Bindeshwar Pathak: शौचालय को सबके लिए सुलभ बनाने वाले क्रांतिकारी का अवसान
Bindeshwar Pathak: दलित लेखक विजय सोनकर शास्त्री ने कई किताबें लिखी हैं जिसमें उन्होंने यह बताने का प्रयास किया है कि भारत में कई अछूत जातियों का जन्म मुगल काल में सिर पर मैला उठाने की प्रथा के कारण हुआ। मुगल काल में ही संभवत: ऐसे शौचालयों का निर्माण शुरु हुआ जिनमें मैला न केवल हाथ से साफ करना पड़ता था बल्कि सिर पर ढोकर वहां से दूर ले जाना पड़ता था।
धीरे धीरे यह प्रथा इतनी रूढ़ हो गयी कि कुछ जाति विशेष के लोगों से यही काम लिया जाने लगा और उन्हें अछूत करार दे दिया गया। ये बात बिहार के एक नौजवान को परेशान करती थी। पटना में रहते हुए बिन्देश्वर पाठक ने जब इस काम को करते हुए महिलाओं को देखा तो उन्हें बड़ा दुख हुआ। वो सिर पर मैला ढोने वाली इस प्रथा को जड़मूल से खत्म करना चाहते थे।

2 अप्रैल 1943 को बिहार के वैशाली जिले के रायपुर बघेल गांव में जन्मे बिंदेश्वर पाठक की चाहत अपराध विज्ञान का व्याख्याता बनने की थी। लेकिन नियति को उनके जरिए कुछ और ही करवाना था। नियति का ही खेल रहा कि सागर विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर की पढ़ाई के लिए जाते वक्त उन्हें हाजीपुर स्टेशन पर उनके रिश्तेदार और जानकार एक वकील ने ट्रेन से उतार लिया। उन्हीं वकील साहब की सिफारिश पर उन्हें साल 1968 में बिहार गांधी शताब्दी समिति में अनुवादक की नौकरी मिल गयी।
उन्हें गांवों की महिलाओं की खुले में शौच वाली समस्या का भान शुरू से ही था लेकिन शहर आये तो उन्होंने हाथ से मैला साफ करने और सिर पर उठाने का रिवाज देखा जो सत्तर अस्सी के दशक तक बहुत ज्यादा प्रचलित था। गांधीवादी संस्था में काम करते हुए वो गांधी के अछूतोद्धार से भी बहुत प्रभावित हुए थे। सफाईकर्मियों की स्थिति देख वे सहज करूणा से भरे रहे। वो कुछ करना चाहते थे। उनकी इस सोच को मजबूती मिली विश्व स्वास्थ्य संगठन की पुस्तिका 'एक्स्क्रीटा डिस्पोजल इन रूरल एरियाज एंड स्माल कम्युनिटीज' यानी ग्रामीण इलाकों और निचले समुदायों में मल निस्तारण और बेहतर शौचालय प्रणाली। बिंदेश्वर पाठक को इसी संदर्भ में दूसरी पुस्तक खुद उसके सर्वोदयी लेखक राजेंद्र लाल दास ने दी थी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की पुस्तिका से मिले विचारों के आधार पर उन्होंने शौचालय का मॉडल बनाया और उसे सुलभ नाम दिया। इसे लागू करने में कई किंतु-परंतु हुए। बिंदेश्वर पाठक को बिहार सरकार से कुछ अनुदान भी मिला, लेकिन परियोजना जब तक लागू होती, तब तक या तो अधिकारी बदल जाते या अनुदान रोक दिया जाता। इसी कशमकश में उन्हें साल 1973 में बिहार के आरा में प्रोजेक्ट मिला। उन्होंने शौचालय बनाया। इसी साल सुलभ संस्थान की नींव रखी गई। पटना में रिजर्व बैंक के सामने शौचालय बनाने का काम मिला, वह मॉडल सफल रहा और फिर तो डॉक्टर पाठक ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज देश का शायद ही कोई शहर और बड़ा कस्बा होगा, जहां सुलभ शौचालय नहीं होंगे। सबसे बड़ा सुलभ शौचालय कांप्लेक्स महाराष्ट्र के कोल्हापुर में है, जहां हर साल मेला लगता है।
सुलभ शौचालय के जरिए बिंदेश्वर पाठक हिंदू वर्ण व्यवस्था में ठीक विपरीत छोर पर बैठी दो जातियों ब्राह्मण और अछूत को एक साथ ले आये। उन्होंने शौचालय क्रांति के जरिए जहां महिलाओं और कमजोर समुदायों को शौचालय की सहूलियत मुहैया कराई, वहीं सार्वजनिक शौचालयों के रख-रखाव और देखभाल के लिए ब्राह्मणों और दलितों को एक साथ नौकरियां दीं। जिस दौर में राजनीतिक उद्वेगों के जरिए जातियों के बीच खींचतान और तनाव चल रहा है, सुलभ के किसी भी प्रांगण में कभी नहीं सुना गया कि जातीय आधार पर किसी का विवाद हुआ हो।
