Bihar BJP: भाजपा ने बिहार की भविष्य की राजनीति तय की

Bihar BJP: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के फिर से पलटू राम बनने की देश भर में चर्चा है| उनके नाम पर आया राम गया राम जैसे जुमले कसे जा रहे हैं| सत्तर के दशक में लोकप्रिय आया राम गया राम जुमले की जगह अब पलटू राम ने ले ली है|

आया राम गया राम का किस्सा 1967 में शुरू हुआ था| इस जुमले को अमर कर देने वाले शख्स का नाम गया लाल था| वह हरियाणा के पलवल जिले की हसनपुर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए थे|

Bihar politics

गया लाल ने एक ही दिन में चार बार पार्टी बदली थी| पहले उन्होंने कांग्रेस का हाथ छोड़कर जनता पार्टी का दामन थाम लिया, फिर थोड़ी देर में कांग्रेस में वापस चले गए| करीब 9 घंटे बाद फिर उनका हृदय परिवर्तन हुआ और एक बार फिर जनता पार्टी में चले गए| गया लाल के हृदय परिवर्तन का सिलसिला इसके बाद भी जारी रहा और वह वापस कांग्रेस में चले गए|

कांग्रेस में वापस आने के बाद कांग्रेस के तत्कालीन नेता राव बीरेंद्र सिंह उनको लेकर चंडीगढ़ पहुंचे और वहां एक प्रेस कांफ्रेंस की, इसी प्रेस कांफ्रेंस में राव बीरेंद्र सिंह ने उन्हें मीडिया के सामने पेश करते हुए कहा था कि गया राम अब आया राम हैं| इस घटना के बाद से भारतीय राजनीति में ही नहीं बल्कि आम जीवन में भी पाला बदलने वाले दलबदलुओं के लिए "आया राम, गया राम" जुमले का इस्तेमाल होने लगा|

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नीतीश कुमार के सम्पूर्ण राजनीतिक विकास का श्रेय भारतीय जनता पार्टी को जाता है| हम थोड़ा पीछे जाते हैं| लालू यादव की जातिवादी राजनीति से परेशान हो कर जार्ज फर्नांडिस ने 1994 में अलग हो कर समता पार्टी बनाई थी| नीतीश कुमार समता पार्टी में शामिल हो गए थे| 1996 में वह पहली बार लोकसभा का चुनाव जीत कर आए थे|

1997 में लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल के अध्यक्ष भी थे| चारा घोटाले में जब उनकी गिरफ्तारी तय हो गई थी, और उन्हीं के दल के प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल उन पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का दबाव बना रहे थे, तो उन्होंने जनता दल तोड़ कर अपनी अलग पार्टी राष्ट्रीय जनता दल बना ली थी और अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनवा दिया था|

परिवारवाद की इसी राजनीति के खिलाफ जार्ज फर्नांडिस और नीतीश कुमार तीन साल पहले 1994 में ही जनता दल छोड़ चुके थे| उससे भी पहले 1992 में समाजवादी पार्टी बना कर मुलायम सिंह यादव जनता दल से अलग हो चुके थे| 1997 में नवीन पटनायक ने जनता दल छोड़कर बीजू जनता दल बना लिया था| 1999 में एच.डी देवेगौडा ने जनता दल से निकल कर जनता दल सेक्युलर बना लिया था| बचा खुचा जनता दल शरद यादव के पास रह गया था|

नीतीश कुमार उन जार्ज फर्नाडिस की समता पार्टी में थे, जिसने 1996 से ही अटल बिहारी वाजपेयी का समर्थन कर दिया था| बाद में 1998 में नीतीश कुमार वाजपेयी सरकार में मंत्री बन गए थे, वर्ष 2000 में बिहार विधानसभा के चुनाव थे| भाजपा और समता पार्टी ने मिल कर चुनाव लड़ा था, उनके साथ शरद यादव का जनता दल भी था|

