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CAA: पाकिस्तान, बांग्लादेश के हिन्दू, सिखों और बौद्धों का विरोध क्यों?

CAA: भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता की राजनीति करनेवाले दल भारत के हिन्दुओं का विरोध करते करते अब पाकिस्तान और बांग्लादेश पहुंच गये हैं। वो नहीं चाहते कि वहां के सताये हुए हिन्दू, बौद्ध, सिख या ईसाइयों को भारत में जीवन जीने की जगह मिले।

यही कारण है कि जब केन्द्र की मोदी सरकार ने 2019 नागरिकता संशोधन कानून पास किया तो मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस सहित अनेक दलों ने आसमान सिर पर उठा लिया। यह जानते हुए भी कि इसका भारत के नागरिकों से कुछ लेना देना नहीं है फिर वो चाहे जिस धर्म या मजहब के हों, फिर भी यह भ्रम फैलाने का प्रयास किया गया कि इस कानून के जरिए मुसलमानों के साथ भेदभाव किया जा रहा है।

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तर्क यह भी दिया गया कि अगर पड़ोसी देशों के हिन्दुओं, सिखों, बौद्धों या फिर ईसाइयों को भारत में नागरिकता की सहुलियत दी जा रही है तो मुसलमानों को क्यों अलग किया जा रहा है? इस तर्क को गढनेवाले भूल गये भारत के पड़ोस में मुख्य रूप से तीन देश जहां के अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता देने का कानून बनाया गया है वो इस्लामिक देश हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि इस्लामिक देशों में भी मुसलमानों की प्रताड़ना हो रही है?

मुस्लिम कम्युनिटी में अनेक फिरके हैं। शिया सुन्नी तो मुख्य रूप से अलग हैं ही। इसके अलावा शियाओं के फिरके अलग हैं और सुन्नियों के अलग। इनमें भारतीय उपहाद्वीप में मुख्य रूप से बरेलवी और देओबंदी सुन्नी बसते हैं। फिर बहुत छोटी संख्या अहमदिया मुसलमान और सूफियों की भी है। लेकिन मुश्किल यह है कि इस्लाम में हर फिरका अपने आप को जन्नती तो दूसरे फिरके को जहन्नमी करार देता है।

अहमदिया कम्युनिटी से तो पाकिस्तान में मुसलमान होने का हक भी छीन लिया गया है। मुस्लिम होने के बावजूद उन्हें मॉइनॉरिटी में रखा गया है क्योंकि वो इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद को इकलौता पैगंबर मानने की बजाय इस फिरके को शुरु करनेवाले मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी को भी पैगंबर मानते हैं। वो मानते हैं कि इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद आखिरी नबी नहीं है बल्कि नबूवत का सिलसिला जारी है।

यही कारण है कि सुन्नी और शिया मुसलमान अहमदिया को मुसलमान ही नहीं मानता। पाकिस्तान में निश्चित रूप से उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। उनकी मस्जिदों को तोड़ दिया जाता है। उनसे 'खत्म ए नबूवत' के फार्म पर साइन करवाये बिना कोई सरकारी सुविधा नहीं दी जाती। पाकिस्तान के पंजाब इलाके में रहनेवाले इन मुसलमानों को लाहौरी या कादियानी मुसलमान भी कहा जाता है जो अधिकांश अपनी पहचान छिपाकर रहते हैं। पाकिस्तान में किसी को अहमदिया, कादियानी या लाहौरी मुसलमान घोषित करने का मतलब गाली देने जैसा है।

जो लोग नागरिकता कानून के साथ पाकिस्तान और बांग्लादेश के माइनारिटी मुसलमानों का सवाल जोड़ रहे हैं क्या वो चाहेंगे कि अहमदिया मुसलमानों को भारत में शरण या नागरिकता दी जाए? यह सवाल आते ही भारत के मुसलमान भी बगले झांकने लगता है क्योंकि यहां का मुसलमान भी अहमदिया को मुसलमान नहीं मानता है। फिर सवाल है कि क्या अल्पसंख्यक मुसलमानों के नाम पर शिया मुसलमानों को नागरिकता कानूनों में शामिल कर लिया जाए?

अगर ऐसा किया जाता है तो भारत का बहुसंख्यक सुन्नी मुसलमान ही इसके खिलाफ खड़ा हो जाएगा। वह कभी नहीं चाहेगा कि पाकिस्तान या बांग्लादेश के शिया मुसलमानों को भारत में नागरिकता दिया जाए। वह तो उस मुख्यधारा के सुन्नी मुसलमानों की भारत में आबादी बढ़ाना चाहता है जो पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान में शासन कर रहे हैं। इसलिए वह रोहिंग्या मुसलमानों का मुद्दा सामने रख देता है जो इस कानून के दायरे से ही बाहर हैं।

यहां एक बात ध्यान देने योग्य है कि अगर नागरिकता कानून में म्यामांर के अल्पसंख्यक नहीं हैं तो नेपाल के भी अल्पसंख्यक नहीं है। म्यामांर में अल्पसंख्यक रोहिंग्या शामिल नहीं किये गये हैं तो वहां के अल्पसंख्यक हिन्दू भी इस कानून के दायरे से बाहर हैं। इस कानून के दायरे में मुख्य रूप से पाकिस्तान और बांग्लादेश को इसलिए रखा गया है क्योंकि यही दो हिस्से हैं जिन्हें मजहब के नाम पर भारत से अलग किया गया था।

