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BJP Leadership: नई पौध के जरिए भाजपा के दिग्गज दरकिनार

चाणक्य नीति से लेकर राजनीतिक विज्ञान तक सब में सत्ता के संदर्भ में केवल एकसमान विचार चलता है और उन सबका सार भी केवल एक ही है। सार यह कि सत्ता के लिए सर उठानेवालों के आसपास के या करीबी किसी बेहद कमजोर को ही सर्वाधिक सामर्थ्यवान बना दो, ताकि ताकतवर लोगों के वे सभी रास्ते ही बंद हो जाएं, जिनके जरिये वे सत्तासीन होने के प्रयास कर सकते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी बीजेपी ने राजस्थान में भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाने के साथ ही वसुंधरा राजे के पर कतर कर यही संदेश दिया है।

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वसुंधरा ही क्यों, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में डॉ. रमण सिंह के साथ भी यही हुआ साफ लगता है। तीनों प्रदेशों के इन सर्वाधिक शक्तिशाली नेताओं के सामने कभी खड़े तक न हो पाने की क्षमतावाले लोगों को ही मुख्यमंत्री बना दिया है, ताकि नई पौध तैयार हो सके, पुरानों के बोझ से मुक्ति मिल जाए और सामान्य कार्यकर्ता को सदा यह लगता रहे कि उनके लिए भी कभी सत्ता के दरवाजे खुल सकते हैं। भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री देख राजस्थान के बीजेपी कार्यकर्ता यही कह रहे हैं।

राजस्थान में भजनलाल शर्मा का चयन पार्टी कैडर को मजबूत करने और संघ परिवार के वैचारिक प्रवाह को संगठित बनाए रखने के लिए किया गया निर्णय बताया जा रहा है। हालांकि वे उस ब्राह्मण समुदाय से हैं, जिसके बारे में बीजेपी के लिए कभी कहा जाता था है कि यह तो ब्राह्मण-बनियों की पार्टी है। लेकिन अब ये टैग हट गया है। शर्मा ने तीन राष्ट्रीय अध्यक्षों राजनाथ सिंह, अमित शाह व जेपी नड्डा के कार्यकाल में चार प्रदेश अध्यक्षों के साथ प्रदेश में काम किया है। अमित शाह और जेपी नड्डा उनके काम से प्रभावित रहे हैं और संघ के विचार पर अचल रहने के कारण आरएसएस भी उनको पसंद करता है।

भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाने की खास वजह ये भी है कि बहुत जूनियर और साथ ही विनम्र होने के कारण वे अपने वरिष्ठ नेताओं से वसुंधरा राजे की तरह न तो सर उठाकर बात कर सकते हैं और न ही आंख दिखा सकते हैं। वसुंधरा वैसे भी न तो केंद्रीय नेताओं की पसंद थी और न ही संघ परिवार की। वे केवल विधायकों के समर्थन बल की पुरानी परंपरा के जरिए मुख्यमंत्री बनना चाहती थी, लेकिन मोदी और बीजेपी ने अब वह परंपरा ही पलट दी है। मुख्यमंत्री के रूप में शर्मा के चयन पर राजनीतिक जानकारों की राय में माना यही जा रही है कि राजस्थान में बीजेपी का यह फैसला भाजपा की पुरानी पीढ़ी के नेताओं से बचने की कोशिश तो है ही, वसुंधरा राजे के दो बार के मुख्यमंत्रीकाल के बैकलॉग से निजात पाने का प्रयास भी है।

भजनलाल शर्मा एक बिल्कुल नया चेहरा हैं और एक उच्च जाति के नेता के रूप में फिट भी बैठते हैं। सबसे खास बात यह भी है कि वसुंधरा राजे की तरह से न तो वे सत्ता के अहंकार से ग्रस्त हैं और न ही विधायकों के समर्थन से लॉबिंग कर सकते हैं। बीजेपी ने भजनलाल शर्मा के जरिए अपनी मुख्यमंत्री की पसंद से यह भी बताने की कोशिश की है कि वह 2024 के चुनावों से पहले किसी भी तरह की गुटबाजी बर्दाश्त नहीं करेगी। फिर भी नए मुख्यमंत्रियों की तरफ से यदि ऐसा हुआ, तो सत्ता का अहंकार उनको छुए, उससे पहले ही सत्ताच्युत भी बेहद आसानी से किया जा सकता है।

