Cheetah Deaths: कूनो नेशनल पार्क में क्यों मर रहे हैं चीते?

Cheetah Deaths: 1952 में देश में विलुप्त करार दिए जाने के बाद 2009 में भारत सरकार ने अफ्रीकी चीता परिचय परियोजना के नाम से भारत में चीतों को बसाने का खाका तैयार किया था। नामीबिया सरकार से इसके लिए कागजी कार्रवाई भी हो गई थी किंतु कतिपय कारणों के चलते इसे बीच में रोक देना पड़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से 17 सितंबर, 2022 को जब पहली बार 8 नामीबियाई चीतों को मध्य प्रदेश के श्योपुर स्थित कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा गया तो पूरे देश में उत्सव सा माहौल था। वन्यप्रेमियों ने भारत में चीतों की आमद को खुले दिल से सराहा था।

इसके बाद 18 फरवरी, 2023 को दक्षिण अफ्रीका से लाए गए 12 चीतों को भी कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा गया। ऐसी योजना है कि अगले 10 साल में 100 चीते भारत लाए जाएंगे। पूरे एक माह तक चीतों की गतिविधियां राष्ट्रीय स्तर की सुर्ख़ियां बनी थीं किंतु इसके बाद मानो चीतों को किसी की नजर सी लग गई और बीते 5 महीनों में 8 चीतों की मौत हो चुकी है जिनमें से 3 शावक हैं। चीतों की मौत ने एक ओर जहां चीता परियोजना की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं वहीं विपक्ष ने इसे जल्दबाजी में उठाया कदम बताते हुए प्रधानमंत्री को "फोटोजीवी" कहा है। गौरतलब है कि पहली बार जब चीतों को कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा गया तो प्रधानमंत्री वहां उपस्थित थे।

Cheetah Deaths: Why are cheetahs dying in Kuno National Park?

विपक्ष का यह भी आरोप है कि मनमोहन सिंह सरकार के समय नामीबिया सरकार से चीतों को भारत में बसाने का जो समझौता हुआ था, उससे इसलिए भी पीछे हटा गया क्योंकि अफ्रीकी चीते भारत के पर्यावरण एवं मौसम में बदलाव के आदी नहीं हैं और यहां उनका सर्वाइवल रेट बहुत कम होगा। विपक्ष के अनुसार प्रधानमंत्री की जिद ने 8 चीतों की बली ले ली है। चीतों की मौत पर हो रही राजनीति से इतर यह प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में भाजपानीत केंद्र सरकार ने अफ्रीकी चीतों को भारत में बसाने का निर्णय जल्दबाजी में लिया था? क्या विपक्ष के प्रश्नों से परे जाकर प्रधानमंत्री ने अपनी जिद पूरी की?

कूनो में कब-कब हुई चीतों की मौत?

कूनो नेशनल पार्क में पहली मौत 27 मार्च, 2023 को नामीबिया से लाई गई 5 साल की मादा चीता शासा की हुई। चिकित्सकों ने उसकी मौत का कारण किडनी का संक्रमण बताया। हालाँकि जिस दिन मादा शासा की मौत हुई, उसी दिन नामीबिया से लाई गई चीता ज्वाला ने चार शावकों को जन्म दिया जिससे शासा की मौत का दुःख कुछ कम हुआ। शासा की मौत को एक महीने भी नहीं हुआ था कि दक्षिण अफ्रीका से लाए गए 6 साल के चीता उदय ने 23 अप्रैल, 2023 को दम तोड़ दिया।

9 मई, 2023 को दक्षिण अफ्रीका से लाई गई मादा चीता दक्षा की भी मौत हो गई। दक्षा की मौत को 'सेक्स के दौरान नर चीतों द्वारा हमला' करना बताया गया। 27 मार्च, 2023 को जन्मे 4 शावकों में से एक की मौत 23 मई, 2023 को हुई जबकि 25 मई, 2023 को दो अन्य शावकों ने भी दम तोड़ दिया। बाकी बचे एक शावक की हालत नाजुक है जिसे बचाने के प्रयास किए जा रहे हैं। 11 जुलाई, 2023 को दक्षिण अफ्रीका से लाए गए चीता तेजस की मौत हुई जबकि 14 जुलाई, 2023 को दक्षिण अफ्रीका से लाए गए चीता सूरज ने दम तोड़ दिया। चीता सूरज की मौत का कारण गर्दन पर हुए संक्रमण को माना जा रहा है। अब तक आठ चीतों की मौत से दहल उठे कूनो नेशनल पार्क में अब चीतों की सेहत को लेकर विशेष सावधानियां बरती जा रही हैं।

चीतों की मौत का कारण क्या है?

