BJP vs Opposition: विचारधारा का चयन तो वोटर ही करेंगे
भारतीय जनता पार्टी के बारे में कहा जाने लगा है कि वह हमेशा चुनावी मूड में रहती है। एक चुनाव सम्पन्न होता है, तो वह दूसरे की तैयारी शुरू कर देती है, भले ही दूसरा चुनाव कितना भी दूर हो। यही कारण है कि हाल ही के वर्षों में भाजपा लगातार कई चुनाव जीतने में सफल रही है।
महंगाई और बेरोजगारी के बड़े मुद्दों को पछाड़ते हुए भाजपा ने जन कल्याण की योजनाओं और हिंदुत्व के लिए प्रतिबद्धता पर चलते हुए भाजपा ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अपनी जीत दोहराई। हाल ही में मध्यप्रदेश में अपनी सरकार बचाई और राजस्थान, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से सरकारें छीनी। यह सिर्फ चुनावी तैयारियों में लग जाने के कारण नहीं हुआ, इसकी एक वजह उसकी हिंदुत्व की विचारधारा है, जो महंगाई और बेरोजगारी जैसे तात्कालिक मुद्दों पर भारी पड़ गई है।

विचारधारा के लिहाज से कांग्रेस मध्यमार्गी पार्टी थी, जो सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखती थी। कांग्रेस के भीतर कई विचारधाराओं समावेश था, और उनमें टकराव भी होता रहता था। वहीं, 1952 में भारतीय जनसंघ का गठन हिंदुत्व की विचारधारा पर हुआ था।
भारत के पहले और अंतिम गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी और कुछ अन्य कांग्रेस नेताओं ने महसूस किया कि जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस की मूल विचारधारा से भटक गए हैं और कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधारा की ओर बढ़ रहे हैं। उनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी और सरकार समाजवादी और राज्यवादी दृष्टिकोण अपनाने लगी थी, तो राजगोपालाचारी ने स्वतंत्र पार्टी का गठन किया, जिसका मकसद नेहरू के लाईसेंस राज को खत्म करके बाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था स्थापित करना था।

1962 में चीन के हमले में भारत की शर्मनाक पराजय तक देश में नेहरू का कहीं कोई विकल्प तक नहीं था। चीन से युद्ध में हार के बाद 1963 में समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया उप चुनाव जीत कर लोकसभा में पहुंचे। 1964 में दूसरे समाजवादी नेता मधु लिमए उपचुनाव जीत कर लोकसभा पहुंचे, और स्वतंत्र पार्टी के मीनू मसानी भी उपचुनाव जीत कर लोकसभा में पहुंच गए।
इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 1967 के आम चुनावों में कांग्रेस को करारा झटका लगा, उसका वोट पिछले चुनाव के मुकाबले 4 प्रतिशत घट गया। जहां इससे पहले के तीनों चुनावों में कांग्रेस तीन चौथाई सीटें जीत रही थी, वहीं 1967 के आम चुनावों में उसे 520 में से सिर्फ 283 सीटें आई, जो बहुमत से सिर्फ 22 सीटें ज्यादा थी। मुक्त आर्थिक व्यवस्था की समर्थक स्वतंत्र पार्टी 44 लोकसभा सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही और हिंदुत्व की विचारधारा वाली भारतीय जनसंघ को 35 सीटें मिलीं।
1967 में बिखरा हुआ, परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाला, लेकिन मजबूत विपक्ष उभर कर आया था, जिसमें स्वतंत्र पार्टी, जन संघ, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, और क्षेत्रीय पार्टियां भी बड़ी तादाद में सांसदों के साथ लोकसभा चुनाव जीती थीं। तब तक कई विचारधाराएं उभर रही थीं और चुनाव विचारधाराओं पर लड़े जाते थे।
