Bhagat Singh: आखिर भगत सिंह किसके हैं?
Bhagat Singh: वर्तमान दौर में शहीदे आजम भगत सिंह के जन्म और शहादत दिवस के अवसर पर लगने वाले मेलों में उन्हें अपना बताने की होड़ लगी रहती है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर भगत सिंह किसके हैं?
बीते 20वीं शताब्दी के अंतिम दशक तक कमोवेश सभी राजनीतिक दलों ने भगत सिंह और उन सरीखे क्रांतिवीरों से प्राय: दूरी बनाए रखी। 80 के दशक में इतिहासकार बिपिन चंद्रा ने भगत सिंह को क्रांतिकारी के रूप में प्रस्तुत किया। फिर क्या था, लंबे अरसे से एक अदद नायक की तलाश में बैठी देश की कम्युनिस्ट पार्टियों ने आजादी की 50वीं सालगिरह (1997) आते आते भगत सिंह पर अपना कॉपीराइट ठोक दिया। तत्कालीन सरकार पर यह आरोप भी लगाया कि भगत सिंह को जितनी तवज्जो मिलनी चाहिए थी, उतनी सरकार ने नहीं दी।

यहां यह उल्लेखनीय है कि भगत सिंह कभी भी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य नहीं बने। फिर भी वकील प्राणनाथ मेहता ने बताया था कि फांसी से पहले जेल के अंतिम क्षणों में भगत सिंह लेनिन को पढ़ रहे थे। स्मरण रहे कि आर्य समाजी परिवार में पैदा हुए भगत सिंह राम प्रसाद बिस्मिल के पक्के अनुयाई थे तथा वीर सावरकर की पुस्तक को मुद्रित कराकर अधिकाधिक लोगों में वितरित करने की जिम्मेवारी स्वयं ली थी।
भगत सिंह को लेकर कांग्रेस हमेशा उलझन में ही रही। हालांकि आजादी की लड़ाई के दौरान पंडित नेहरू यदा कदा क्रांतिकारियों के पक्ष में खड़े होते हुए दिखाई दिए किंतु महात्मा गांधी की चेतावनी के बाद सबने चुप्पी साध ली। आजादी के बाद कांग्रेस की प्राथमिकताएं बदल गई।
लेकिन आजकल जोर शोर से भगत सिंह को अपना नायक मानने बताने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। आजादी के बाद से ही जानबूझकर अनदेखी करने वाली कांग्रेस पार्टी अब भगत सिंह और पंडित नेहरू के विचारों में समानता को आगे कर खुद को भगत सिंह से जोड़ रही है। इसी तरह भगत सिंह की समाजवादी सोच और उनके नास्तिक होने के दावों के कारण वामपंथी दल उन्हें पक्का कम्युनिस्ट मानते हुए अपना बता रहे हैं।
इस मामले में राष्ट्रवादी पार्टियां भी पीछे नहीं है। सिर पर हैट लगाए भगत सिंह की तस्वीर की जगह अब पीले या गेरुआ रंग की पगड़ीधारी तस्वीर आ गई है। भाजपा भगत सिंह और वीर सावरकर के संबंधों तथा मिलजुल कर आजादी की लड़ाई लड़ने के जज्बे को आगे कर उन्हें पक्का राष्ट्रवादी करार देते हुए अपना बनाने में लगी है। 21वीं सदी के भारत में भगत सिंह का नायकत्व सभी संगठनों के सिर चढ़कर बोल रहा है।
इन सब बातों से इतना तो साफ जाहिर होता है कि अपने जन्म के 116 साल बाद भी भगत सिंह ही एक अकेला शख्स मिलता है जो हर किसी के दिल को जीत सके। फर्क बस इतना है कि जिसकी भावना जैसी है, उसने भगत सिंह की छवि वैसी ही गढ़ ली है। लेकिन भगत सिंह एक ऐसे अद्भुत, विलक्षण और रोमांचकारी व्यक्तित्व हैं, जिन्हें किसी एक विचारधारा के फ्रेम में नहीं सजाया जा सकता।
उग्र उत्साह और स्वतंत्रता की गहरी लालसा से भरपूर भगत सिंह ने अपना सारा जीवन ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़ने के लिए समर्पित कर दिया। पूत के पांव पालने में ही दिखने लगते हैं। बहुत छोटी उम्र में खेत में काम करते समय पिता किशन सिंह ने पूछा भगतू क्या कर रहा है? जवाब मिला, बरतानवी हुकूमत को हिंदुस्तान से खदेड़ने के लिए बंदूके बो रहा हूं। 12 साल की उम्र में भगत सिंह ने जलियांवाला बाग हत्याकांड देखा था, जिसके बाद उन्होंने भारत को अंग्रेजों से आजाद करने का प्रण लिया। वह हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य थे।
एक बार भगत सिंह के पिता किशन सिंह को उनकी रिहाई के लिए भारी रकम चुकानी पड़ी क्योंकि देश के प्रति उनका प्रेम उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता थी। इसलिए भगत सिंह भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए घर से भाग गए थे।