तब तक बिहार का विभाजन नहीं हुआ था, इसलिए 324 विधायकों के सदन में भाजपा को 67, समता पार्टी को 34 और शरद यादव के जनता दल को 21 सीटें मिलीं| यानी भाजपा गठबंधन को 122 सीटें मिलीं जबकि दूसरी तरफ लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल को 124 सीटें मिलीं|

भारतीय जनता पार्टी के नेता सुशील कुमार मोदी ने भाजपा आलाकमान को इस बात के लिए तैयार किया था कि नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया जाए, वह बहुमत साबित कर सकते हैं| लेकिन नीतीश कुमार को सात दिन बाद ही इस्तीफा देना पड़ा, क्योंकि वह बहुमत नहीं जुटा पाए थे| कांग्रेस के समर्थन से राबडी देवी फिर मुख्यमंत्री बन गई थी|

2003 में शरद यादव के जनता दल और जार्ज फर्नाडिस की समता पार्टी का विलय हो गया| नई पार्टी का नाम जनता दल यूनाईटेड यानी जेडीयू रखा गया| इस बीच बिहार का विभाजन होने के बाद झारखंड अलग राज्य बन चुका था| विभाजन के बाद बिहार में भाजपा के 37 और जेडीयू के 55 विधायक बचे थे|

2005 में जेडीयू ने 139 और भाजपा ने 102 सीटों पर चुनाव लड़ा था| जार्ज फर्नांडिस की अनिच्छा के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने नीतीश कुमार को गठबंधन के मुख्यमंत्री पद का उमीदवार घोषित किया था| बिहार भाजपा के प्रभारी अरुण जेटली ने बहुत मुश्किल से जार्ज फर्नांडिस को नीतीश कुमार के नाम पर सहमति के लिए तैयार किया|

उस चुनाव में जेडीयू 88 और भाजपा 55 सीटें जीती, जबकि लालू यादव की आरजेडी 54 सीटों पर निपट गई| 20 से ज्यादा विधायकों वाली कांग्रेस को लालू के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का खामियाजा भुगतना पड़ा, वह 51 सीटें लड़ कर सिर्फ 9 सीटों पर निपट गई थी|

लालू परिवार के जंगलराज के खात्मे के बाद 2005 से 2010 का नीतीश सरकार का कार्यकाल बिहार का स्वर्णिम कार्यकाल माना जाता है| इसलिए 2010 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू अकेली बहुमत के करीब पहुँच गई थी, वह 141 सीटों पर चुनाव लड़कर 115 जीत गई, जबकि भाजपा भी 102 सीटों पर चुनाव लड़कर 91 सीटें जीत गई थी|

2010 के चुनाव नतीजों से नीतीश कुमार को अपनी लोकप्रियता का भ्रम हो गया| 2011 में भाजपा ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक पटना में रखी थी| जिसमें शामिल होने के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी पहुंचे थे। जिस दिन बैठक थी, उस दिन गुजरात सरकार ने बिहार के अखबारों में एक विज्ञापन दिया, जिसमें बिहार की बाढ़ के समय गुजरात सरकार की ओर से भेजी गई मदद का जिक्र था|

इससे खफा हो कर नीतीश कुमार ने भाजपा कार्यकारिणी के सदस्यों के लिए अपने घर पर आयोजित भोज रद्द कर दिया| यहीं से मोदी और नीतीश कुमार की तल्खी शुरू हुई| हालांकि 2013 के आखिर तक जब तक भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया था, नीतीश के साथ गठबंधन बना रहा था|

1996 से भाजपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ती रही पहले समता पार्टी और बाद में जेडीयू ने पहली बार 2014 का लोकसभा चुनाव बिना गठबंधन के अकेले लड़ा| भाजपा तो बिहार में लोकसभा की 22 सीटें जीत गई, जबकि नीतीश कुमार की जेडीयू सिर्फ 2 सीटों पर निपट गई|

