Bihar CM Statement: बिहार की लड़कियों के सामने नीतीश के बयान का यक्ष प्रश्न
राज्य के हर सरकारी विभाग में मुख्यमंत्री की तस्वीर जरूर टांगी जाती है। इस तस्वीर का मतलब राज्य के मुख्य अभिभावक के रूप में काम कर रहे उस शख़्स का सम्मान करना, उसको हाजिर मान कर सभी काम स्वच्छ मन और शुद्धअंतःकरण से करना। क्या बिहार के मुख्यमंत्री के प्रति यही भाव लोगों के मन में आएगा?
जब-जब नीतीश कुमार की तस्वीर पर लोगों की नजर जाएगी तब तब विधानसभा में दिए उनके वक्तव्य की क्या याद नहीं आएगी, जिसमें उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के उदाहरण देने में नारी के मान को रौंद दिया था। अब तक किसी राजनेता ने ऐसा ना उदाहरण दिया होगा और ना कभी कोई देने की हिम्मत कर सकेगा।

नीतीश कुमार की जुबान अच्छी है या बुरी यह बहस का विषय नहीं है। बात उनकी सोच की है। राजनीति में उन्हें कोई भी बदतमीज नेता नहीं मानता, झुंझलाना और बिफर जाना ही उनकी राजनीतिक मर्यादा की हीनता रही है। पर 7 नवंबर को बिहार विधानसभा में बच्चे पैदा होने और ना होने के लिए पति और पत्नी के बीच की अंतरंग क्रिया का जिस तरह से वर्णन किया वह उनके जैसे नेता के मस्तिष्क में चल रहे दृश्य के चित्रण में कैसे आया, सोचने की बात है। उम्र के 70 साल पूरे होने वाले नेता के पास शब्दों की कमी रही होगी, इसको मानने का कोई वजह नहीं है। उन्हें जो कहना था, उन्होंने वहीं कहा। हिज्जे मिलाकर चेहरे पर प्रसन्नता का भाव लेकर और लोगों को समझा कर।
नेताओं की जुबान अक्सर फिसलती रहती है और इसके लिए लोगों को क्षमा भी किया जाता रहा है। पर उसे कैसे माफ किया जाए तो विधानसभा के पटल पर भरी सभा में पढ़ी लिखी और बिना पढ़ी लिखी लड़कियों के अंतर के लिए उनके पुरूष संसर्ग के तरीके को संदर्भित करे। यदि इसे भी माफ कर दिया गया तो फिर विधानसभा और लोकसभा को पवित्र स्थल बताना छोड़ना पड़ेगा। यदि इसे भी अनदेखा कर दिया गया तो लोकशाही से नैतिकता, मर्यादा और सम्मान जैसे शब्दों को निकाल फेंकना पड़ेगा। यदि इसके लिए विधानसभा के अध्यक्ष ने दोषी को सजा नहीं दी तो उनका भी आसन धृतराष्ट्र का आसन बन कर रह जाएगा।
विधानसभा कक्ष 7 नवंबर को धृतराष्ट्र का दरबार बन ही गया था। जिस समय नीतीश कुमार प्रदेश भर की लड़कियों की लाज का मर्दन कर रहे थे, उस समय उनको रोकने या टोकने की कोशिश विधानसभा के सभापति के आसन से बिल्कुल ही नहीं की गई। सत्ता पक्ष की बेंच पर बैठे लोग मुख्यमंत्री की भाषा सुनकर अवाक तो हुए पर मुस्करा कर सिर नीचे करने के अलावा किसी ने उस समय नीतीश को झकझोरा नहीं। पूरा सदन सब कुछ सुनता रहा। क्या कभी इसी तरह का दृश्य नहीं रहा होगा महाभारत के उस काल में जब द्रौपदी का चिरहरण हुआ। बाद में उस समय भी सभी ने खून के आंसू से उस पाप को धोने की कोशिश की, पर उस पाप को आज भी याद कराया जाता है।
