क्या शरद पवार का बारामती किला दरकने लगा है?

एक समय था जब भारतीय जनता पार्टी महाराष्ट्र के दिग्गज खिलाड़ी शरद पवार को अपने साथ लाना चाहती थी। शरद पवार को 2014 से ही संकेत दिए जाते रहे। 2014 में लोकसभा चुनावों के बाद हुए विधानसभा चुनावों में गठबंधन तोड़कर भाजपा और शिव सेना अलग अलग अलग लड़े थे। भाजपा 122 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी थी।

जब उद्धव ठाकरे भाजपा पर ढाई ढाई साल मुख्यमंत्री का दबाव बना रहे थे, तो एनसीपी ने भाजपा को बाहर से समर्थन का एलान किया था। इस दबाव के बाद ही उद्धव ठाकरे ने भाजपा को समर्थन दिया था।
2019 के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद भी जब उद्धव ठाकरे ने ढाई ढाई साल की शर्त रखी तो भाजपा ने एक बार फिर शरद पवार से समर्थन माँगा, और बदले में उन्हें केंद्र सरकार में कृषि मंत्री बनाने की पेशकश भी की थी। यह बातचीत अभी अधूरी थी कि शरद पवार के भतीजे अजीत पवार ने भाजपा से उप मुख्यमंत्री पद हासिल कर के भाजपा-एनसीपी की साझा सरकार बना ली थी। हालांकि शरद पवार ने अजीत को मनाकर दोबारा महाविकास आघाड़ी की सरकार बना ली थी।
अब जबकि महाअघाड़ी की सरकार तोड़कर भाजपा ने अपनी सरकार बना ली है तो शरद पवार ने महाराष्ट्र में अपनी राजनीतिक हार को दिल पर ले लिया है। इसलिए अब वह महाविकास अघाड़ी जैसा राष्ट्रीय गठबंधन खड़ा कर 2024 में केंद्र में महाआघाडी सरकार बना कर बदला लेने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
लेकिन 2019 का जख्म भाजपा भी अभी तक नहीं भूली है। शिवसेना तोड़ने के बाद अब भाजपा का अगला निशाना एनसीपी को तोड़ना और राष्ट्रीय सपने ले रहे शरद पवार को उन के गढ़ बारामती में हराना है।
हालांकि शरद पवार अब खुद चुनाव नहीं लड़ते, वह राज्यसभा में रहते हैं। पिछ्ले तीन बार से उनकी बेटी सुप्रिया सूले बारामती की सांसद है। भाजपा ने तय किया है कि सुप्रिया सूले को किसी भी हालत में लोकसभा नहीं पहुंचने देना है।
भारतीय जनता पार्टी ने 2019 में हारी देश भर की जिन 144 सीटों और महाराष्ट्र की 16 सीटों को इस बार जीतने का लक्ष्य निर्धारित किया है, उनमें यह बारामती सीट भी है। भाजपा ने इन 144 सीटों पर केन्द्रीय मंत्रियों की जिम्मेदारी लगाई है। बारामती लोकसभा सीट का जिम्मा केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को दिया गया है। निर्मला सीतारमण अभी 22 सितंबर से 25 सितंबर तक बारामती में थी। वहां उन्होंने शरद पवार पर व्यक्तिगत हमले किए।
निर्मला सीतारमण ने कहा कि राजनीतिक लाभ के लिए शरद पवार ने सहकारी समितियों का दुरुपयोग किया। उनके दिल्ली लौटने के बाद बारामती जिले की एनसीपी की एक बड़ी और प्रभावशाली नेता अर्चना पाटिल ने भाजपा ज्वाईन कर ली।
अर्चना पाटिल बारामती से लेकर पुणे तक के शरद पवार के एकछत्र राज वाले इलाके की बहुत ही प्रभावशाली ओबीसी की आवाज हैं। वैसे तो शरद पवार भी खुद को ओबीसी का मसीहा बताते हैं लेकिन दो साल पहले इलाके की ओबीसी नेता अर्चना पाटिल को एनसीपी में शामिल करवाने के लिए खुद शरद पवार और अजीत पवार मंच पर मौजूद थे।
इसी से बारामती लोकसभा सीट में अर्चना पाटिल के प्रभाव का अंदाज लगाया जा सकता है। अर्चना पाटिल ने भाजपा ज्वाईन करते हुए शरद पवार पर कटाक्ष किया है कि पवार ओबीसी की सिर्फ बात करते हैं, जबकि नरेद्र मोदी ओबीसी का ऐम्पावरमेंट कर रहे हैं।
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शरद पवार देश के सबसे बड़े विपक्षी नेताओं में से एक हैं। अब तक जिस किसी नेता ने विपक्षी एकता के प्रयास किए हैं, वह पहले शरद पवार से ही मिलता है। ममता बनर्जी, केसीआर और हाल ही में नीतीश कुमार ने भी विपक्षी एकता की शुरुआत करने से पहले शरद पवार से ही मुलाक़ात की थी।
