BRICS Summit: आपसी विरोधाभाषों से आगे निकलने की चाह

BRICS Summit: दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में 21 से 13 अगस्त तक चले ब्रिक्स सम्मेलन के सामने दो ही बड़े मुद्दे थे। एक तो इसका विस्तार और दूसरा डॉलर के अधिपत्य को कम करने के लिए यूरो की तरह ब्रिक्स की कोई अपनी अलग करेंसी का चुनाव। दोनों मुद्दों को लेकर असहमति के स्वर उठ रहे थे। पर अंततः विस्तार का मामला सुलझ गया और छह नये देशों की सदस्यता की घोषणा कर दी गई। परंतु डॉलर का आधिपत्य कम करने और ब्रिक्स को जी 7 के मुकाबले खड़ा करने की आवाजों को कोई बल नहीं मिला।

ब्रिक्स मंच से यह कहा गया कि संगठन का उद्देश्य किसी के मुकाबले खुद को खड़ा करना नहीं, बल्कि बहुकोणीय विश्व व्यवस्था में परस्पर लाभ के अवसर जुटाना है। दक्षिण अफ्रीका, जिसकी अगुवाई में ब्रिक्स का सम्मेलन हो रहा था, उसने ही बताया था कि 40 नये सदस्य इससे जुड़ना चाहते हैं, जिनमें से 23 तो विधिवत आवेदन कर चुके हैं। पश्चिम के मीडिया में लगातार खबरें आ रही थीं कि भारत को ही कुछ देशों की सदस्यता से परेशानी है। ब्रिक्स की कोई अलग करेंसी हो इस पर भी तमाम मतभेद बताए जा रहे थे।

BRICS Summit: Desire to get ahead of mutual contradictions

बहरहाल सम्मेलन में इस पर कोई विशेष चर्चा नहीं हुई । हां, सदस्य देशों के बीच अपनी अपनी करेंसी में व्यापार करने पर जरूर सहमति बनती दिखाई दी। प्रधानमंत्री मोदी के लिए ब्रिक्स सम्मेलन विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा, क्योंकि नई सदस्यता का फैसला भारत की सहमति से ही हुआ। इस सम्मेलन में भारत के चंद्रयान अभियान का विशेष उल्लेख किया गया और जमकर भारत की वाहवाही हुई। मोदी ने इसी सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति के सम्मुख एलएसी पर सेना के जमावड़े का मुद्दा उठाया और यहीं जिनपिंग से यह आश्वासन लिया कि जल्दी ही चीनी सेना को एलएसी से हटा लिया जाएगा। चीन के लिए यह सम्मेलन कुछ मायनों में खुशनुमा नहीं रहा, क्योंकि सम्मेलन के दौरान ही चीन के राष्ट्रपति के सुरक्षा गार्ड को जबरन हटाया गया और शी जिनपिंग ने सम्मेलन में अपना भाषण भी नहीं दिया।

सम्मेलन की सबसे उल्लेखनीय बात रही सर्वसम्मति से ब्रिक्स की सदस्यता का विस्तार। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति रामफोसा ने ब्रिक्स के सदस्य देशों को अपनी सूझबूझ से यह समझा लिया कि संगठन के विस्तार में ही इसकी मजबूती है और अंततः छह नये देश ब्रिक्स के सदस्य बन गए। इस विस्तार से रूस के राष्ट्रपति पुतिन बहुत खुश हुए और उन्होंने फोन कर रामफोसा को इस बात के लिए साधुवाद दे दिया कि उन्होंने आखिर ब्रिक्स के विस्तार पर आम सहमति बना ही ली। रामफोसा ही 2023 ब्रिक्स सम्मेलन के अध्यक्ष हैं।

सबसे पहले 2009 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन ने मिलकर एक नए ब्लॉक का गठन किया था, जब 2010 में दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल हुआ तो इसका नाम ब्रिक्स रखा गया। एक जनवरी 2024 से अर्जेंटिना, इथोपिया, ईरान, सउदी अरब, यूनाइटेड अरब अमीरात और इजिप्ट ब्रिक्स के नये सदस्य होंगे। तब तक ब्रिक्स के मौजूदा सदस्य देशों के विदेशमंत्री नये घोषित सदस्य देशों के लिए एक नियम व शर्त तैयार करेंगे और भविष्य में कुछ अन्य देशों की ब्रिक्स में सदस्यता देने की सूची पर काम करेंगे।

