Chhath Puja in Bihar: बिहार में स्वच्छता का महापर्व छठ जिसमें अस्पृश्यता के लिए कोई स्थान नहीं
सोशल मीडिया के जमाने में जिनका कोई संबंध बिहार से नहीं है, वे भी 'छठ' को खूब जानते हैं। खूब जानते हैं का अर्थ उन्हें पता है कि बिहारी मित्र के घर छठ होगा तो वह लौटते हुए उनके लिए प्रसाद में ठकुआ लेकर जरूर आएगा। छठ को खूब जानने वाले लोगों में भी अधिक संख्या उन लोगों की है जो नहीं जानते कि हिन्दु परिवारों में बच्चे के जन्म के छठे दिन होने वाले माता षष्ठी का पूजन, छठी मइया की ही अराधना है।

छठी मइया के संबंध में लोक कथाओं और शास्त्रीय ग्रंथों में कई तरह की जानकारी मिलती है। जैसे जगत की रचना के लिए ब्रह्माजी ने स्वयं को दो हिस्सों में विभक्त किया। जिसमें एक हिस्सा पुरुष था और दूसरा प्रकृति।
प्रकृति का छठा हिस्सा ही षष्ठी मां हैं। जिन्हें ब्रह्मवैवर्तपुराण में देवसेना नाम दिया गया है। जिन्हें रण क्षेत्र में नेतृत्व करने के कारण देवसेना नाम मिला। देवसेना का विवाह शिवपुत्र कार्तिकेय से हुआ। उन्हें ब्रह्मा की मानस कन्या कहा गया और कई जगह उनका परिचय सूर्य देव की बहन के रूप में भी मिलता है।
इसलिए छठी मइया के साथ सूर्य देव की भी उपासना होती है। छठी मइया बच्चों की रक्षा करने वाली हैं। वह बच्चों को लंबी आयु प्रदान करती हैं। उत्तर भारत के अलावा दक्षिण भारत में भी उनकी उपासना देवसेना के रूप में की जाती है।
छठी मइया का एक नाम कात्यायनी भी मिलता है। जिनकी नवरात्रों में षष्टी के दिन पूजा की जाती है। जो लोग बिहार से नहीं हैं, उनका परिचय भी षष्टी माता से हो गया होगा।
अब बात करते हैं बिहार में मनाए जाने वाले लोकपर्व छठ की। इस पावन व्रत के कड़े नियम और सख्त अनुशासन जहां एक ओर इसके लिए बिहारियों के मन में श्रद्धा जगाते हैं, वहीं दूसरी तरफ छठ पर्व को लेकर एक आम बिहारी के मन में भय भी रहता है। इसलिए वह छठ के नियमों में किसी तरह की कोताही नहीं करता।
इसलिए जो लोग छठ के लिए बिहार आते हैं, ऐसा नहीं है कि उन सभी परिवारों में छठ होता हो, या फिर उनके परिवार में कोई छठ व्रती हो। छठ चार दिनों का अनुष्ठान है, जो आसान नहीं है। इसलिए छठ का व्रत प्रारंभ करने से पहले परिवार में खूब अच्छे से चर्चा होती है। जो छठ उठाना चाहता है, उसे भी अपने संकल्प को परख लेने की सलाह दी जाती है क्योंकि एक बार व्रत ले लेने के बाद इसे किसी भी परिस्थिति में बीच में नहीं छोड़ सकते।
छठ से जुड़ी हुई दर्जनों कथाएं हैं। उनमें सबसे अधिक लोकप्रिय राजा प्रियव्रत से जुड़ी कथा है। राजा प्रियव्रत और उनकी पत्नी की कोई संतान नहीं थी। संतान पाने की इच्छा लेकर वे महर्षि कश्यप के पास पहुंचे। महर्षि ने यज्ञ कराया और प्रियव्रत की पत्नी गर्भवती हुईं लेकिन वह पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ।
बच्चे की मृत्यु ने राजा प्रियव्रत को इतना तोड़ दिया कि उन्होंने बच्चे के साथ अपने प्राण की आहुति देने का निर्णय ले लिया। बताया जाता है कि राजा जब प्राण त्यागने जा रहे थे, उसी वक्त छठी मैया प्रकट हुई। मैया ने उन्हें आशीर्वाद दिया। मैया के लिए राजा ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को यह व्रत रखा और मैया के आशीर्वाद से उन्हें संतान सुख प्राप्त हुआ। लोककथा के अनुसार इसके बाद से ही छठ पूजा प्रारंभ हुई।