1967 तक लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ होते थे। नौ राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई थी, तब राम मनोहर लोहिया ने विचारधाराओं को त्याग कर गैर कांग्रेस वाद का नारा दिया, जिससे उन 9 राज्यों में संयुक्त विधायक दलों की सरकारें बन गईं। आज़ादी के दो दशक बाद दो विपरीत विचारधाराएं एक दूसरे के नजदीक आईं, तो 9 राज्यों में वैकल्पिक सरकारें बनीं।
जब 1969 में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को तोड़ा, तब तक विचारधाराओं का विकास हो रहा था। कांग्रेस के भीतर से पार्टी को संतुलित करने की कोशिश जारी थी। उसके बाद कांग्रेस ने मध्यमार्ग पूरी तरह छोड़ दिया। भारतीय जनसंघ हिंदुत्व की विचारधारा पर आगे बढ़ने लगी, जबकि कांग्रेस समेत बाकी सारी पार्टियां कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधारा की बनती चली गई।
1975 में एक बार फिर 1967 दोहराया गया, जब राम मनोहर लोहिया की जगह जयप्रकाश नारायण ने ली। इस बार कम्युनिस्टों और कांग्रेस को छोड़ कर बाकी सभी पार्टियों ने विलय करके जनता पार्टी बना ली थी। जिसकी केंद्र में सरकार भी बन गई, लेकिन दो साल के भीतर ही जनता पार्टी में विचारधाराओं का संघर्ष शुरू हो गया। यह संघर्ष मुख्यत: हिंदुत्व की विचारधारा वाले पूर्व जन संघियो और समाजवादियों के बीच था।
जन संघियों ने जनता पार्टी से बाहर निकल कर 1980 में भारतीय जनता पार्टी बना ली। शुरू में तो भाजपा ने गांधी के हिन्द स्वराज की परिकल्पना के आधार पर गांधीवादी समाजवाद को अपनी विचारधारा के तौर पर अपनाया। महात्मा गांधी की पुस्तक हिन्द स्वराज में एक ऐसे राज की परिकल्पना है, जिसमें राजनीतिक और आर्थिक शक्ति का विकेंद्रीकरण होगा, इसके अलावा बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण को नकारना, स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता पर जोर देना है।
लेकिन 1984 के पहले ही लोकसभा चुनाव में (जो इंदिरा गांधी की हत्या के कारण एकतरफा कांग्रेस के पक्ष में चला गया था) भाजपा को सिर्फ दो सीटें मिलने के कारण भाजपा जल्द ही अपनी मूल हिंदुत्व की विचारधारा पर लौट आई। 1983 में रामजन्मभूमि मुक्ति का आन्दोलन शुरू हो चुका था, और 1989 में भाजपा उस आन्दोलन में कूद गई।
भाजपा की हिंदूवादी विचारधारा के कारण उसकी ताकत बढ़ने लगी थी, जिससे पूर्ववर्ती जनता पार्टी से निकले दलों की चिंता बढ़ने लगी थी। वे भले ही छोटे छोटे क्षेत्रीय दल थे, लेकिन केंद्र की गैर कांग्रेस वीपी. सरकार में शामिल थे। भाजपा के हिन्दुओं में बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए उन्होंने हिन्दुओं को विभाजित करने के लिए मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करवा कर अगड़ों पिछड़ों में संघर्ष करवा दिया।
इस तरह सेक्यूलरिज्म के नाम पर जातिवादी राजनीति का उदय हुआ, जिसे जनता पार्टी से ही टूट कर बनी उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी, बिहार में लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल, और काफी हद तक शरद यादव के जनता दल ने भी अपनाया। भाजपा की राजनीति को कमंडल की राजनीति और जातिवाद की राजनीति करने वालों को मंडल की राजनीति कहा गया।
मंडल की राजनीति ने बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। कमंडल की राजनीति ने गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। मंडल और कमंडल की राजनीति से वामपंथी झुकाव वाली कांग्रेस हवा हो गई।
