चंद्रशेखर आजाद का सदैव आभारी रहेगा आजाद भारत
उस समय बालक चंद्रशेखर की उम्र मात्र 14 साल की थी। गांधी ने देश में असहयोग आंदोलन की घोषणा की थी। बालक चंद्रशेखर ने इस आंदोलन के बारे में सुना तो वह भी आंदोलन में शामिल होने निकल पड़ा। दिसंबर 1921 में उसकी गिरफ्तारी हुई और उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। मजिस्ट्रेट ने उस बालक से पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है? बालक चंद्रशेखर ने उत्तर दिया: आजाद। मजिस्ट्रेट ने फिर पूछा तुम्हारे बाप का नाम क्या है? उस बालक ने उत्तर दिया: स्वतंत्रता। मजिस्ट्रेट का तीसरा सवाल था, तुम्हारी मां का नाम क्या है? बालक ने जवाब दिया: भारतमाता। मजिस्ट्रेट अब चौथा सवाल पूछा, तुम्हारा घर कहां है? बालक ने जवाब दिया: जेल। किसी 14 साल के बच्चे से ऐसे जवाब की उम्मीद शायद मजिस्ट्रेट को भी न रही हो। उसने इस बालक को उसकी जेल वाले घर तो नहीं भेजा लेकिन 15 कोड़े लगाने का आदेश दिया। उस कच्ची उम्र में उसने अपनी पीठ पर 15 कोड़े उस स्वतंत्रता के लिए खाया जो जब आयी तो उसका स्वागत करने के लिए वह बालक इस दुनिया में नहीं था।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद का नाम सदैव सम्मान से लिया जाता है। काकोरी ट्रेन डकैती और सांडर्स की हत्या में शामिल निर्भय क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को उन्नाव (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। चंद्रशेखर आजाद का वास्तविक नाम चंद्रशेखर तिवारी था। चंद्रशेखर का प्रारंभिक जीवन वर्तमान मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र भावरा गांव में व्यतीत हुआ। वहां पढाई से ज्यादा उनका मन खेलकूद व्यायाम और धनुष बाण चलाने में लगता था। चंद्रशेखर आजाद की मां जगरानी देवी उन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहती थीं, इसीलिए उन्हें संस्कृत सीखने लिए काशी विद्यापीठ भेजा गया। यहीं बनारस में उन्होंने पहली बार असहयोग आंदोलन में भाग लिया और उनके साथ वह घटना हुई जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है।
1922 में गांधी ने असहयोग आंदोलन को स्थगित कर दिया। इस घटना ने चंद्रशेखर आजाद को आहत किया। एक युवा क्रांतिकारी प्रनवेश चटर्जी ने उन्हें हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन जैसे क्रांतिकारी दल के संस्थापक राम प्रसाद बिस्मिल से मिलवाया। आजाद बिस्मिल के स्वतंत्रता और समानता जैसे विचारों से बहुत प्रभावित हुए। चंद्रशेखर आजाद के समर्पण और निष्ठा की पहचान करने के बाद बिस्मिल ने उन्हें अपनी संस्था का सक्रिय सदस्य बना दिया। इसके बाद वो सक्रिय रूप से स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों में शामिल हो गये। लाला लाजपत राय की हत्या का बदला लेने के लिए चंद्रशेखर आजाद ने अपने साथियों के साथ मिलकर सांडर्स की हत्या कर दी। जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद तो उन्होंने सशस्त्र आंदोलन को ही अपना मार्ग बना लिया।
