छोड़ी। राजस्थान में पिछले पांच माह में दस से ज्यादा जातियों के सम्मेलन हो चुके हैं। 5 मार्च को जयपुर में जाट महाकुंभ का आयोजन हुआ था। इसमें ओबीसी आरक्षण 21 से बढ़ाकर 27 फीसदी किए जाने और जाट समाज के लोक देवता तेजाजी के नाम पर सरकारी बोर्ड का गठन किए जाने की मांग की गयी थी। जाट वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए गहलोत सरकार ने वीर तेजाजी बोर्ड का गठन भी कर दिया है। इस बोर्ड के गठन के साथ ही राजस्थान के राजपूत समाज की ओर से महाराणा प्रताप के नाम पर बोर्ड बनाने की मांग की गई और गहलोत ने इसे तुरंत स्वीकार करते हुए 13 जून को वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप बोर्ड का गठन कर दिया। इसी तरह 22 मई को जयपुर में कुमावत महापंचायत हुई। इस महापंचायत में ओबीसी आरक्षण 21 से बढ़ाकर 27 फीसदी किया जाना, कुमावत समाज को ओबीसी वाले कोटे में अलग से 7 फीसदी आरक्षण दिया जाना और शिल्पकला बोर्ड बनाने की मांग की थी। अशोक गहलोत ने राजस्थान राज्य स्थापत्य कला बोर्ड का गठन कर कुमावत समाज को साधने की कोशिश की है।
तमाम जातियों को साधने के लिए अशोक गहलोत की सरकार पिछले एक साल में 15 सरकारी बोर्ड बना चुकी है। चुनाव नजदीक देख हर जाति अपने लिए बोर्ड चाहती है। मारवाड़ जक्शन के विधायक खुशवीर सिंह जोजावर ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि सरकार धारू मेघवाल कल्याण बोर्ड का गठन करे। पूर्व मंत्री कालीचरण सराफ ने अग्रवाल समाज के लिए अग्रसेन बोर्ड बनाए जाने की मांग की है। वही बायतू से कांग्रेस विधायक हरीश चौधरी ने दर्जी समाज के विकास के लिए संत श्री पीपा जी सिलाई कला बोर्ड की मांग रखी है। इतना ही नहीं प्रदेश के राजपुरोहित समाज, चारण समाज, कलाल समाज, गोस्वामी समाज, मेघवाल समाज, खटिक समाज, कायमखानी समाज, विश्नोई समाज और कई अन्य समुदायों ने भी अपनी जाति का बोर्ड बनाए जाने की मांग मुख्यमंत्री से की है और अशोक गहलोत ने सबको भरोसा दिया है कि उनके इसी कार्यकाल में सब समुदाय के लिए वह बोर्ड का गठन कर देंगे।
राजस्थान की 200 विधानसभा सीटों में से 59 सीटें रिजर्व हैं। लेकिन ज्यादातर सीटों पर चुनाव में ओबीसी वर्ग के वोटर निर्णायक स्थिति में हैं। ओबीसी के अलावा विभिन्न समुदाय भी अपनी उपस्थिति रखते हैं, इस कारण अशोक गहलोत सरकार सभी को साधने के लिए सारे हथकंडे अपना रही है। अशोक गहलोत अच्छी तरह से जानते हैं कि ओबीसी वर्ग के साथ विभिन्न समुदाय का वोट एकतरफा जिस पार्टी को पड़ता है, जीत उसी की होती है। यही कारण है कि इस बार के चुनाव में सबसे ज्यादा गूंज ओबीसी आरक्षण और विभिन्न जाति महापंचायतों की सुनाई दे रही है।
2018 के चुनाव में बीजेपी को 38 रिजर्व सीटों पर हार के कारण सत्ता से बाहर होना पड़ गया था। 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने एससी और एसटी के लिए रिजर्व 59 विधानसभा सीटों में से 50 सीटों पर जीत दर्ज की थी लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 59 में से केवल 21 सीटों पर ही जीत मिली। 2018 के चुनाव में बीजेपी ने एससी रिजर्व सीटों में से सिर्फ 12 और एसटी रिजर्व सीटों में सिर्फ 9 सीटों पर जीत दर्ज की। जबकि कांग्रेस ने एससी की 19 और एसटी की 12 सीटों पर जीत हासिल की।
अशोक गहलोत सरकार के हर जाति को साधने के लिए हर हथकंडे अपनाने की रणनीति पर भाजपा का कहना है कि जाती हुई सरकार जाति की राजनीति कर रही है परंतु कांग्रेस सरकार को कोई नहीं बचा सकता। हालांकि पिछड़ी जातियों और विभिन्न समुदायों के वोट बैंक को देखते हुए भाजपा खुलकर इसका विरोध करने की स्थिति में नहीं है। इसीलिए अशोक गहलोत सभी जातियों को साधने में जुटे हैं। बाकी राज्यों की तरह राजस्थान में भी जाति चुनावों को प्रभावित करने वाला काफी अहम फैक्टर रहा है, लेकिन इस बार जातिगत समूहों में अपनी मांगों को लेकर जो मुखरता दिख रही है, उससे राजनीतिक पार्टियों की चुनौती बढ़ना तय है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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