30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान लाला लाजपत राय पर पुलिस ने बार-बार लाठी चार्ज किया जिससे कालांतर में उनकी मृत्यु हो गई। युवा क्रांतिकारी ने शेरे पंजाब के नाम से मशहूर इस महान नेता की हत्या को अपने पौरुष के लिए चुनौती समझा और उसे स्वीकार किया। 17 दिसंबर 1928 को भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और राजगुरु ने लाहौर में लाला लाजपत राय पर लाठी बरसाने वालों में से एक पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या कर दी। हत्या के बाद हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की तरफ से पोस्टर लगाए गए जिन पर लिखा था लाखों लोगों के चहेते नेता की एक सिपाही द्वारा हत्या पूरे देश का अपमान था, इसका बदला लेना भारतीय युवाओं का कर्तव्य था। सांडर्स की हत्या का हमें दुख है पर वह उस अमानवीय और अन्यायी व्यवस्था का एक अंग था जिसे नष्ट करने के लिए हम संघर्ष कर रहे हैं।
अंग्रेज सरकार जनता विशेषकर मजदूरों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने के मकसद से दो विधेयक पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल पास करने की तैयारी में थी। इसके प्रति विरोध जताने के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को सेंट्रल लेजिसलेटिव असेंबली में बम फेंकने का काम सौंपा गया। बम फेंकने का उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं बल्कि सत्ता के बहरी कानों में विरोध की आवाज पहुंचना था। यह कोई खतरनाक बम नहीं था, एक मामूली बम था। इन लोगों ने सदन के भीतर जो पर्चा फेंका उसमें लिखा था "बहरे कानों तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए"। बम फेंकने का उद्देश्य अपनी गिरफ्तारी देना और अदालत को अपनी विचारधारा के प्रचार का माध्यम बनाना था, जिससे जनता उनके विचारों और राजनीतिक दर्शन को जान सके।
अपने पिता और क्रांतिकारी चाचा सरदार अजीत सिंह की विरासत के धनी भगत सिंह एक असाधारण बुद्धिजीवी भी थे। स्वतंत्रता की प्राप्ति में उन्हें संदेह नहीं था परंतु समाजवादी, शोषण विहीन समाज की स्थापना के बिना आजादी कितनी सार्थक होगी यह उनकी चिंता का विषय था, जिसका स्पष्ट उल्लेख उन्होंने अपनी माता को लिखे पत्र में किया, "मां मुझे कोई संदेह नहीं कि एक दिन मेरा देश स्वतंत्र होगा, परंतु मुझे डर है कि गोरे साहबों द्वारा छोड़ी गई कुर्सी पर देसी साहब बैठ जाएंगे। लोगों के दुख दर्द पहले जैसे ही रहेंगे। यह केवल मालिकों की अदला बदली होगी। मुझे यकीन है कि प्रगति के रास्ते में दीवार की तरह खड़ी हमारी सड़ी गली परंपराओं को ध्वस्त किए बिना कोई भी परिवर्तन संभव नहीं है। दार्शनिकों ने संसार की विभिन्न नजरियों से व्याख्या की है परंतु असली बात इसे बदलने की है। केवल क्रांति से ही ऐसा हो सकता है।"
अपने अंतिम हृदयस्पर्शी पत्र में उन्होंने अपने भाई करतार सिंह को लिखा "कोई दम का मेहमां हूं ए-अहले महफिल, चिराग ए-शहर हूं बुझा जाता हूं (प्रातः काल के दीए की आखिरी लौ की तरह मेरे पास जिंदगी की चंद सांसे ही बची है)। वकील प्राणनाथ मेहता के साथ अंतिम साक्षात्कार में जब पूछा गया कि क्या तुम्हें किसी चीज की आवश्यकता है? भगत सिंह ने उत्तर दिया, "हां, मैं इस देश में फिर से जन्म लेना चाहता हूं ताकि भारत मां की सेवा कर सकूं।" निःसंदेह सरदार भगत सिंह के स्पृहणीय जीवन और आजाद देश की हवा में सांस लेने की विराट व कमनीय बना देने वाले उनके यह संघर्ष राष्ट्र के लिए एक दैदिप्यमान दीप स्तंभ है।
आजादी के अनगिनत परवानों में 28 सितंबर 1907 को पंजाब प्रांत के बंगा गांव में जन्मे शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह का नाम एक प्रकाश पुंज है, जाज्ज्वल्यमान नक्षत्र है, जिनके जन्मदिवस पर कृतज्ञ राष्ट्र हर वर्ष श्रद्धापूर्वक नमन करता है। मात्र 23 वर्ष की छोटी आयु में ही सरदार भगत सिंह अपने अनन्य राष्ट्र प्रेम, अदम्य साहस, अडिग जिजीविषा और अप्रतिम बलिदान के कारण युवा हृदय सम्राट बन गए।
सरदार भगत सिंह और उनके दो जांबाज साथियों सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई। फांसी के तख्ते पर हंसते-हंसते चढ़ते हुए ये वतन के दीवाने नौजवान क्रांति का गीत गा रहे थे "दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फत, मेरी मिट्टी से भी खुशबू ये वतन आएगी" वे मर कर भी अमर हो गए।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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