राजस्थान बीजेपी के एक बड़े नेता ने कहा कि पार्टी आलाकमान ने भजनलाल शर्मा के नाम पर निर्णय लेने से पहले कई पहलुओं पर गहन समीक्षा जरूर की होगी। इसमें सबसे प्रमुख तो यही हो सकता है कि वरिष्ठ नेतृत्व किसी भी नेता की ताकत दिखाने की कोशिश को पसंद नहीं करता इसीलिए चुनाव जीतने के बाद विधायकों का भले ही वसुंधरा राजे से लगातार मिलना हुआ और उनके समर्थकों की संख्या 70 के आसपास बताई जाती रही, लेकिन इस संख्याबल को दिखाकर ताकत पाने की कोशिश को केंद्र ने साफ नजरंदाज किया।

बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने फ़िलहाल पत्ते नहीं खोले हैं कि आख़िर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए पार्टी का प्लान क्या हैं। 70 साल की वसुंधरा अपने प्रदेश की सर्वाधिक लोकप्रिय नेता अब भी हैं और भजनलाल शर्मा को उनकी बराबरी का कद पाने में लंबा वक्त लगेगा, मगर वे कभी भी वसुंधरा राजे जितना बड़ा राजनीतिक कद पा ही नहीं सकते क्योंकि वे चीजें जो कद को पद से भी बड़ा बना देती हैं, वे भजनलाल शर्मा में हैं ही नहीं। बहुत संभव है कि बीजेपी आलाकमान ने उनकी इस तासीर को भी भली भांति भांप लिया हो।

भजनलाल शर्मा की तरह ही मोहन यादव और विष्णुदेव साय का मुख्यमंत्री के रूप में चुना जाना कई लोगों के लिए निश्चित तौर से आश्चर्य की बात है। भले ही बीजेपी की धाराओं के जानकारों का कहना है कि 2024 के आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने ये रणनीतिक कदम उठाया है। जबकि कई लोग बीजेपी की पसंद से आश्चर्यचकित हैं, क्योंकि इनमें से किसी भी मुख्यमंत्री में बड़े पैमाने पर वोट दिलाने की क्षमता नहीं है। फिर भी हवाला तो जाति, समाज, वर्ग का दिया जा रहा है। हालांकि जाति, समाज, वर्ग और सामुदायिक संबद्धता के आधार पर नेताओं को चुनने की प्रथा बीजेपी में नई नहीं है, लेकिन वर्तमान चयन विभिन्न समुदायों और जातियों के व्यापक क्षेत्रीय आधार की दिशा में एक रणनीतिक कदम हो सकते हैं।

भजनलाल शर्मा सहित मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के नव नियुक्त तीनों मुख्यमंत्रियों का अगला लक्ष्य अगले साल होने वाले चुनाव में अपने-अपने प्रदेशों की सभी लोकसभा सीटों पर बीजेपी की जीत सुनिश्चित करना है। राजस्थान में ब्राह्मण यानी सवर्ण, मध्य प्रदेश में यादव यानी पिछड़ा और छत्तीसगढ़ में आदिवासी मुख्यमंत्रियों के चयन का बीजेपी का निर्णय देश के तीनों महत्वपूर्ण राज्यों की सामाजिक व जातिगत संरचना को प्रभावित करने का तो है ही, 2024 के आम चुनाव से पहले सबके समर्थन को मजबूत करने के लिए पार्टी की सावधानीपूर्वक योजना का भी प्रारूप भी प्रतीत होता है।

आदिवासी, ओबीसी व ब्राह्मण वोट राजस्थान सहित मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में बड़ी तादाद में है। बीजेपी कहती रही है कि वह एक परिवार या कुनबे की पार्टी नहीं है, जहां आगे बढ़ने के अवसर केवल परिवार के लोगों को ही मिलते हैं। मोदी और बीजेपी राजस्थान में भजनलाल शर्मा सहित इन तीनों नए मुख्यमंत्रियों के चयन के जरिए यह संदेश भी देने का प्रयास किया है कि उनकी पार्टी में हर किसी को आगे बढ़ने के समान अवसर प्राप्त हैं।

वैसे, बीजेपी के एक वरिष्ठ पार्टी नेता ने कहा कि वसुंधरा राजे आने वाले कुछ ही दिनों में बिना ज़िम्मेदारी के नहीं होंगी, क्योंकि उनकी सक्रियता का लाभ पार्टी को मिलना चाहिए। हालांकि, उनको क्या ज़िम्मेदारी मिलेगी, यह कोई नहीं जानता और जब जिम्दारी मिलेगी, तो वसुंधरा राजे खुद इस ज़िम्मेदारी को स्वीकार करेंगी या नहीं, यह भी एक सवाल है। सवाल तो भजनलाल शर्मा की मुख्यमंत्री के तौर पर सफलता को लेकर भी उठाए जा रहे हैं। लेकिन अभी तो शर्मा ने शपथ भी नहीं ली है। फिर भी सवाल हैं, तो ऐसे सवालों का तो कोई जवाब भी नहीं होता।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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