कार्तिक मास की षष्ठी की शाम को डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। षष्ठी मैया सूर्य देव की बहन है, उनकी पत्नी है प्रत्युषा। ऐसी मान्यता है कि संध्या काल में सूर्य देव अपनी पत्नी प्रत्युषा के साथ होते हैं, इसलिए षष्ठी के दिन संध्या काल में छठी मैया के साथ देवी प्रत्युषा की भी आराधना होती है।
सप्तमी तिथि को उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। सप्तमी सूर्योपासना का दिन है। उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत का समापन होता है। सुबह के समय घाट पर सूर्य को अर्घ्य देने के लिए व्रती के साथ पूरा परिवार पहुंचता है।
वे लोग भी घाट पर आते हैं, जिनके परिवार में कोई व्रती नहीं है। वे व्रतियों की सहायता से सूर्य देव को अपना अर्घ्य समर्पित करते हैं। अर्घ्य में सूर्य देवता को जल और दूध अर्पित किया जाता है।
छठ पूजा कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को होती है लेकिन यह लोकपर्व कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को प्रारंभ होकर सप्तमी तक होता है। महापर्व चतुर्थी के दिन नहाय खाय से प्रारंभ होता है। इस दिन व्रती नहा कर नए वस्त्र पहनती हैं तथा व्रत का संकल्प लेती हैं।
व्रती इस दिन शाकाहारी भोजन, पवित्र भोजन ग्रहण करती हैं। व्रती को क्या खाना है और क्या नहीं खाना है। इसके संबंध में व्रत रखने वाले पारंपरिक दिशा निर्देशों को पालन करते हैं। नहाय खाय के दिन परिवार के अन्य सदस्य व्रती के भोजन करने के पश्चात ही खाते हैं।
पंचमी के दिन खरना होता है। खरना पूरे दिन का व्रत होता है। जिसमें शाम में व्रती के लिए गुड़ और चावल की खीर बनती है। इस दिन निर्जला व्रत होता है। इस व्रत में चीनी का उपयोग नहीं होता हैं। व्रती के खा लेने के बाद परिवार के लोग खरना का प्रसाद लेते हैं।
षष्ठी के दिन छठ की तैयारी में सुबह से परिवार के लोग लग जाते हैं। षष्ठी के दिन ही छठ का प्रसाद तैयार किया जाता है। जिसमें गुड़ में बना ठकुआ महत्वपूर्ण है। जैसाकि बताया गया है कि छठ प्रकृति से जुड़ा महापर्व है। इस महापर्व में प्रसाद में फलों की प्रमुखता दिखाई देती है। प्रसाद लाने और ले जाने के लिए बांस से बनी टोकरी, बांस का दौरा, बांस की सुपली, बांस का डगरा इस्तेमाल किया जाता है। फल में केला, नारियल, सेब, संतरा, नींबू, जल सिंघारा इसके अलावा बैंगन, मूली, अलूआ, सूथनी, हल्दी, अदरक, डाभ, नींबू छठ घाट पर चढ़ाया जाता है।
सप्तमी के दिन सूर्य की उपासना होती है। अर्घ्य के बाद घाट पर व्रती एक दूसरे से प्रसाद का आदान प्रदान करती हैं। उसके बाद घाट पर उपस्थित लोगों को प्रसाद दिया जाता है। फिर व्रती प्रसाद खाती हैं। प्रसाद खाने से पहले उन्हें शर्बत, जूस पीने के लिए दिया जाता है।
बिहार में छठ ऐसा पर्व है, जहां अस्पृश्यता का बोध नहीं है। छठ घाट पर यह दृश्य किसी को चौंकाता नहीं कि नदी में पुरुष के साथ स्त्री उतर कर सूर्य की उपासना कर रहे हैं। मिश्राजी, यादवजी और बैठाजी का दौरा एक दूसरे से लगकर रखा हुआ है और किसी को इस 'छू' जाने से शिकायत नहीं है। इतना ही नहीं। बिहार में मुस्लिम और क्रिश्चियन परिवारों में भी छठ व्रत रखने वालों की अच्छी संख्या है।
एक महत्वपूर्ण बात और। जिन बिहारियों की 'गंदगी फैलाने' की वजह से बिहार के बाहर पर्याप्त बदनामी है, उनके छठ घाट पर कहीं भी गंदगी नहीं मिलेगी। प्रकृति के इस महापर्व में स्वच्छता भी एक शर्त है, जिसका हर एक व्रती पूरा ध्यान रखती हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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