Chenab Railway Bridge: चलो दिलदार चलो, चिनाब के पार चलो
'धरती के स्वर्ग' तक रेलवे के पहुंचने की जो सबसे बड़ी बाधा थी, वह दूर हो गयी है। चिनाब नदी के उस पुल पर रेल पटरी बिछ गयी है जिसके सहारे पूरे देश के लोग 100 किमी की रफ्तार से दौड़ती ट्रेन पर सवार होकर कश्मीर जा सकेगें।

Chenab Railway Bridge: भारत में कहा जाता है कि देश देखना है तो रेलवे से यात्रा करो। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक 68 हजार किलोमीटर का रेलवे नेटवर्क आपको जिस बारीकी से देश दिखाता है, देश में हर प्रकार के लोगों से मिलवाता है, वैसा दूसरा कोई नहीं कर सकता। लेकिन यही रेलवे कुछ साल पहले तक जम्मू पहुंचकर रुक जाता था। उसके आगे की यात्रा या तो सड़क मार्ग से होती थी या फिर हवाई जहाज से। भारत की पहचान 'रेलवे' कश्मीर तक नहीं जाती थी।
कश्मीर तो नहीं लेकिन जम्मू 1897 में ही रेल नेटवर्क से जुड़ गया था। यह रेल नेटवर्क जम्मू कश्मीर के महाराजा प्रताप सिंह के प्रयास से सियालकोट से जम्मू (तवी) के बीच बनाया गया था। नैरो गेज का 43 किलोमीटर लंबा यह रेल नेटवर्क 1947 में बंटवारे के साथ ही बंद हो गया क्योंकि सियालकोट अब पाकिस्तान का हिस्सा बन गया था।
इसके बाद पंजाब के पठानकोट से जम्मू को जोड़ने की योजना बनी। 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के बाद भारत सरकार को लगा कि जम्मू कश्मीर तो पूरी तरह से रेल नेटवर्क से कटा हुआ है इसलिए इसी साल पठानकोट से जम्मू को जोड़ने के लिए रेल लाइन का निर्माण शुरु हुआ जो 1975 में पूरा हो गया। जम्मू तवी तो भारत के रेल नेटवर्क से 1975 में जुड़ गया लेकिन कश्मीर घाटी तक रेलवे का पहुंचना अभी भी कठिन था।
इसका कारण था जम्मू से कश्मीर के बीच रेल लाइन बिछाने के लिए एक कठिन भौगोलिक स्थिति। मुख्य रूप से पहाड़ों वाले इस इलाके से रेलवे लाइन ले जाना सबसे कठिन इंजीनियरिंग चुनौतियों में से एक था। फिर इसके लिए जितने भारी भरकम धन की जरूरत थी, उसे लेकर भी रेलवे का हाथ हमेशा तंग ही रहा। इसलिए कश्मीर तक रेलवे को ले जाने के लिए चरणबद्ध तरीके से काम करने की योजना बनायी गयी।
1983 में पहले चरण में जम्मू के ही ऊधमपुर तक 53 किलोमीटर रेल लाइन बिछाने का काम शुरु हुआ जो 2004 में पूरा हुआ। ऊधमपुर रेलवे लाइन का काम अभी बहुत धीमी गति से चल रहा था कि 1994 में कश्मीर के बारामुला तक रेलवे लाइन बिछाने का निर्णय ले लिया गया। जम्मू ऊधमपुर के बीच 53 किलोमीटर की रेल लाइन बिछाने के लिए 158 पुल बनाये गये और 20 बड़ी सुरंगे खोदी गयीं जिसमें सबसे लंबी सुरंग 2.5 किलोमीटर की है।
जब जम्मू से ऊधमपुर के बीच ही इतनी चुनौतियां थीं तो आगे अभी और विकट परिस्थिति आनी थी। कारगिल युद्ध के बाद सैन्य जरूरतों को देखते हुए अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इस रेलवे परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दे दिया था। स्वाभाविक है इससे काम की गति पर असर पड़ा और नये सिरे से विचार मंथन शुरु हुआ। 2008 में रेल मंत्रालय ने पहले से तय रूट में बदलाव की घोषणा की और कोंकण रेल निगम को कश्मीर तक रेल लाइन बिछाने का जिम्मा दे दिया।