बंटवारे के समय भारत के मुसलमानों की एक सीमित आबादी भारत छोड़कर पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान चली गयी तो वहां की हिन्दू आबादी भागकर भारत आ गयी। फिर भी न तो पूरी तरह से भारत के मुसलमान इस्लामिक देशों में गये न ही पूरी तरह से वहां के हिन्दू भारत आये। सिर्फ पंजाब के दोनों हिस्सों में ऐसा हुआ कि पूर्वी पंजाब के लगभग सभी मुसलमान पाकिस्तान चले गये और पश्चिमी पंजाब के लगभग सभी हिन्दू सिख भारत चले आये। सिन्ध से भी व्यापक आबादी भारत आ गयी लेकिन दूर दराज के जिलों में रहनेवाले गरीब हिन्दू परिवार वहीं रह गये।

बंटवारे के समय दोनों ओर के लोगों को यही लगता था कि यह बंटवारा अस्थाई है और एक दिन आयेगा जब वो अपने घरों की ओर दोबारा लौट आयेंगे। इसलिए 1965 तक राजस्थान और बंगाल के सीमावर्ती जिलों में आवाजाही होती रहती थी। कोई बाड़ नहीं लगी थी और न ही सख्त कानूनों का पालन करना पड़ता था। दोनों ओर के लोग आपस में शादी विवाह करते थे। लेकिन 1965 के युद्ध के बाद स्वतंत्र आवाजाही लगभग बंद हो गयी। पाकिस्तान की जिहाद नीति के कारण भारत को अपनी सीमाओं को मजबूती से बंद करना पड़ा।

समय बीतने के साथ वह नेहरु लियाकत समझौता भी अप्रासंगिक हो गया जिसमें एक दूसरे को अपने देश में अल्पसंख्यकों की रक्षा करनी थी। भारत में यह हुआ लेकिन पाकिस्तान में हिन्दू, सिख और बौद्ध अल्पसंख्यकों की दशा दिनों दिन दयनीय होती गयी।

भारत में मुस्लिम जनसंख्या जो 1951 में 10 प्रतिशत थी वह 2011 में बढकर 14.5 प्रतिशत हो गयी जबकि पाकिस्तान में हिन्दू घटकर 1.5 प्रतिशत के नीचे आ गये। पश्चिमी पंजाब में जो हिन्दू बचे रह गये थे वो या तो ईसाई बन गये या उन्हें जबरन इस्लाम कबूल करवा दिया गया।

शिया बहुल सिन्ध प्रांत में जरूर हिन्दुओं पर वैसा मजहबी संकट नहीं था लेकिन सुन्नी मौलानाओं का कहर एक दशक से सिन्ध के हिन्दुओं पर भी टूट रहा है। मियां मिट्ठू जैसे मजहबी आतंकी संगठित तरीके से नाबालिग हिन्दू लड़कियों का अपहरण करवाते हैं और उन्हें इस्लाम में दाखिल करवा देते हैं।

बांग्लादेश में जरूर पाकिस्तान के मुकाबले हिन्दुओं की स्थिति बेहतर है लेकिन तभी जब शेख हसीना की अवामी लीग सत्ता में रहती है। वरना कट्टरपंथी सुन्नी मुसलमान आये दिन हिन्दुओं की संपत्ति और बहू बेटियों को निशाना बनाते ही हैं। जब पाकिस्तान से टूटकर बांग्लादेश बना तब 1974 में वहां 13.5 प्रतिशत हिन्दू थे लेकिन 2022 में घटकर 7.9 प्रतिशत रह गये।

निश्चित रूप से पाकिस्तान हो या बांग्लादेश, अफगानिस्तान के बाद अब इन देशों में भी हिन्दू सिमट रहे हैं। इन इस्लामिक देशों की सरकारें चाहे जो कहें लेकिन मुल्ला बिरादरी के आगे सरकारें भी हार जाती हैं क्योंकि इस्लामिक देश में गैर मुस्लिमों को प्रताड़ित करना, उन्हें इस्लाम में दाखिल करना, उनकी बहू बेटियों को जबरन इस्लाम कबूल करवाकर निकाह कर लेना ये इस्लाम का कोर वैल्यू है जिससे कोई मुसलमान इंकार नहीं कर सकता। ऐसे में जो देश सच्चे इस्लाम को लागू करने की दिशा में आगे बढेगा वह मुसलमानों के अलावा बाकी सबको समाप्त करने को कभी गलत नहीं कहेगा।

यह सब जानते समझते हुए भी भारत में मुस्लिम वोटों की खेती करनेवाले राजनीतिक दल हों या उनका बौद्धिक बचाव करनेवाले कम्युनिस्ट लिबरल बुद्धिजीवी वो जानबूझकर सीएए को लेकर मुसलमानों में भ्रम फैलाते हैं। अगर इन लोगों के तर्क को ही मान लिया जाए फिर तो 1947 में भी जनसंख्या की अदला बदली नहीं होनी चाहिए थी? लोग जहां थे वहीं रहते। फिर अगर इन लोगों को लगता है कि भारत में अल्पसंख्यक मुसलमानों को प्रताड़ित किया जाता है तो आखिर क्या कारण है कि कोई मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान या बांग्लादेश जाकर नहीं बसना चाहता?

भारत के मुसलमान भारत में इतने खुश हैं कि इस्लामिक देश पाकिस्तान या बांग्लादेश में भी नहीं जाना चाहते। जबकि इन इस्लामिक देशों में रहनेवाले हिन्दुओं, बौद्धों और सिखों का जीवन नर्क बना दिया गया है इसलिए वो अपनी जन्मभूमि छोड़कर कहीं और भाग जाना चाहते हैं। ऐसे में भारत उन्हें जीवन की सुरक्षा की गारंटी देते हुए नागरिकता दे रहा है तो क्या गलत कर रहा है?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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