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Child Marriage: बाल विवाह की बुराई, भारत में कहां से आई?

Child Marriage:असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्वशर्मा ने विधानसभा में बहुत उत्तेजना में कहा कि अपने जीते जी असम में मैं चाइल्ड मैरिज होने नहीं दूंगा।

असल में मुख्यमंत्री असम में अंग्रेजों द्वारा बनाये गये मुस्लिम मैरिज एक्ट को खत्म किये जाने पर सरकार का पक्ष रख रहे थे जिस पर कांग्रेस और एआईयूडीएफ के विधायक हंगामा कर रहे थे। इस हंगामें पर ही प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री शर्मा ने यह बात कही।

Child Marriage

सवाल यह है कि अगर मुख्यमंत्री शर्मा राज्य में मुस्लिम मैरिज और तलाक अधिनियम को खत्म करने पर बात कर रहे थे तो इसमें बाल विवाह की चर्चा कहां से आ गयी? तो इसका जवाब यह है कि अंग्रेजों द्वारा जो विवाह कानून बनाये गए थे उसमें लड़कियों के लिए 14 साल की उम्र में विवाह करने का प्रावधान था। 1928 में इंपिरियल एक्ट के तहत चाइल्ड मैरिज को रोकने के लिए जो कानून बनाया गया था उसमें लड़कियों के लिए विवाह की न्यूनतम उम्र 14 साल रखी गयी थी।

स्वाभाविक है जिस समय अंग्रेजों ने यह कानून बनाया था उस समय पांच सात साल तक की लड़कियों का विवाह कर दिया जाता था। हिन्दुओं में यह एक व्यापक बुराई का रूप धारण कर चुका था। हालांकि लड़के की उम्र भी लगभग उतनी ही होती थी जितनी लड़की की होती थी। इसके 5, 9 या 11 साल बाद जब बच्ची को मासिक धर्म शुरु होता था उसके कुछ समय बाद उसकी विदाई की जाती थी।

इसलिए अगर अंग्रेजों ने 14 साल की उम्र निर्धारित की तो उस समय के लिए वही बालिग उम्र थी। स्वतंत्रता के बाद इसे पहले 15 साल किया गया फिर 1978 में 18 साल कर दिया गया। हिन्दुओं में स्वतंत्र भारत में थोड़ा बहुत विरोध तो हुआ लेकिन क्रमश: उन्होंने यह मान लिया कि 18 साल से कम उम्र में लड़कियों का विवाह करना कहीं से उचित नहीं है। हालांकि आज भी हिन्दू समाज में ही ऐसे अनेक समुदाय हैं जो 14 से 18 साल की उम्र में लड़कियों का विवाह कर देते हैं, लेकिन व्यापक तौर पर अब ऐसा देखने को नहीं मिलता।

हिन्दुओं में लड़कियों या लड़कों की एक सामान्य उम्र अब 20 साल के ऊपर ही है। शहरों में तो विवाह की औसत उम्र 25 से 30 साल के बीच पहुंच गयी है। लड़का हो या लड़की उसकी पढाई और कैरियर में स्थिरता के बाद ही वह विवाह की तैयारी करता है। विवाह की यह बढ़ती उम्र सही है या गलत यह एक अलग बहस का मुद्दा है लेकिन 12-13 साल की उम्र में मासिक धर्म शुरु होते ही लड़की का विवाह या विदाई कर देना, कहीं से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

ऐसे में अगर हेमंत विश्वशर्मा बाल विवाह को स्वीकार न करने की बात कर रहे हैं तो कुछ गलत नहीं है। असम में बाल विवाह की समस्या की विकरालता को देखते हुए ही पिछले साल उन्होंने बाल विवाह के खिलाफ सघन अभियान चलाया था। इस अभियान में 4000 लोगों को गिरफ्तार करके जेल भेजा गया था। इनमें वही लोग थे जो अपने छोटे बच्चों का विवाह कर रहे थे। सवाल यह है कि फिर मुस्लिम समुदाय या उसका समर्थक वर्ग इस 'असभ्य बुराई' का यह कहते हुए बचाव क्यों कर रहे हैं कि इसके जरिए मुस्लिमों को टार्गेट किया जा रहा है?

इतिहास में बहुत पीछे न जाएं तो आज के समकालीन समाज में भी मुस्लिम समुदाय का बड़ा वर्ग अपनी लड़कियों का विवाह 14 से 18 साल के बीच ही करता है। इसके पीछे शिक्षा का अभाव या आर्थिक दशा से बड़ा कारण मुसलमानों की मजहबी मान्यताएं और कानून से मुक्त स्वतंत्र सामाजिक व्यवस्था है। इस्लाम में लिखित तौर पर कहीं ऐसा उल्लेख नहीं है कि किस उम्र में लड़कियों की शादी करनी चाहिए।

इस्लाम में हिन्दुओं की तरह विवाह सात जन्म का बंधन नहीं है। यह एक कान्ट्रैक्ट या अनुबंध है जिसे मर्द लड़की या महिला को उज़रत देकर पूरा करता है। ऐसा करते हुए लड़की या महिला को तीन बार कबूल करके उसे स्वीकार करना होता है। यह कान्ट्रैक्ट मर्द जब चाहे तब एकतरफा तरीके से खत्म कर सकता है।

यह व्यवस्थाएं तो इस्लाम में हैं लेकिन निकाह की कोई निश्चित उम्र नहीं है। सामान्यतया एक चलन है कि अगर लड़की को हैज (मासिक) आने लगे तो उसका निकाह किया जा सकता है। अफगानिस्तान जैसे देश जो अपने आपको शरिया कानूनों से संचालित होने वाला बताते हैं वहां मासिक आने से पहले भी निकाह कर देने की कहानियां उभरकर विश्व के सामने आयी हैं।