कोंकण रेल निगम ने महाराष्ट्र के कोंकण और गोवा के बीच ऐसे ही चुनौतीपूर्ण मार्ग में रेल लाइन बिछाई थी इसलिए उसके अनुभव को देखते हुए ये काम उसे सौंपा गया। दूसरी ओर कश्मीर के भीतरी हिस्से में अक्टूबर 2009 तक काजीगुंड से बारामूला के बीच श्रीनगर होते हुए रेल सेवा शुरु कर दी गयी। एक दशक से भी अधिक समय से इस 112 किलोमीटर रेल लाइन पर लोकल ट्रेन का संचालन हो रहा है।
लेकिन रेलवे के सामने असली मुश्किल थी काजीगुंड से रियासी के बीच रेल लाइन को तैयार करना। लगभग 130 किलोमीटर लंबी इस रेल लाइन पर अंजी खंड रेल ब्रिज, चिनाब रेल ब्रिज, पीर पंजाल और संगलडैन में सुरंग का निर्माण करना था। पीर पंजाल सुरंग ही 11 किलोमीटर की है। हालांकि 2013 में कश्मीर की ओर से पीर पंजाल टनल और बनिहाल स्टेशन को भी चालू कर दिया गया। इस तरह बनिहाल से बारामूला तक रेल सेवा बहाल हो गयी। लेकिन असली चुनौती अभी भी बाकी थी।
रियासी से संगलडैन के बीच दो बड़े पुल बनाये बिना रेलवे का कश्मीर घाटी में प्रवेश करना मुश्किल था। इसमें एक था अंजी खड्ड ब्रिज और दूसरा 1315 मीटर लंबा चिनाब ब्रिज। अब ये दोनों पुल बनकर तैयार हैं। आर्च ब्रिज शैली में बनाये गये चिनाब ब्रिज पर 25 मार्च को रेलमंत्री ने खुद वहां पहुंचकर ट्राली ट्रॉयल लेने के बाद संभावना जताई कि इस साल दिसंबर या फिर अगले साल जनवरी में कश्मीर सीधे तौर पर पूरे देश से रेल सेवा से जुड़ जाएगा।
हालांकि अंजी खड्ड ब्रिज पर अभी काम चल रहा है और उम्मीद है कि जल्द ही इसका काम भी पूरा हो जाएगा। केबल स्ट्रे स्टाइल में डिजाइन किया गया यह ब्रिज भारत का ऐसा रेल ब्रिज है जो केबल पर आधारित है। आमतौर पर ऐसे ब्रिज सड़क मार्ग के लिए ही तैयार किये जाते हैं लेकिन भारत में पहली बार ऐसा हुआ है कि रेलवे लाइन पर इस तरह का ब्रिज तैयार हुआ है।
जहां तक चिनाब ब्रिज की बात है तो उसने अपने बनने के साथ ही कई रिकार्ड भी बनाये हैं। 359 मीटर ऊंचे ब्रिज के बारे में दावा यह किया जा रहा है कि यह दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे आर्च ब्रिज है। रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव के मुताबिक यह रेल ब्रिज जहां 8 रिक्टर स्केल पर भूकंप को झेलने के लिए सक्षम है वहीं 250 किलोमीटर तक की तेज हवाएं भी इसका कुछ नहीं बिगाड़ पायेंगी। कोंकण रेलवे कॉरपोरेशन, एफकॉन्स और डीआरडीओ द्वारा संयुक्त रूप से डिजाइन किये गये इस ब्रिज पर अब रेलवे लाइन बिछाई जा चुकी है और खुद रेलमंत्री ने ट्रॉली ट्रायल किया है।
निश्चय ही अगले साल भर के भीतर इसी ब्रिज के सहारे देश भर के लोग रेलवे के जरिए कश्मीर पहुंच सकेंगे। कश्मीर रेल परियेजना पूरी होने से जहां सैन्य साजो सामान के परिवहन में आसानी होगी वहीं धारा 370 हटने के बाद वास्तविक अर्थों में कश्मीर रेलमार्ग के जरिए पूरे देश से जुड़ जाएगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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