क्या नेताओं के मुंह पर पट्टी बांधकर होगा चुनाव प्रचार?
Chunav Prachar: चुनाव प्रचार शुरू होने के साथ ही नेताओं ने जिस रफ्तार से "विवादित बोल" निकाले हैं, कमोबेश उसी गति से चुनाव आयोग व अन्य एजेंसियों ने उनके खिलाफ मामला दर्ज किया है। ऐसे अनगिनत मामले अब तक दर्ज किये जा चुके हैं। तो ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या लोकतंत्र का पांच सालाना उत्सव नेताओं के मुंह पर पट्टी बांधकर संपन्न होगा?
चूंकि आम चुनाव का राष्टीय फलक होता है, इसलिए इसकी चुनौतियां व्यापक होती हैं। विभिन्न चरणों में चुनाव होने की वजह से निर्वाचन आयोग और राजनीतिक दलों को अत्यधिक मेहनत करनी पड़ती है। राजनीतिक सत्ता समीकरण के साथ चुनावी गणित, इसमें फिट बैठने वाले उम्मीदवारों के चयन, नारे, प्रचार के मुद्दे और तरीके, प्रतिद्वंदियों के प्रति भाषा व्यवहारों आदि को मिलाकर चुनाव की एक मुकम्मल तस्वीर बनती है।

जहां तक चुनाव के दौरान विवादित बयानों की बात है तो राजनीतिक दलों के नेता जानबूझकर कुछ तीखे और चुभने वाले बयान चुनाव के दौरान देते हैं ताकि मीडिया का ध्यान उनकी और आकृष्ट हो और उनकी बातें अधिक से अधिक मतदाताओं के बीच पहुंच सके। नेता इस बात को भली प्रकार से जानते हैं कि अगर वे अपनी बातों को सीधे और सामान्य शब्दों में व्यक्त करेंगे तो उसे मीडिया में कोई स्थान नहीं मिलेगा।
मीडिया भी टीआरपी के दृष्टिकोण से नेताओं की विवादास्पद बातों को ही महत्त्व देती है। आज की मीडिया को हर जगह मसालेदार या भड़काऊ भाषणों की तलाश रहती है। इस तरह के मामले अक्सर सभी प्रकार के मीडिया प्लेटफॉर्म पर दिखाई देते हैं। चूंकि चुनाव के दौरान नेताओं को अधिक से अधिक प्रचार की भूख रहती है, इसलिए वे भी विवाद खड़ा करने वाले बयान देने से पीछे नहीं हटते।
यह अलग बात है कि निजी बातचीत में सभी दल के नेता इस बात पर हमेशा सहमत रहे हैं कि चुनाव के दौरान आक्रामकता में किसी की निजता का हनन न होने पाए, लेकिन व्यवहार में वे यह भी मानते हैं कि वोट के लिए प्रचार में आक्रामक शैली के कारण जनता जल्द आकर्षित होती है। इसलिए कई राजनीतिक पंडितों का भी मानना है की चुनावी बयानों के इस छोटे से तिल जैसे मसले को ताड़ बनाना लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। इसी कारण देश के नेता विभिन्न नियमों उपनियमों की अनदेखी करते हुए चुनाव में बढ़-चढ़कर दावे प्रति दावे आरोप प्रत्यारोप लगाने के क्रम में कई बार गड़े हुए मुर्दे भी उखाड़ने से बाज नहीं आते।
दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि पहले के समय में मीडिया का फैलाव इतना नहीं था। नेताओं के भाषण का स्तर भी आज की तुलना में अधिक साफ सुथरा था। पहले नेता जो चुनावी भाषण करते थे वह लोगों के बीच अखबारों के जरिए अगले दिन पहुंचता था, फिर उस पर विभिन्न दल अपनी प्रतिक्रिया तैयार कर अगले दिन की सभाओं में प्रमुखता से रखते थे। पहले बड़े नेताओं के चुनावी भाषण भी गिने-चुने होते थे।
पहले के नेता तीखी से तीखी बात भी व्यंग की चुटीली चासनी में परोसकर अपनी बात कह ले जाते थे। आज के डिजिटल दौर की तुलना पुराने जमाने से नहीं की जा सकती। आज आवागमन के साधन आसानी से सुलभ और बेहतर हुए हैं। पहले अपनी बात कहने के लिए आज की तरह बड़ी संख्या में खबरों के निजी चैनल नहीं थे और ना ही आज की तरह सोशल मीडिया थी। और इससे भी बड़ी बात की पुराने नेताओं को थोड़े से प्रचार से भी संतोष मिल जाता था, लेकिन आज की पीढ़ी पलक झपकते ही मुट्ठी में सरसों उगाने वाली पीढ़ी है, वह सब कुछ जानना और पाना चाहती है।
जहां तक छवि की बात है तो भड़काऊ या विवादित बयानों की वजह से राजनीतिक दल या नेता की छवि पर कोई असर नहीं पड़ता, बल्कि उनको ज्यादा प्रचार की वजह से राजनीतिक दृष्टि से फायदा ही होता है। कुछ एक अपवाद को छोड़ दिया जाए तो राजनीतिक दल अपने नेताओं को पूरी तैयारी के साथ ऐसे बयान देने के लिए प्रेरित करते हैं जिसे उन्हें प्रचार में प्रतिद्वंद्वी से बढ़त मिल जाए।
नेताओं के इन विवादित बयानों पर अंकुश लगाने के लिए चुनाव आयोग का अपना विधान है। आयोग को एक प्रक्रिया के तहत ऐसे बयानों को लेकर कार्रवाई करनी होती है। अगर गंभीर मामला हुआ तो आयोग पुलिस को शिकायत दर्ज करने के लिए भी कहता है। यह भी संभव है कि कुछ बयानों पर साल 2 साल की सजा भी हो जाए।
कई मामलों में राजनीतिक दल आयोग की कार्रवाइयों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक जाकर चुनौती देते रहे हैं, इसलिए भी आयोग की कोशिश होती है कि अगर मामला बहुत गंभीर नहीं है तो राजनीतिक नेताओं को चेतावनी देकर आगाह किया जाए। आयोग को कोई भी कार्रवाई करने से पहले कानूनी पहलुओं पर विमर्श करना पड़ता है। इसके लिए आयोग में एक अलग विधि प्रकोष्ठ गठित है।
गौरतलब है कि अधिकांश मामलों में विवादित बयानों के लिए मीडिया ही राजनीतिक दलों को उकसाता है, ठीक उसी तरह शिकायत होने के बाद आयोग को तेज गति से निर्णय लेने के लिए दबाव बनाता है। आज की मीडिया की भूमिका फोर्स मल्टीप्लायर वाली हो गई है। इसे हम प्रतिस्पर्धा अथवा समय की मांग के रूप में भी देखते हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में बयानबाजी के जरिए ही नेता खुद को अपने प्रतिद्वंद्वी से बेहतर साबित करते हैं। दुनिया के अन्य देशों में भी यहां तक कि यूरोप और अमेरिका में भी विवादित बयानों को लेकर चर्चाएं होती रहती हैं। हाल के वर्षों में बयानों के और तीखे होने के भी प्रमाण हैं। राजनीतिक दलों को निश्चित रूप से बयान देते समय यह ख्याल रखना चाहिए कि बातें मर्यादित हों और सीमा के भीतर हों, लेकिन आए दिन हो रही शिकायतों को आधार बनाकर आयोग और जांच एजेंसियों को नेताओं के मुंह पर पट्टी बांधने से भी परहेज करना चाहिए।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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