ChatGPT Fake News: चैट जीपीटी का बढ़ता प्रसार, गलत सूचनाओं की हुई भरमार
पहले ही फेक न्यूज से त्रस्त समाज के लिए एआई एक नए खतरे के रूप में उभर रहा है जहां गलत सूचनाओं की भरमार है। इसके द्वारा प्राप्त की गयी कई सूचनाएं अविश्वसनीय और भेदभावपूर्ण हैं।

ChatGPT Fake News: कहते हैं कि हजार सच मिलकर भी समाज का जितना भला नहीं कर सकते, उससे ज्यादा बुरा एक झूठ कर देता है। फेक न्यूज, यानी फर्जी समाचार इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण हैं। सूचना और समाचार उद्योग में कई ऐसे भी प्लेयर हैं, जिनका समूचा अस्तित्व ही मिस-इन्फॉर्मेशन, डिस- इन्फॉर्मेशन के प्रचार-प्रसार पर टिका है। पहले इनका धंधा सोशल मीडिया से पनप रहा था, अब एआई के बढ़ते चलन ने इसे और धार दे दी है। एआई इस काम में उनका दो तरह से मददगार साबित हो रहा है। फर्जी सामग्री के सृजन में भी और प्रसार में भी। और यह बीमारी, अब धीरे-धीरे महामारी का रूप ले रही है।
पिछले सप्ताह ऑनलाइन फर्जी सूचनाओं की मॉनीटरिंग करने वाली न्यूजगार्ड ने एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें आगाह किया गया है कि फेक ऑनलाइन कंटेंट तैयार करने के लिए दर्जनों न्यूज वेबसाइट आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल कर रही हैं। इस तरह की एआई रचित सामग्री में मनगढंत आयोजन, काल्पनिक उपद्रवों, मशहूर हस्तियों की मौत आदि से जुड़ी झूठी खबरें शामिल हैं। न्यूजगार्ड ने ऐसी 125 वेबसाइटों को चिन्हित किया है। ये दस भाषाओं में कंटेंट परोसती हैं।
फेक न्यूज या डिस-इन्फॉर्मेशन (अपने फायदे या दूसरों को नुकसान पहुँचाने के मकसद से फैलाई जाने वाली गलत सूचनाएं) को लेकर यह चिंता नई तो नहीं है, लेकिन पिछले कुछ समय से इसने काफी गंभीर रूप ले लिया है। यही वजह है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के गॉडफादर जेफ्री एवरेस्ट हिंटन को कहना पड़ रहा है कि एआई की खोज उनकी सबसे बड़ी गलती थी। और आज हिंटन एआई के दुरुपयोग के खिलाफ मजबूती से खड़े नजर आ रहे हैं। हिंटन को भी सबसे ज्यादा जिस बात की फिक्र है, वह यही है कि एआई की वजह से वह समय बहुत तेजी से करीब आ रहा है, जब इंटरनेट इस कदर झूठी खबरों, तस्वीरों और वीडियो से भर जाएगा कि लोग समझ ही नहीं पाएंगे कि क्या सच है और क्या झूठ है।
कभी मिडास, कभी भस्मासुर
मौजूदा दौर में चैट जीपीटी दुनिया का सबसे लोकप्रिय एआई प्रोग्राम है। इसे ओपेन एआई नाम की कंपनी ने बनाया है और माइक्रोसॉफ्ट ने इसमें एक बिलियन डॉलर का निवेश किया है। ओपेन एआई के सीईओ हैं सैम एल्टमैन। जिस समय ओपेन एआई ने आर्टिफिशियल जेनरेटिव इंटेलिजेंस (एजीआई) की दुनिया में प्रवेश किया था, उस समय उन्हें सब कुछ हरा-हरा ही नजर आ रहा था। लेकिन, अब उन्हें अहसास होने लगा है कि उनका बनाया मिडास, भस्मासुर साबित हो सकता है। मिडास और भस्मासुर में बस यही फर्क है कि पहले के स्पर्श से हर चीज सोना बन जाती है और दूसरे के स्पर्श से राख। और जब ये दोनों खूबियॉं एक ही चीज में मौजूद हों तो कब क्या हो जाएगा, कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।
सैम एल्टमैन भी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि उन्होंने जो टेक्नोलॉजी दुनिया को दी है, उसका इस्तेमाल गलत सूचनाएं फैलाने और दुनिया को बर्बाद करने में हो सकता है। हालांकि वे आशान्वित भी हैं कि इस समस्या से निपटने का कोई न कोई रास्ता जरूर खोज लिया जाएगा। हो सकता है कि उनका सोचना सही हो। लेकिन, तब तक यह चलन हमें कितना नुकसान पहुँचा चुका होगा, इसका आकलन कैसे किया जाएगा।
हमसे ही सीखता है एआई
इन खतरों की आहट सबको सुनाई तो दे रही है, लेकिन, कुछ लोग इसके सम्मोहन से बाहर आने के लिए तैयार नहीं है। आज हालत यह है कि हम एआई प्रोग्रामों को खबरें तैयार करते देख रहे हैं, न्यूजरूम में बैठकर समाचार पढ़ते सुन रहे हैं, एडीटिंग कर रहे हैं, आर्टिकल लिख रहे हैं। लेकिन, उनकी सूचना का स्रोत क्या हैं? कृत्रिम बुद्धिमत्ता कोई मनस्वी-तपस्वी नहीं है, जिसे वर्षों की साधना के बाद सत्य का बोध होता हो। वह हमारे जैसे हजारों, लाखों या शायद करोड़ों इंसानों से सीख-सीख कर ही इतना सर्वज्ञानी बन रहा है। वह वही सीख रहा है, जो हम उसे सिखाना चाहते हैं।