कूनो नेशनल पार्क में लगातार हो रही चीतों की मृत्यु के पीछे कई वजह सामने आई हैं। अव्वल तो जो चीते नामीबिया या दक्षिण अफ्रीका से यहां लाए गए उन्हें लाने से पूर्व वहां कम से कम पांच माह तक बाड़े में बंद किया गया। इसके पश्चात जब वे भारत आए तो यहां भी एक माह तक बाड़े में बंद रहे। चीता तेज दौड़ने, झपट्टा मार कर शिकार करने और स्वच्छंद विचरण के लिए जाना जाता है। उसका यही स्वभाव उसकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। ऐसे में 7-8 माह तक बाड़े में बंद रहने से उनकी रोगों से लड़ने की क्षमता कम हुई है।

बाड़े में बंद रहने से चीते अधिक गुस्सैल भी हुए हैं और जब उन्हें बाड़े से छोड़ा गया तो वे एक-दूसरे पर गंभीर हमला करके चोट पहुंचा रहे हैं। मादा दक्षा की मौत का कारण संभोग प्रयास के दौरान नर चीते के हिंसक व्यवहार से हुई। इसके अलावा चीते उदय की मौत का कारण कार्डिओ विफलता रही वहीं चीते सूरज की मृत्यु के बारे में कहा जा रहा है कि उसकी गर्दन पर लगाए गए कॉलर रेडियो के चलते उसे संक्रमण हुआ जो बाद में पूरे शरीर में फैल गया।

चीता शावकों के मौत की बात करें तो पूरे विश्व में चीता शावकों के जंगल में जिंदा रहने की संभावना केवल 10 से 20 प्रतिशत होती है। एक अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, 54 प्रतिशत चीतों की मौत का कारण आपसी लड़ाई या शिकार होता है जबकि 7.5 प्रतिशत चीते रिलोकेशन के कारण मर जाते हैं। बाड़े में बंद करने से 6.5 प्रतिशत चीतों की मौत होती है वहीं एक प्रतिशत से कम चीते ट्रैकिंग डिवाइस यानि कॉलर रेडियो के कारण मर जाते हैं। कूनो में मारे गए अधिकांश चीतों में ये समानताएं मिली हैं।

वहीं, भारत समेत एशिया में पाई जाने वाली चीते की "एशियाई प्रजाति" मात्र ईरान में बची है और बीते 50 वर्षों से ईरान से चीते लाने की भारत की कोशिशें परवान नहीं चढ़ पाई हैं। एशियाई चीतों के लिए भारत उनका अपना घर होता किंतु नामीबिया और अफ्रीकी चीतों को यहां के मौसम से सामंजस्य बिठाना कठिन हो रहा है। एक चीते की मृत्यु का कारण मौसमीय परिवर्तन, अत्यधिक उमस और शरीर में पानी की बेहद कमी होना भी बताया गया है जो इस बात की पुष्टि करता है कि भारत की जलवायु उन्हें कमजोर कर रही है। हालांकि इसकी संभावना पूर्व में भी अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों द्वारा जताई गई थी किंतु साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि चीते देर-सवेर अपना सरवाईवल रेट बढ़ा लेंगे और यहां के मौसम के अनुकूल ख़ुद को ढाल लेंगे।

विशेषज्ञों की राय और केंद्र के प्रयास

चीतों की लगातार हो रही मौतों के बीच नामीबिया संरक्षण कोष का कहना है कि भारत में चीतों ने जीवित रहने की हर क्षमता दिखाई है। आगे लंबी लड़ाई तथा अधिक असफलताएं आएंगी, किंतु अफ्रीका में सबसे लंबे समय तक चलने वाली चीता संरक्षण परियोजना के परिप्रेक्ष्य से भारत में चीजें अच्छी तरह से आगे बढ़ रही हैं। हालांकि एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार नामीबिया में लीबनिज आईजेडडब्ल्यू के चीता रिसर्च प्रोजेक्ट के शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों ने कहा है कि पुनर्वास कार्यक्रम में स्थानिक पारिस्थितिकी को नजरअंदाज किया गया है और कूनो नेशनल पार्क इन बड़े जानवरों के लिए बहुत छोटा है। वहीं केंद्र सरकार के राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने चीतों की मौत को लेकर दो साल के लिए एक कमेटी का गठन किया है जिसमें 4 विदेशी विशेषज्ञों सहित कुल 15 विशेषज्ञ शामिल हैं।

कमेटी में भारत को चीते देने वाले सीसीएफ की प्रमुख नामीबिया की लॉरी मार्कर के साथ दक्षिण अफ्रीका के विशेषज्ञ भी चीतों की मौत का पता लगाएंगे। कमेटी का मुख्य काम चीतों की प्रोग्रेस और मॉनिटरिंग की समीक्षा करना है जिसके लिए कमेटी हर माह एक बैठक करेगी। ऐसा नहीं है कि केंद्र सरकार सहित मध्य प्रदेश शासन चीतों की देखभाल में कोई कमी छोड़ रहा हो किंतु चीतों की मौतों ने जो सवाल खड़े किए हैं उनका उत्तर भी जनता के सामने आना चाहिए। कमेटी यदि ईमानदारी से अपना काम करेगी तो कूनो में बाक़ी बचे चीतों को बचाया जा सकता है, अन्यथा भारत से एक बार फिर चीता प्रजाति विलुप्त हो जाएगी जिसका संदेश विश्व में अच्छा नहीं जाएगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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