ब्रिक्स का एक और बड़ा एजेंडा न्यू डेवलपमेंट बैंक के विस्तार को लेकर था। न्यू डेवलपमेंट बैंक का गठन 2015 में किया गया था और इसे लेकर यह कहा जा रहा था कि यह दक्षिण के देशों के लिए विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का विकल्प होगा। न्यू डेवेलपमेंट बैंक की स्थापना इस उद्देश्य से की गई थी कि क्षेत्र में डॉलर के आधिपत्य को कम करने के लिए सदस्य देशों को उनकी ही मुद्रा में यह लोन जारी करेगा। लेकिन अभी तक जितने लोन इस बैंक ने जारी किए हैं, उनका दो तिहाई से अधिक हिस्सा डॉलर में ही जारी किया गया है। इसलिए यह कहना कि निकट भविष्य में ब्रिक्स के देश डॉलर के प्रचलन को एक स्तर से अधिक कम कर पाएंगे, वास्तविकता से परे होगा। न्यू डेवलपमेंट बैंक ने अभी तक लगभग 33 अरब डॉलर के लोन सदस्य देशों के लिए मंजूर किये हैं।

अब संयुक्त अरब अमीरात और सउदी अरब के सदस्य बनने से न्यू डेवलपमेंट बैंक का भी दायरा बढ़ेगा। साथ ही इसका फोकस भी मिडिल ईस्ट की ओर बढ़ेगा, क्योंकि जिन छह नये सदस्यों को प्रवेश मिला है उनमें से चार मिडिल ईस्ट के ही देश हैं। पर जोहान्सर्बग में ब्रिक्स ने जो प्रस्ताव पारित किया उसमें एक प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में सुधार और गरीब देशों के लिए कोटा सिस्टम बढ़ाने का भी प्रस्ताव है। जिसमें कहा गया है कि हम कोटा-आधारित और मजबूत वैश्विक वित्तीय सुरक्षा नेट का समर्थन करते हैं। हम आह्वान करते हैं कि कोटा-आधारित मजबूत वैश्विक वित्तीय सुरक्षा नेट के रूप में संसाधनयुक्त अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष 15 दिसंबर 2023 को 16वीं सामान्य समीक्षा बैठक से पहले व कोटा शेयरों में किसी भी समायोजन से पहले उभरते बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं (ईएमडीसी) की आवाज की रक्षा करे और सबसे गरीब सदस्यों के प्रतिनिधित्व में सुधार करे। स्पष्ट है कि ब्रिक्स को लेकर यह आशंका भी गलत है कि यह आईएमएफ या विश्व बैंक का कोई विकल्प तलाश रहा है।

मौजूदा समय में ब्राजील, रूस, चीन, भारत और दक्षिण अफ्रीका ब्रिक्स के सदस्य देश हैं और ब्रिक्स इस समय दुनिया की 40 प्रतिशत जनसंख्या और 25 प्रतिशत जीडीपी वाला संगठन है। पश्चिम देशों की मीडिया भले ही आशंका जता रही हो कि एक दूसरे के दुश्मन देशों का संगठन बन चुका ब्रिक्स आखिर में कैसे अपने लक्ष्यों के लिए काम कर पाएगा। जिन छह नये सदस्य देशों की घोषणा हुई है, उनमें ईरान और सउदी अरब एक दूसरे के कट्टर दुश्मन रहे हैं। भारत और चीन के बीच भी संबंध सामान्य नहीं है। बॉर्डर पर सैनिकों के बीच अक्सर झड़प होती रहती है। ब्रिक्स को तथाकथित दक्षिण के देशों का वैश्विक संगठन बनाने का लक्ष्य कहीं बीच में ही लटक तो नहीं जाएगा।

लेकिन आपसी वैमन्यस्ता के बावजूद सबके साथ एक सामान्य स्थिति यह है कि ये सभी देश पश्चिमी देशों द्वारा गठित किए गए संस्थानों के सताए हुए हैं। खासकर विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के। भारत को छोड़ दें तो चीन और रूस दोनों अमेरिका, नाटो और यूरोपीय देशों के निशाने पर हैं। इसलिए ब्रिक्स का मजबूत होना इनके लिए हर प्रकार से फायदेमंद है।

गिरफ्तारी के डर से ब्रिक्स सम्मेलन जोहान्सबर्ग में जाने से बचने वाले रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने वीडियो लिंक के जरिए अपने संबोधन में भी पश्चिम देशों के इन्हीं रवैये की ही बात की और यह आशंका जताई कि विविधता वाली वैश्विक व्यवस्था को इनसे खतरा है। इसलिए ब्रिक्स के सभी मुद्दों पर आम सहमति ना बन पाने की स्थिति में भी सदस्य देशों के बीच बहुमत के आधार पर फैसले तो लिए जा सकते हैं। पर इस प्रक्रिया में फिर वही लामबंदी की बीमारी लग सकती है, जो अन्य विश्व संगठनों में है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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