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Budget 2023-24: क्या बजट से आम आदमी की समस्याओं का समाधान संभव है?

नए साल की आहट के साथ ही बजट की चर्चा शुरू हो गई है। आगामी बजट सत्र में देश का एक और बजट प्रस्तुत किया जाएगा। लेकिन क्या सरकारी बजट से आम आदमी की आर्थिक समस्याओं का समाधान संभव है?

budget 2023-24 expectations can be consider of problems of the common man?

Budget 2023-24: देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है और केंद्र सरकार 90 के ऊपर बजट भी पेश कर चुकी है। फिर भी देश की आर्थिक समस्याएँ समाप्त हुई है, ऐसा नहीं कह सकते। इसका मतलब यह नहीं है गत 75 वर्षों में कुछ भी नहीं हुआ। भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है और आने-वाले कुछ समय में यह जर्मन अर्थव्यवस्था को पार कर चौथे नंबर पर आ जाएगी।

2027 में इसके जापान की अर्थव्यवस्था को भी पीछे छोड़ तीसरे नंबर पर जाने की संभावना है। लेकिन अभी भी देश में महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी और कई क्षेत्र में दुनिया से पिछड़ जाने की समस्या कायम है। केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारें हर साल अपने-अपने बजट पेश करती रहती हैं जिसमें केंद्र का बजट मुख्य होता है। आजकल के बजट में काम की बातें कम और भविष्य में बहुत कुछ करने की बातें ज्यादा हो रही है। इसलिए बजट भी पहले जैसे नहीं रहे।

बजट के बाहर के प्रश्न बढ़ रहे हैं

केंद्र या राज्यों के बजट आर्थिक क्षेत्र की बातें करते हैं और कुछ हद तक आर्थिक समस्याओं का हल ढूंढने की कोशिश करते हैं, जिसमें महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी और पिछड़ापन हटाने की बाते होती हैं। यह सही है कि बजट के बाहर ऐसी बहुत सी बड़ी समस्याएं हैं जिन पर बजट बहुत ज्यादा कुछ नहीं कर पाता। बजट के बाहर के प्रश्नों में बढ़ोत्तरी हो रही है जिसका बुरा प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यहाँ की राजनीति एक बड़ी समस्या है जो लोकतंत्र का हिस्सा होने के बावजूद लोकतंत्र और देश के लिए खतरा पैदा कर रही है।

शासन व्यवस्था भ्रष्टाचार और बाबूगिरी का शिकार तो पहले से ही थी अब राजनीतिक भी हो रही है। कायदे कानून की व्यवस्था तो हमेशा से ही चरमरा रही थी लेकिन अब न्यायपालिका के तौर तरीके से भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं। जनसंख्या बढ़ने का असर तो सभी क्षेत्र में साफ दिखाई देता है। भारत की प्रति व्यक्ति आय कम होने के लिए यही जिम्मेवार है। बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद प्रति व्यक्ति आय में भारत का दुनिया में 60वां नंबर है। नतीजन समाज में एक प्रकार की अराजकता आती हुई दिखाई दे रही है जिससे राष्ट्रीय एकात्मता खतरे में पड़ सकती है। चुनाव की राजनीति हावी हो रही है और इसी के कारण बजट भी अपनी अहमियत खो रहा है।

केंद्रीय बजट की कहानी

भारतीय संविधान की धारा 110 अ, 112 और 113 के अनुसार वार्षिक वित्तीय विवरण तथा इससे संबंधित अन्य दस्तावेज़ भारतीय संसद में रखने का प्रावधान है। वित्त मंत्री अपने भाषण के जरिये संसद में यह बजट पेश करते हैं। संक्षेप में कहा जाए तो बजट में गत वर्ष की वास्तविक आय-व्यय और आने वाले वर्ष की अनुमानित आय-व्यय का विवरण होता है। साथ ही वित्त मंत्री अपने सरकार की योजना और बजट खर्चे के लिए साधन सामग्री जमा करने के तौर तरीके की बात करते हैं।

बजट के एक दिन पहले गत वर्ष का आर्थिक सर्वेक्षण भी पेश किया जाता है जिससे आर्थिक प्रश्नों को समझने में मदद मिलती है। वैसे बजट अंग्रेजों के जमाने से पेश किए जा रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत का पहला बजट 1947 में पेश हुआ था और उसके बाद हर वर्ष यह पेश होता आया है। पहले रेल बजट अलग से पेश करने की प्रथा थी जो 2017 से बंद कर दी गई। पहले सब कुछ अंग्रेजी में होता था लेकिन 1955-56 से दस्तावेज़ हिन्दी में भी बनने लगे।

