Chandrayaan 3: उम्मीदों और आशंकाओं के बीच चंद्रयान-3 की उड़ान

Chandrayaan 3: भारत का महत्वाकांशी मिशन चंद्रयान 3 उड़ान भरने के लिए तैयार है। चंद्रमा के बारे में जानकारी बढ़ाने के हमारे इस तीसरे प्रयास को इसकी मंजिल तक पहुंचाएगा, इसरो का नया प्रक्षेपण यान एल वी एम-3 (लॉन्च व्हीकल मार्क-3) सिस्टम। तारीख 14 जुलाई, समय दोपहर के 2.35 बजे और स्थान, सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र श्रीहरिकोटा। रॉकेट लांच होने से पहले ही सभी का दिल धक-धक कर रहा है। यह धकधक अगले दो हफ्ते तक जारी रहेगी, जब तक इसरो चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग नहीं करा लेता।

ज्ञातव्य है कि अभी तक चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग के 38 प्रयास हो चुके हैं, जिनमें 52% ही सफल रहे हैं। सॉफ्ट लैंडिंग में किसी विमान, रॉकेट या स्पेसशिप को इस तरह किसी सतह पर उतारा जाता है, जिससे वाहन या उसके पे लोड को ज्यादा क्षति न पहुँचे।

Chandrayaan 3 will be launched on july 14 between hopes and apprehensions

उम्मीदें भी, आशंकाएं भी

ऐसे दौर में जब भारत विश्व भर में एक स्पेस सुपर पॉवर के रूप में अपनी पहचान बना रहा है, हम लोगों को अपनी क्षमताओं पर संदेह क्यों हो रहा है? क्यों हमें द न्यूयॉर्क टाइम्स में हाल ही में छपी वह खबर आश्वस्त नहीं कर पा रही, जिसमें उसने भारत के महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष कार्यक्रम की सराहना की है।

इसका जवाब है पिछले चंद्र मिशन को लेकर हमारा अनुभव। वो कहते हैं ना कि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है। इस बार हम अति उत्साह का परिचय देने से बच रहे हैं। जीत मिलने से पहले ही पटाखा छोड़ना शुरू कर देने वाले लोगों के देश में यह खामोशी थोड़ी अजीब लग सकती है। लेकिन, कुछ मौके ऐसे होते हैं, जब शांति हमारे लिए सुरक्षा कवच का काम करती है। यह एक ऐसा ही अवसर है।

संदेह के घेरे में नासा का पहला मिशन मून

ऐसे अवसर पहले भी कई बार दुनिया के सामने आ चुके हैं। अपोलो-11, जो चंद्रमा की सतह पर उतरने वाला विश्व का पहला अंतरिक्षयान था, वह भी सवालों से घिरा हुआ था। अमेरिका पर आरोप है कि उसने रूस (तब सोवियत संघ) को नीचा दिखाने के लिए नवादा के रेगिस्तान में ऐसा दृश्य रचा था। अमेरिका के एक पूर्व नौसेना अधिकारी बिल केसिंग ने अपनी किताब 'बी नेवर वेंट टू द मून' में इस मिशन के वास्तविक होने पर संदेह प्रकट किया था। अपने शक की पुष्टि करने के लिए केसिंग ने कई अकाट्य तर्क भी प्रस्तुत किए थे। 1980 में फ्लैट अर्थ सोसाइटी ने भी मिशन पर सवाल उठाए हैं। 21 जुलाई को इस मिशन को 54 साल होने जा रहे हैं, पर ये सवाल आज भी नासा और अमेरिका का पीछा नहीं छोड़ रहे।

जैसे कि, चंद्रमा पर वायुमंडल नहीं है तो फोटो में अमेरिका का झंडा कैसे लहरा रहा है? ऐसा कैसे मुमकिन है कि चार टन वर्जन वाले अंतरिक्ष यान के निशान चंद्रमा की सतह पर नहीं थे, जबकि आमस्ट्रांग के पैरों के निशान वहाँ नजर आ रहे हैं। आर्मस्ट्रांग की फोटो किसने खींची, क्योंकि उनके हेलमेट के काँच में दूसरा अंतरिक्ष यात्री काफी दूर खडा नजर आ रहा है, जबकि कायदे से फोटो खींचने वाले का अक्स वहां दिखाई देना चाहिए था।

अपोलो-11 के करीब दस महीने पहले सितंबर 1968 में सोवियत संघ ने जॉन्ड - 5 स्पेसशिप चाँद पर भेजा था, जिसमें कुछ कछुए सवार थे। छह दिनों तक चंद्रमा के चक्कर लगाने के बाद यह क्रेश हो गया और हिंद महासागर में आ गिरा। दिलचस्प बात यह है कि इसके मलबे में, यान में सवार कछुए जीवित मिले। इससे पहले 12 सितंबर 1959 को लूना -2 लॉन्च किया गया था, जो दो दिन बाद चांद की सतह से टकरा गया। इसलिए चंद्रमा की सतह पर सफलतापूर्वक उतरने और सकुशल वापस लौटने वाला पहला यान होने का सेहरा अपोलो-11 के सिर बांधा गया।