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ पार्टी के खराब प्रदर्शन की वजह से नीतीश कुमार ने सीएम पद से इस्तीफा दे कर जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री पद सौंपा। लेकिन 2015 में जब पार्टी में अंदरुनी कलह शुरू हुई तो मांझी को हटाकर वह एक बार फिर मुख्यमंत्री बन गए|

जिस लालू यादव के जंगलराज के खिलाफ नीतीश कुमार ने 1994 से 2005 तक संघर्ष किया| जिस भाजपा-जेडीयू गठबंधन ने राष्ट्रीय जनता दल को 2010 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ 22 सीटों पर पहुंचा दिया था, उसी लालू यादव के साथ 2015 के चुनाव में गठबंधन करके नीतीश कुमार ने उन्हें पुनर्जीवित कर दिया|

लालू की आरजेडी नीतीश कुमार के सहारे 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभर आई, जबकि नीतीश कुमार की जेडीयू 115 से लुढक कर 71 पर आ गई| इसका मतलब साफ़ था कि नीतीश कुमार ने लालू यादव के साथ गठबंधन करके अपना नुकसान और लालू यादव का फायदा किया|

मजबूरी में नीतीश कुमार को लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री बनाना पड़ा| लालू यादव ने तभी ठान लिया था कि नीतीश के कंधों पर सवार हो कर वह अपने बेटे को मुख्यमंत्री बना देंगे| तेजस्वी यादव के उप मुख्यमंत्री बनते ही बिहार में फिर से जंगलराज की शुरुआत हो गई| 2017 में आई.आर.सी.टी.सी घोटाले में आरजेडी और उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद नीतीश कुमार को बहाना मिल गया, उन्होंने महागठबंधन से नाता तोड़ कर दुबारा एनडीए से नाता जोड़ा और अब एनडीए के मुख्यमंत्री बन गए|

2015 की गलती का खामियाजा नीतीश कुमार को 2020 में भी भुगतना पडा, जब भाजपा के साथ होने के बावजूद जेडीयू की सीटें 45 रह गईं| नीतीश कुमार 2022 में यह आरोप लगाते हुए भाजपा को फिर छोड़ गए कि उसने चिराग पासवान से 134 सीटों पर उम्मीदवार खड़े करवा कर जेडीयू को तीसरे नंबर की पार्टी बना दिया।

लेकिन सच यह था कि जेडीयू का रसातल में जाना 2015 में ही तय हो गया था, जब लालू यादव से गठबंधन करके जेडीयू 115 से लुढक कर 71 पर आ गई| नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन तोड़ कर 2013 में ही अपनी विश्वसनीयता खत्म कर ली थी, उसके बाद वह लगातार घटते ही गए|

2022 में नीतीश कुमार ने जो गलती की या उनसे करवाई गई, वह उनकी 2015 से भी बड़ी एतिहासिक गलती थी| जबकि लालू यादव ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनवाने के लिए उनके कंधों का इस्तेमाल करने के लिए नीतीश कुमार के साथ गठबंधन किया था|

तीसरी बार भाजपा के साथ आने के बावजूद 2025 में भी जेडीयू का लुढकना जारी रहना है| नीतीश कुमार का गैर यादव पिछड़ों और अति पिछड़ों का आधार खिसक रहा है| जेडीयू के वोटों का बिखराव हो रहा है, कुछ वोट भाजपा की तरफ जा रहे हैं, तो कुछ वोट आरजेडी की तरफ जा रहे हैं| पिछड़ों और अति पिछड़ों में भाजपा के वोट भी लगातार बढ़ रहे हैं|

गैर यादव पिछड़े, अति पिछड़े और काफी हद तक दलित भी खुद को भाजपा के साथ ज्यादा सुरक्षित पा रहे हैं| इसलिए भाजपा ने लंबी सोच कर नीतीश कुमार के लिए दूसरी बार दरवाजा खोला है| 2025 का बिहार विधानसभा का चुनाव नीतीश कुमार का अंतिम चुनाव होगा, उसके बाद आरजेडी और भाजपा आमने सामने होंगी|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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