बजट की दशा अच्छी नहीं रही

भारतीय बजट की दशा बहुत अच्छी रही ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि भारतीय बजट हमेशा से वित्तीय घाटे से चले हैं और सरकार अपने खर्चे के लिए भी कर्जे लेती रही है। सकल वित्तीय घाटा 1970-71 में जीडीपी के 3 प्रतिशत से कम था जो 2022-23 में 6.5% हो गया है। इसी दौरान राजस्व घाटा भी जो 1% से कम था वह अब 4% तक पहुँच गया है। भारत के पहले बजट में सरकार का खर्चा 197.39 करोड़ रुपया बताया गया था जो 2022-23 में बढ़कर 39.45 लाख करोड़ हो गया है। इस में करीब 32 लाख करोड़ रुपए तो राजस्व खर्चा है।

राजस्व व्यय वह सरकारी व्यय है जो पेंशन, सरकारी कर्मचारी वेतन और ऋण सेवा पर होता है। यह कोई संपत्ति ( Assets ) नहीं बनाता। सब्सिडी के नाम पर होने वाला खर्चा भी 1970-71 में 94 करोड़ रुपया था जो बढ़कर अब 3.5 लाख करोड़ रुपए के ऊपर हो गया है। सरकार का जो 39.45 लाख करोड़ रुपए का खर्चा था उसमे से गैर विकास खर्चा 20.36 लाख करोड़ रुपया था। मतलब बजट में जो भी खर्चा सरकार बताती है उसमें ज्यादातर खर्चे राजस्व और गैर विकास के कामों के लिए खर्च होते है। और यही भारतीय बजट की कमजोरी रही है।

2022-23 के पूरे खर्चे में सिर्फ 7.5 लाख करोड़ रुपए पूंजीगत उपयोग के लिए है। पूंजीगत व्यय सरकारी खर्च का वह हिस्सा है जो सड़क, स्कूल, राजमार्ग, डैम, रेल जैसे फिक्स्ड एसेट्स पर खर्च किया जाता है। सरल शब्दों में कहें तो यह वह खर्च है जो संपत्ति (Assets) बनाता है। केंद्र सरकार की प्राप्ति में 40 % से ज्यादा हिस्सा पूंजीगत प्राप्तियों का है। पूंजी प्राप्तियां वे हैं जो सरकारी संपत्ति को बेचकर आयी हैं या उधार लिया गया है। इसलिए यह कह सकते है कि आजकल केंद्रीय बजट के खर्चे सरकारी खर्चे से अधिक संबंध रखते हैं, लोगों के विकास से कम।

बजट पेश करने की जरूरत कम हो रही है

कुछ साल पहले तक केंद्रीय बजट का इंतजार होता था। करदाता कर में सहूलियत का इंतजार करता। आम आदमी कुछ नहीं तो कम से कम रेल किराये में रियायत की अपेक्षा करता। उद्योगपतियों को भी सरकार किस क्षेत्र में क्या करेगी इसका इंतजार रहता। लेकिन अब बजट का वैसा इंतजार नहीं होता। भारत में उदारीकरण और निजीकरण का दौर क्या शुरू हुआ, बजट की आत्मा ही खो गयी।

एक जमाने में सरकार को अपने खर्चे के ताल-मेल के बारे में सोचने की और अर्थव्यवस्था से दूर रहने की बातें होती थी। 1930 के मंदी के बाद दुनिया भर में सरकारें अर्थव्यवस्था को संतुलित करने के चक्कर में अपने खर्चे का ताल-मेल भी भूल बैठी। फिर वैश्वीकरण का दौर चला और सरकार का अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप कम हुआ। इसलिए भारत में भी जैसे-जैसे सरकार खुद अपना निवेश कर उद्योग चलाना कम कर देगी तो लोक कल्याण योजना अमल लाने के सिवाय सरकार के पास कुछ रहेगा नहीं। और ऐसे समय में सरकार सिर्फ अपने खर्च का ताल-मेल बिठाती रहेगी जिसमें पैसे बांटने वाली कल्याण योजनाएँ मुख्य होंगी।

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    हाँ, सरकारी खर्च का बोझ आम जनता को उठाना पड़ेगा। 'कर प्रणाली' आज से भी ज्यादा विस्तारित और सख्त होगी। कुछ को मुफ्त, कुछ को सहूलियत और बहुतों से वसूली पर सरकार चलती रहेगी। इसलिए आने वाले बजट से आम आदमी ज्यादा उम्मीद नहीं कर सकता क्योंकि बजट में अब वो बात नहीं रही।

    यह भी पढ़ें: Free Ration Scheme: क्या गरीबी और भुखमरी का समाधान है मुफ्त राशन योजना?

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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