समाज किसी की भी निर्ल्लजता और धृष्टता की कभी पूजा नहीं करता, चाहे वह कोई भी हो, कितना भी बलशाली हो। हमेशा दुष्टता का उदाहरण लोगों को सतर्क रहने के लिए ही दिया जाता है। इस काल में भी यही होना है। कोई यह सोचे कि राजनीतिक तर्कों और कुतर्कों में उलझा कर इस मामले को भुलाया जा सकता है, पर यह संभव नहीं है। यह किसी एक व्यक्ति, एक वर्ग या एक समुदाय से जुड़ा हुआ नहीं है। यह मातृरूपी ईश्वरीय रचना के अपमान का विषय है। जनसंख्या नियंत्रण के लिए ना तो वे अकेले जिम्मेदार हैं और न अकेले भागी। जो विषय महिलाओं के आत्मसम्मान को धूल धुसरित कर समझाया गया, वह पुरूषों को आत्मसंयम और सुरक्षा तरीके को अपनाने के प्रति सचेत करके भी समझाया जा सकता था। पर जब किसी के मस्तिष्क में फिल्म ही कुछ और चल रही हो तो उसमें विषय का क्या करना।
बिहार के मुख्यमंत्री ने अपने कहे की माफी मांग ली है। खुद की ही निंदा भी की है। पर उनकी माफी में पछतावे का भाव बिल्कुल नहीं है। अन्यथा वह यह नहीं कहते कि उनके आरक्षण वाले दाव को फेल होता देख उनके कहे को विपक्ष मुद्दा बना रहा है। 8 नवंबर को केबिनेट की बैठक में उन्होंने यही कहा कि दिल्ली से आदेश मिलने के बाद विधानसभा वाले उनके बयान का विरोध करने का बीजेपी ने निर्णय लिया, क्योंकि आरक्षण की सीमा 65 प्रतिशत करने के उनके प्रस्ताव का उनके पास कोई काट नहीं है। हो सकता है, राजनीति करने वाले यही सोचते हों। पर क्या बिहार की सभी लड़कियां भी यहीं सोचती हैं। मातृत्व का वरण करने वाली लड़कियों के लिए खद की मर्यादा से ज्यादा आरक्षण का लाभ महत्वपूर्ण स्थान रखता है? जो अपेक्षित आरक्षण की सीमा से बाहर कर दी जाएंगी, क्या उनके लिए अपने कहे का परिमार्जन नीतीश कुमार अलग से करेंगे। क्या बिहार की महिलाएं केवल इसलिए खामोश हो जाएंगी कि उनके सम्मान को रौंदने की भाषा बोलने वाले मुख्यमंत्री उनके आर्थिक लाभ के लिए चिंतित हो रहे हैं।
बिहार की अनुमानतः 13 करोड़ जनसंख्या है। महिलाओं की आबादी लगभग 50 फीसदी है, यानी 6 करोड़ से अधिक महिलाएं प्रदेश में है। राष्ट्रीय अनुपात ही लें तो लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या 30 साल की उम्र से नीचे है। यानी लगभग 4 करोड़ महिलाएं ऐसी हैं जो मुख्यमंत्री की भाषा समझ सकती हैं और उससे अपने को जुड़ा हुआ देख सकती हैं। उनके लिए क्या मायने रखता है, सम्मान के साथ उनका अधिकार भी ना। महिलाओं को मिलने वाले अधिकार किसी खास व्यक्ति या खास व्यक्ति के मुख्यमंत्री रहते ही मिले ऐसा तो नहीं है ना। यह अधिकार उन्हें भारत के नागरिक होने के नाते मिल रहा है। फिर अपमान करने वालों से अधिकार लेेने की बात क्यों।
बिहार की सरकार में हिस्सेदारी करने वाली राजनीतिक पार्टियां यह समझाने में लगी हैं कि मुख्यमंत्री के मुंह से जो शब्द निकले, दरअसल वे उनके आशय के नहीं थे। कोई यह कह रहा है कि जुबान फिसल गई, तो कोई यह कह रहा है कि जिस दौर में सेक्स शिक्षा देने की बात सरे आम हो रही है उस दौर में यदि मुख्यमंत्री ने यह कह भी दिया तो क्या बड़ी बात हो गई। राजनीति वालों के लिए कोई भी बात बड़ी नहीं। पर आम आदमी जीवन भर अपनी इज्जत आबरू की रक्षा के लिए जूझता रहता है। फिर कोई मुख्यमंत्री बिना किसी कारण उसको लज्जित करता है और उसके साथ के लोग उसे सही ठहराने की कोशिश करते हैं, तो उसको नजरों से गिराने या उससे नजर बचाने के अलावा क्या रास्ता बचता है। यह समझ में किसी भी मुख्यमंत्री को आना चाहिए।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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