68 सफल, 42 असफल मिशन

चंद्रमा पर अब तक 110 मिशन जा चुके हैं। इनमें 42 असफल रहे हैं। रूस और अमेरिका भी 40 से ज्यादा बार असफल रहने के बाद चंद्रमा को छू पाए थे। फिर सितंबर 2019 में, चंद्रयान-2 के असफल होने को हमने इतना ज्यादा दिल पर क्यों ले लिया? क्या यह सिर्फ एक मिशन का फेल होना नहीं था? शायद नहीं, क्योंकि चंद्रयान-2 के साथ हमारा एक बड़ा सपना भी जुड़ा था, जिसका टूटना, हमारे लिए इस मिशन की विफलता से ज्यादा आहत करने वाला था। यह सपना था अमेरिका, रूस और चीन के बाद, चंद्रमा की सतह पर उतरने वाला विश्व का चौथा देश बनने का। यही नहीं अगर चंद्रयान-2, चंद्रमा की सतह पर उतरने में सफल हो जाता तो इसके दक्षिणी ध्रुव पर यान उतारने वाला विश्व का पहला देश भारत होता।

लेकिन, चीजें हर बार ऐसी नहीं होतीं, जैसी कि हमने प्लान की होती हैं। 7 सितंबर 2019 को जब चंद्रयान-2 अपनी मंजिल के करीब पहुँचने ही वाला था तो सतह से करीब दो किमी दूरी पर इसके विक्रम लैंडर का, पृथ्वी पर मौजूद मिशन कंट्रोल स्टेशन से संपर्क टूट गया। और इसी के साथ टूट गए उन असंख्य भारतीयों के दिल, जिन्होंने इस ऐतिहासिक पल का साक्षात करने के लिए पूरी रात जागते हुए टीवी के सामने बिताई थी। अब वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बधाई की जगह, रोते हुए इसरो प्रमुख के. सिवन को दिलासा देते हुए देख रहे थे।

जहाँ तक चंद्रयान 1 का प्रश्न है तो उसे चंद्रयान-2 के 11 साल पहले, 22 अक्टूबर 2008 को छोड़ा गया था। इसने चंद्रमा के चारों ओर 3400 से ज्यादा चक्कर लगाए, लेकिन 10 माह बाद, 29 अगस्त 2009 को इसके साथ सम्पर्क टूट गया। और इसरो को 'मिशन समाप्त' की घोषणा करनी पड़ी। एक आंशिक सफल और एक असफल चंद्र अभियान के अनुभवों से सबक लेते हुए इसरो इस अभियान की सफलता सुनिश्चित करने के लिए बहुत एहतियात बरत रहा है।

अनुभव से सबक

पिछले मिशन मून के दौरान जो गड़बड़ियां हुईं , उनकी पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए इसरो की टीम ने इससे संबंधित डेटा का चार साल तक गहन अध्ययन किया है और इसके आधार पर कुछ सुधारात्मक उपाय किए हैं। इनमें एक सिस्टम के काम न करने पर दूसरे सिस्टम से डेटा लेने की योजना, हाई लैंडिंग वेलोसिटी का सामना करने के लिए लैंडर के लेग डिजाइन में बदलाव, अतिरिक्त मार्जिन निर्माण, डिप्रेशन लेवल और रोबस्टनेस मार्जिन में वृद्धि आदि शामिल हैं। इसके अलावा चंद्रयान 3 को सफल बनाने के लिए लेजर और इन्फ्रारेड तरंगों वाले ऑल्टीमीटर, वेलोसीमीटर कैमरा, एक्सेलोमीटर पैकेज, नेवीगेशन गाइडेंस एंड कंट्रोल, खतरों को डिटेक्ट और दूर करने की प्रणाली आदि का इस्तेमाल किया जाएगा।

चंद्रयान-3 का उद्देश्य चंद्रमा के पर्यावरण का अध्ययन और वहाँ की मिट्टी का रासायनिक विश्लेषण है। इसके साथ जा रहे रोवर में अल्फा पार्टिकल स्पेक्ट्रोमीटर और लेजर इंड्यूज्ड ब्रेकडाउन स्पेक्ट्रोस्कोप मौजूद हैं जो लैंडिंग साइट के आसपास की संरचना के अध्ययन में मदद करेंगे।

चंद्रयान-2 मिशन के खराब प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने एक बात कही थी, "विज्ञान में हर कदम केवल प्रयास और प्रयोग है, विफलता नहीं।" वास्तव में नतीजों से ज्यादा हमारे प्रयासों की अहमियत होती है। इसरो का हर कदम भी उसके प्रयासों को एक नई ऊंचाई दे रहा है। इन्हीं प्रयासों और प्रयोगों का नतीजा है कि भारत आज अंतरिक्ष अभियानों के लिए हुई उस अंत:महाद्वीपीय अबाध्यकारी संधि का हिस्सा है जिसमें उसके अलावा 26 अन्य देश एक-दूसरे का सहयोग करने के लिए एकजुट हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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