मान लीजिए कि आप चैट जीपीटी इस्तेमाल करते हुए उससे पूछते हैं कि सूर्य किस दिशा से उदित होता है। वह कहेगा कि पूर्व से। अब आप चाल चलते हैं और उससे कहते हैं कि वह गलत कह रहा है। सूरज तो उत्तर दिशा में उगता है। वह तुरंत क्षमायाचना करेगा और आपसे कहेगा कि आप ठीक कह रहे हैं। मेरी जानकारी गलत है। सूर्य उत्तर दिशा में उगता है। यह चीज उसकी कृत्रिम मेमोरी में बैठ गई। अब आपके बाद कोई और व्यक्ति उससे यही सवाल करता है तो इस बात की भी काफी आशंका है कि वह जवाब में सूर्य को उत्तर दिशा में उगता हुआ बताए। हो सकता है कि यह उदाहरण आपको बहुत सरल लगे, लेकिन बात उस पैटर्न की है, जिसे कोई भी, कभी भी और कहीं से भी प्रभावित कर सकता है।
बेअसर-बेमतलब चेतावनी
चैटजीपीटी खोलिए तो आपको सबसे पहले कुछ डिस्क्लेमर पढ़ने को मिलते हैं। जिनके मुताबिक यह उपयोगकर्ता की पहले कही गई बातों को याद रखने, उनके सुझावानुसार गलती सुधारने और उनके अनुपयुक्त अनुरोधों को ठुकराने में सक्षम है। साथ ही वह आगाह भी करता है कि वह कभी-कभी गलत सूचना जेनरेट कर सकता है, घातक निर्देश या पूर्वाग्रही सामग्री दे सकता है । गूगल का बार्ड भी कुछ ऐसा ही कहता है कि उसकी भी सीमाएं हैं। जरूरी नहीं कि वह हमेशा सही हो, लेकिन हमारा फीडबैक उसे इम्प्रूव करने में मदद करेगा। इसके बावजूद, लोग धड़ल्ले से इन चैटबॉट का उपयोग करते हैं, इन पर विश्वास करते हैं और इनका अनुसरण करते हैं। यह चेतावनी वैसी ही बेमानी है जैसी सिगरेट, शराब, गुटखे के पैकेटों पर या गैंबलिंग एप्प के साथ लिखी चेतावनियॉं होती हैं। इन्हें लोग देखते तो हैं, लेकिन पढ़ते नहीं और अगर पढ़ भी लें तो गंभीरता से तो बिल्कुल भी नहीं लेते।
आम लोग अगर एआई से मिली गलत जानकारियों पर विश्वास करते हैं तो वे सिर्फ खुद को, या ज्यादा से ज्यादा अपने आस-पास के एक सीमित जन-समूह को नुकसान पहुँचाते हैं। लेकिन, जब यही विश्वास सूचना या जनसंचार माध्यमों से जुड़े लोग करेंगे तो इसका नुकसान पूरे देश, समाज या दुनिया को पहुँच सकता है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी में मीडिया के प्रोफेसर फ्रांसेस्को मार्कोनी ने अपनी किताब 'न्यूज़मेकर्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एंड द फ्यूचर' में लिखा है कि पत्रकारिता का भविष्य और इसका अस्तित्व एआई में निहित हो सकता है। वर्ष 2019 में, 'लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स' ने 32 देशों के 71 मीडिया संस्थानों के साथ साक्षात्कार कर 'पत्रकारिता और एआई' विषय पर एक ग्लोबल सर्वे पब्लिश किया था। सर्वे का एक निष्कर्ष यह भी था कि 'एआई' टूल के इस्तेमाल से पत्रकारिता को एक गतिशील तरीके से नया रूप मिलेगा। लेकिन, यह समाज, लोकतंत्र और जनहित पर भी गहरा प्रभाव डालेगा।
पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो सकता है एआई का एल्गोरिदम
एआई जिस एल्गोरिदम पर काम कर सकता है वह झूठ बोल सकता है, गुमराह कर सकता है। क्योंकि उसकी प्रोग्रामिंग तो मनुष्यों ने ही की है, जिनके पास पूर्वाग्रह हैं। तथ्यों की वास्तविकता कब तर्कों के तले दम तोड़ने लगती है, उपयोग करने वाला भला कैसे जान सकता है। खासकर तब, जब उसकी सूचनाओं का एकमात्र स्रोत एआई ही रह गया हो।
जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्तंभकार और टिप्पणीकार लगातार एआई को सब मर्जों की दवा के रूप में स्थापित करते जा रहे हैं, उससे इसकी लोकप्रियता और उपयोग में बहुत बढ़ोतरी हुई है। जानकारियों के अन्य स्रोतों में उनकी दिलचस्पी घट रही है, और एआई टूल्स पर उनकी निर्भरता बढ़ रही है। कभी-कभी तो लगता है कि कहीं यह किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा तो नहीं, जिसके अंतर्गत लोगों को एआई की लत लगा दी जाएगी। इसके बाद जब बाकी सारे स्रोत हाशिए पर पहुँच जाएंगे तो लोग हर उस बात पर यकीन करेंगे, जो एआई के जरिए उन्हें बताई जाएगी।
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इस आशंका को सिर्फ एक कॉन्सपिरेसी थ्यौरी कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। पिछले महीने हमने खुद देखा है कि कैसे इटली ने चैट जीपीटी के इस्तेमाल पर बैन लगाया था। इटली के अलावा चीन, उत्तर कोरिया, ईरान, रूस और सीरिया जैसे देशों ने भी इस पर बैन लगाया हुआ है। इनमें अधिकतर की सबसे पहली चिंता यही है कि चैटजीपीटी उन्हें लेकर गलत नैरेटिव और झूठी जानकारियां फैला सकता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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