शरद पवार कभी खुद प्रधानमंत्री बनने का ख़्वाब देखते रहे हैं। अब उनके मन में शायद यह ख्वाहिश नहीं बची है, लेकिन शरद पवार से मुलाक़ात के बाद ही नीतीश कुमार ने कहा था कि नेता का चुनाव बाद में होना चाहिए, पहले मिलकर लड़ने का फैसला होना चाहिए।
शरद पवार भले ही खुद खुल कर सामने नहीं आ रहे, लेकिन 2024 में भाजपा के सामने एक मोर्चा बनाने की सारी कोशिशों के पीछे उन्हीं का दिमाग काम कर रहा है। राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के चुनाव में भी विपक्षी एकता की सारी कोशिशों में वही सब से आगे थे।
हाल ही में ओम प्रकाश चौटाला की विपक्षी एकता रैली में भी शरद पवार मुख्य भूमिका में थे, जहां उन्होंने 2024 में भाजपा और मोदी को हराने के लिए सभी विपक्षी दलों का एकजुट होना वक्त की जरूरत बताया। अगर 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा विरोधी मोर्चा आकार लेता है तो उसमें शरद पवार की ही महत्वपूर्ण भूमिका होगी। वह क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के बीच कड़ी का काम कर सकते हैं।
शरद पवार ने भले ही सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा बना कर कांग्रेस तोडी थी लेकिन अब लंबे समय से सोनिया गांधी के साथ मिल कर ही राजनीति कर रहे हैं। सोनिया गांधी के अलावा कांग्रेस के नए चुने जाने वाले अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे के साथ भी उनके पुराने अच्छे संबंध हैं। दोनों हमउम्र भी हैं।
हालांकि भाजपा महाराष्ट्र में नंबर वन पार्टी बन चुकी है, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में वह भाजपा से एक कदम आगे ही रहे हैं। यही कारण था कि 2019 में चुनाव नतीजों के बाद उन्होंने मोदी और अमित शाह तक को मात देकर शिवसेना, कांग्रेस, एनसीपी का महा गठबंधन बना कर असंभव को संभव बना दिया था।
अब भाजपा उसका बदला लेने के लिए उद्धव के बाद उन्हें निशाने पर ले रही है। शरद पवार पर व्यक्तिगत हमले तेज कर दिए गए हैं। भाजपा ने पात्रा चाल पुनर्वास घोटाले में अब शरद पवार की भूमिका पर भी सवाल खड़ा कर दिया है।
शरद पवार के साथ मिल कर शिवसेना, कांग्रेस, एनसीपी का गठबंधन करवाने वाले शिवसेना सांसद संजय राउत इसी पात्रा चाल घोटाले में जेल की सलाखों के पीछे हैं। एनसीपी के दो वरिष्ठ नेता अनिल देशमुख और नवाब मलिक पहले से ही भ्रष्टाचार के मामलों में जेल में हैं।
पवार के भतीजे अजीत पवार चीनी कारखानों से जुड़े हैं, जहां ईडी ने हाल ही में महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक घोटाले के सिलसिले में छापा मारा था। आयकर विभाग ने भी उनके रिश्तेदारों से जुड़े परिसरों पर छापेमारी की थी।
शरद पवार को चारों ओर से घेरने की रणनीति दिल्ली में बनाई गई है। इस रणनीति में संगठन के जानदार खिलाड़ी अमित शाह की सीधी भूमिका है। भाजपा की योजना है कि पहले एनसीपी के संगठन को कमजोर किया जाए, जब संघटन कमजोर होगा तो एनसीपी विधायकों की निष्ठा कमजोर होने लगेगी। भाजपा की कोशिश होगी कि लोकसभा चुनाव आते आते एनसीपी के विधायक उसी तरह टूटने लगें, जैसे उद्धव ठाकरे को छोड़कर एकनाथ शिंदे के साथ आने वालों की लाईन लग गई थी। इसी रणनीति के तहत भाजपा ने महाराष्ट्र की 48 में से 45 लोकसभा सीटें और 288 में से 200 विधानसभा क्षेत्रों में जीत का लक्ष्य रखा है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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