1925 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना की गई। इसी साल काकोरी कांड हुआ जिसके आरोप में अशफाक उल्ला खां, बिस्मिल समेत अन्य मुख्य क्रांतिकारियों को मौत की सजा सुनाई गई। इसके बाद वो भगवतीचरण वोहरा के संपर्क में आये जिसके बाद चंद्रशेखर आजाद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के भी निकट आ गए थे। चंद्रशेखर आजाद का व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि उनके भीतर इतनी कम उम्र में ही वो अपने समूह के बीच स्वाभाविक नेतृत्व देते थे। उनके आसपास के क्रांतिकारी साथी उन्हें सेनापति के नाम से संबोधित करते थे।
इन्हीं क्रांतिकारियों में एक शिव वर्मा भी थे जिनसे चंद्रशेखर आजाद की काकोरी कांड के बाद कानपुर में ही मुलाकात हुई। शिव वर्मा स्वतंत्रता के बाद पचास सालों तक जीवित रहे और उन्होंने अपने क्रांतिकारी साथियों के बारे में बहुत कुछ लिखा भी। शिव वर्मा अपने एक ऐसे ही संस्मरण में लिखते हैं कि एक बार कुछ क्रांतिकारी साथी बैठकर बातें कर रहे थे। पकड़े जाने पर फांसी के फंदे पर लटकने की चर्चा चली तो किसी ने कहा कि आजाद की गर्दन ही इतनी मोटी है कि अंग्रेजों को दो रस्सों फंदा लगाना होगा। इस बात से चंद्रशेखर आजाद इतने उत्तेजित हुए कि वहीं उनके बीच ऐलान कर दिया कि ब्रिटिश सरकार कभी जीते जी आजाद को नहीं पकड़ पायेगी।
हुआ भी वही जैसा आजाद ने कहा था। 1931 में फरवरी के अंतिम सप्ताह में जब आजाद गणेश शंकर विद्यार्थी से मिलने सीतापुर जेल गए तो विद्यार्थी ने उन्हें इलाहाबाद जाकर जवाहर लाल नेहरू से मिलने को कहा। चंद्रशेखर आजाद जब नेहरू से मिलने आनंद भवन गए तो उन्होंने बात सुनने से भी इंकार कर दिया। गुस्से में वहां से निकलकर चंद्रशेखर आजाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ अल्फ्रेड पार्क चले गए। वे सुखदेव के साथ आगामी योजनाओं के विषय में बात ही कर रहे थे कि पुलिस ने उन्हे घेर लिया। लेकिन उन्होंने बिना सोचे अपनी जेब से पिस्तौल निकालकर गोलियां दागनी शुरू कर दी। दोनों ओर से गोलीबारी हुई। चंद्रशेखर के पास जब मात्र एक ही गोली शेष रह गई तो उन्हें पुलिस का सामना करना मुश्किल लगा। चंद्रशेखर आजाद ने पहले ही यह प्रण किया था कि वह कभी भी जिंदा पुलिस के हाथ नहीं आएंगे। इसी प्रण को निभाते हुए उन्होंने वह आखिरी गोली खुद की कनपटी पर मार ली।
जब चंद्रशेखर आजाद ने अपने प्राण मातृभूमि के लिए न्यौछावर किये तब उनकी आयु मात्र 24 साल की थी। 14 साल की उम्र में पहली बार स्वतंत्रता संघर्ष का हिस्सा बननेवाले चंद्रशेखर आजाद 24 साल की उम्र में ही संसार से विदा हो गये। लेकिन इन दस सालों में भारत की स्वतंत्रता के लिए उनकी सक्रियता और सहयोग ने आजाद भारत को उनका ऋणी बना दिया। आजाद भारत चंद्रशेखर आजाद का सदैव आभारी रहेगा। चंद्रशेखर आजाद को सम्मान देने के लिए उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकारों ने कुछ काम जरूर किये हैं लेकिन अभी भी उस महान क्रांतिकारी का सम्यक सम्मान होना बाकी है। चंद्रशेखर आजाद के बारे में खण्डकाव्य लिखनेवाले श्रीकृष्ण सरल लिखते हैं:
चन्द्रशेखर नाम, सूरज का प्रखर उत्ताप हूँ मैं,
फूटते ज्वालामुखी-सा, क्रांति का उद्घोष हूँ मैं।
कोष जख्मों के लगे इतिहास के जो वक्ष पर हैं,
चीखते प्रतिरोध का जलता हुआ आक्रोश हूँ मैं।
विवश अधरों पर सुलगता गीत हूँ विद्रोह का मैं,
नाश के मन पर नशे जैसा चढ़ा उन्माद हूँ मैं।
मैं गुलामी का कफन, उजला सपन स्वाधीनता का,
नाम से आजाद, हर संकल्प से फौलाद हूँ मैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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