दक्षिण के सभी राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों ने पहले ही कांग्रेस को लंबे समय से सत्ता से बाहर किया हुआ था। अब वही कांग्रेस जातिवादी राजनीति अपनाने को मजबूर है। वह बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश में मंडल की राजनीति करने वालों की पिछलग्गू पार्टी बन कर रह गई है, क्योंकि इन तीनों राज्यों में मंडल कमंडल की राजनीति आमने सामने है।
पिछले 33 साल में स्थितियां एकदम बदल चुकी हैं। भारतीय जनता पार्टी अब ब्राह्मण बनियों की पार्टी नहीं रही, वह सर्वजातीय पार्टी बन गई है, उग्र हिंदुत्ववाद ने मंडल की जातियों को समाहित कर लिया है। भाजपा का नेतृत्व अब मंडल वाली जातियों के हाथ में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद पिछड़ी जाति से हैं।
मध्यप्रदेश में पिछड़ी जाति और छत्तीसगढ़ में आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने मंडल का मुद्दा भी कांग्रेस और मंडलवादी पार्टियों से छीन लिया है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस की 42 साल सरकार रही, लेकिन उसके सारे मुख्यमंत्री ब्राह्मण या ठाकुर रहे। जबकि भाजपा ने मंडल के हाथ में कमंडल थमा दिया है। भारतीय जनता पार्टी 2024 के लोकसभा चुनावों में मंडल की राजनीति को परास्त करने के लक्ष्य से आगे बढ़ रही है।
कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्षी दलों का इंडी एलायंस मंडल की राजनीति को आगे बढाने के एजेंडे पर चल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद पिछड़ी जातियों के सबसे बड़े नेता रहे कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दिलाकर मंडल की राजनीति करने वाले तीन बड़े दलों राष्ट्रीय जनता दल, जेडीयू और समाजवादी पार्टी को बड़ा झटका दिया है।
जातीय जनगणना का नारा लगाकर चुनावी वैतरणी पार करने की सोच रही कांग्रेस के सामने मोदी ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि कांग्रेस ने न केवल जाति आधारित जनगणना का हमेशा विरोध किया, बल्कि कभी किसी पिछड़ी जाति के नेता को भारत रत्न जैसा सर्वोच्च सम्मान भी नहीं दिया था।
मोदी सरकार ने कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न का सम्मान देकर बताया है कि भाजपा की राजनीति अब 'कमंडल' तक सीमित नहीं है, बल्कि उसने सोशल इंजीनियरिंग करके 'मंडल' को भी समाहित कर लिया है। 2014 तक ओबीसी खुद को भाजपा से दूर कर रहे थे, लेकिन उसके बाद से राजनीति पूरी तरह से बदल गई हैं। "मंडल" के खिलाफ "कमंडल" खड़ा करने की राजनीति बदल गई है। भाजपा अब अति पिछड़ों से जुड़ गई है, जो पहले मंडल का हिस्सा हुआ करता था।
भाजपा सरकार ने अगर श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर बनवा कर हिंदुत्व की विचारधारा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता निभाई है, तो ग्रामीण इलाकों में ग़रीबों के लिए लाई गई कल्याण योजनाओं की वजह से मंडल की जातियों को भी अपने साथ जोड़ा है। जबकि कांग्रेस और अन्य भाजपा विरोधी दलों की विचारधारा सेक्यूलरिज्म है, लेकिन आज वे हिंदुत्व बनाम सेक्यूलरिज्म की लड़ाई लड़ने को तैयार नहीं। वे जातीय जनगणना जैसे विघटनकारी मुद्दे ढूंढ रही हैं। भाजपा ने हिंदुत्व के साथ जन कल्याण की योजनाएं लागू करके सेक्यूलरिज्म की राजनीति को परास्त कर दिया है। श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर बनने के बाद बने वातावरण में विपक्षी पार्टियां हिंदुत्व बनाम सेक्यूलरिज्म का चुनाव बनाने से बिदकेंगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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