अगर अफगानिस्तान में तालिबान शासन के दौरान ऐसे निकाह को वैध करार दिया जाता है तो निश्चित ही इसके पीछे उनका कोई पुख्ता इस्लामिक आधार होगा। लेकिन मुश्किल सिर्फ इतनी भर नहीं है। मुसलमानों में नाबालिग लड़कियों का बड़ी उम्र के लोगों के साथ निकाह को भी इस्लामिक रूप से जायज ठहराया जाता है, हालांकि व्यवहार में ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलता है।

कुल मिलाकर बाल विवाह मुसलमानों के बीच फैली एक ऐसी अनिवार्य सामाजिक बुराई है जिसे वो मजहबी रूप से जायज भी ठहराते हैं। इसलिए जैसे ही हेमंत विश्वशर्मा ने अंग्रेजों द्वारा बनाये गये मुस्लिम मैरिज कानून को निरस्त किया, मुस्लिम समुदाय यह समझ गया कि परोक्ष रूप से उसे अब बाल विवाह से रोका जाएगा जिसे वो मजहबी रूप से सही मानते हैं। इसलिए असम में मुस्लिम दल एआईयूडीएफ हो या कांग्रेस दोनों ही इसका विरोध करने पर उतर आये।

भारत का सामाजिक इतिहास देखें तो बाल विवाह जैसी कोई बुराई भारत में रही नहीं है। कम से कम चौथी सदी ईसापूर्व में जब कामसूत्र लिखा गया तब तक तो बाल विवाह जैसी किसी बुराई की झलक नहीं मिलती। कामसूत्र में विवाह के आठ प्रकार बताये गये हैं जिसमें हर प्रकार में लड़की के बालिग या विवाह योग्य सक्षम होने का ही वर्णन मिलता है। इसी तरह भारतीय समाज की वर्णाश्रम व्यवस्था में भी 25 वर्ष की उम्र ब्रह्मचर्य की उम्र कही गयी है। इस उम्र तक नौजवान को ब्रह्मचर्य में रहते हुए विद्याध्यन करना चाहिए। इसके बाद ही उसका गृहस्थ में प्रवेश होना चाहिए। यही वैदिक व्यवस्था है।

इस बात का कोई ठीक प्रमाण तो नहीं है कि हिन्दुओं में बाल विवाह की बुराई कहां से आयी लेकिन समझा यही जाता है कि इस्लाम के दुस्प्रभाव में हिन्दुओं में बाल विवाह का चलन शुरु हुआ। बाल विवाह, पर्दा प्रथा और दहेज यह हिन्दुओं में मुस्लिम प्रभाव के कारण शुरु हुआ। मुस्लिम समुदाय में बाल विवाह और पर्दा प्रथा अनिवार्य रूप से मौजूद था ही। दहेज का चलन भी अफगान आक्रमणकारियों के बाद शुरु हुआ। दहेज या जहेज आज भी अफगानी कबीलों में प्रचलित है और स्वयं जहेज शब्द हिन्दी उर्दू का नहीं बल्कि पश्तो का ही शब्द है।

कुछ मुस्लिम समुदाय के प्रभाव में और कुछ मुस्लिम आक्रांताओं से अपनी लड़कियों को बचाने के लिए हिन्दुओं ने कम उम्र में अपनी लड़कियों का विवाह करना शुरु कर दिया। क्रमश: यह इतना रूढ हो गया कि केले के पत्ते पर रखकर लड़के लड़कियों का विवाह कर दिया जाता था। हालांकि धार्मिक रूप से इसे कभी स्वीकार नहीं किया गया। अकबर के काल में तुलसीदास रामचरितमानस लिख रहे थे और उसमें भी वो राम सीता के स्वयंवर की ही बात कर रहे हैं। यानी उस घोर मुगल काल में भी बालिग उम्र में ही विवाह करने का धार्मिक संदेश दिया जा रहा था।

हिन्दुओं में अगर बाल विवाह, पर्दा प्रथा का चलन बढ़ा तो इसके पीछे उनकी रणनीति या मजबूरी रही होगी। कालांतर में इसे ही उन्होने अपनी परंपरा मान लिया। लेकिन इसे रोकने के लिए जब कानूनी उपाय किये गये तब सबसे आगे बढकर हिन्दुओं ने ही इसे अंगीकार भी किया। वनवासी क्षेत्रों को छोड़ दें तो हिन्दुओं में बाल विवाह का लगभग उन्मूलन हो चुका है। भारत में 18 साल से कम उम्र में विवाह जरूर होते हैं लेकिन 2011 की जनगणना के मुताबिक अब यह कुल विवाह का 3.11 प्रतिशत ही रह गया है। जबकि 1981 की जनगणना में 18 वर्ष से कम उम्र के विवाह की संख्या 43.4 प्रतिशत थी।

बदलते समय के साथ हिन्दू समाज ने कदमताल किया और पुन: उसी व्यवस्था में जाने लगा जहां ब्रह्मचर्य के बाद गृहस्थ शुरु करने का संदेश है। लेकिन मुस्लिम समुदाय के मौलवी मौलाना ऐसी बातों को इस्लाम पर हमला करार देने लगते हैं। इसलिए अगर बाल विवाह का आंकड़ा देखें तो सबसे अधिक मुस्लिम बहुल और आदिवासी बहुल इलाकों में यह होता हुआ दिखता है। लड़कियों के विवाह की उम्र को मजहबी मानसिकता से देखने की बजाय मुस्लिम समुदाय के मौलवी मौलाना अगर लड़की की जरूरत और स्वावलंबन से जोड़कर देखेंगे तो उन्हें हिमंत विश्वशर्मा दुश्मन नहीं बल्कि हितैषी के रूप में ही नजर आयेंगे।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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