हाथ से मैला ढोने की कुप्रथा के खिलाफ बिंदेश्वर पाठक ने सामाजिक क्रांति की ही अगुआई नहीं की, बल्कि इस पेशे से मुक्त हुए लोगों के लिए रोजगार के साधन तक मुहैया कराए। हाथ से मैला ढोने वाली महिलाओं और पुरूषों के लिए तरह-तरह के रोजगार मुहैया कराए गए। उन्होंने राजस्थान के अलवर में साल 2008 के दिसंबर में अछूत समुदाय के लोगों के लिए सार्वजनिक रूप से मंदिर प्रवेश का आयोजन किया, जिसे उन्होंने धरती और आसमान का मिलन कहा था।
बिंदेश्वर पाठक ने जिंदगी की शुरूआत संघर्षों के साथ की थी। शौचालय के लिए काम करने की वजह से उनके ससुर उनसे नाराज रहे। इस संघर्ष को उन्होंने ताजिंदगी याद रखा और जब भी उनके सामने कोई भूखा, कमजोर और जरूरतमंद पहुंचा, उसकी उन्होंने खुलकर मदद की। अपने आस पास के लोगों और पत्रकारों से भी वो अक्सर कहा करते थे कि नेक काम रूकना नहीं चाहिए। ऐसा वो सिर्फ कहते भर नहीं थे बल्कि इसके लिए तन मन धन से मदद भी करते थे।
बिन्देश्वर पाठक अध्ययवसायी और विद्वत्त पूजक भी थे। उन्होंने न जाने कितने लेखकों, कलाकारों की भी मदद की। जब भी उन्हें पता चलता कि फलां लेखक, कलाकार या पत्रकार संकट में है, उसकी सामर्थ्य अनुसार मदद करने में वे पीछे नहीं रहते थे। अछूतोद्धार, विधवाओं की मदद और शौचालय की दिशा में किए उनके क्रांतिकारी कार्यों की ही वजह से सुलभ इंटरनेशनल को अंतरराष्ट्रीय गांधी शांति सम्मान मिला। प्रधानमंत्री मोदी की प्रेरणा से उन्होंने वाराणसी के अस्सी घाट को अपने खर्च से खूब चमकाया। अस्सी घाट की साफ सफाई स्वच्छता के प्रति उनके समर्पण का उदाहरण है।
बिंदेश्वर पाठक इंजीनियर नहीं थे, लेकिन उन्होंने जिस तरह की शौचालय क्रांति की, वह अनूठी है। समाज शास्त्र के अध्ययवसायी थे, शायद यही वजह है कि उन्होंने अपनी इंजीनियर बुद्धि से सामाजिक ढांचे में ऐसा हस्तक्षेप किया, जिसका नतीजा सहयोग और सामाजिक सद्भाव रहा। 15 अगस्त 2023 को जब वे अपने ही कार्यालय में तिरंगा फहराने पहुंचे तो उनका दिल जवाब दे गया। उन्हें आनन-फानन में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान पहुंचाया गया, तब तक शौचालय क्रांति का यह सूत्रधार 80 साल की उम्र पूरी करके अनंत यात्रा पर निकल चुका था। पीछे छोड़ गया था वह नश्वर शरीर, जिसके जरिए उन्होंने धरती पर उन लाखों लोगों की सेवा की, जिन्हें सदियों से अछूत कहा जाता रहा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
-
'मेरे साथ गलत किया', Monalisa की शादी मामले में नया मोड़, डायरेक्टर सनोज मिश्रा पर लगा सनसनीखेज आरोप -
Silver Rate Today: चांदी में हाहाकार! 13,606 रुपये की भारी गिरावट, 100 ग्राम से 1 किलो की कीमत जान लीजिए -
Gold Silver Rate Crash: सोना ₹13,000 और चांदी ₹30,000 सस्ती, क्या यही है खरीदारी का समय? आज के ताजा रेट -
ईरान का गायब सुप्रीम लीडर! जिंदा है या सच में मर गया? मोजतबा खामेनेई क्यों नहीं आ रहा सामने, IRGC चला रहे देश? -
Gold Rate Today: ईरान जंग के बीच धराशायी हुआ सोना! 13,000 सस्ता, 18K और 22k गोल्ड की ये है कीमत -
Strait of Hormuz में आधी रात को भारतीय जहाज का किसने दिया साथ? हमले के डर से तैयार थे लाइफ राफ्ट -
Rupali Chakankar कौन हैं? दुष्कर्म के आरोपी ज्योतिषी के कहने पर काट ली थी उंगली! संभाल रहीं थीं महिला आयोग -
Love Story: बंगाल की इस खूबसूरत नेता का 7 साल तक चला चक्कर, पति है फेमस निर्माता, कहां हुई थी पहली मुलाकात? -
Ravindra Kaushik Wife: भारत का वो जासूस, जिसने PAK सेना के अफसर की बेटी से लड़ाया इश्क, Viral फोटो का सच क्या? -
Uttar Pradesh Gold Price: यूपी में आज 22K-18K सोने का भाव क्या? Lucknow समेत 9 शहरों में कितना गिरा रेट? -
Iran Vs America: ईरान की 'सीक्रेट मिसाइल' या सत्ता जाने का डर, अचानक ट्रंप ने क्यों किया सरेंडर -
US Iran War: 5 दिन के सीजफायर की बात, 10 मिनट में Trump का पोस्ट गायब! ईरान ने कहा- 'हमारे डर से लिया फैसला’












Click it and Unblock the Notifications