Bhindranwale 2: अमृतसर का अमृतपाल
एक गुमनाम सी शख्यिसत अमृतपाल सिंह ने अचानक पंजाब में हलचल पैदा कर दी है। कौन है यह अमृतपाल सिंह और पंजाब में ऐसा क्या कर रहा है जिसके कारण इसे भिंडरावाले 2 कहा जाने लगा है?

Bhindranwale 2: अमृतसर के अजनाला पुलिस स्टेशन पर गुरुवार को जो कुछ हुआ वह पंजाब में आतंक की नयी आहट है। एक अनजाना सा व्यक्ति जिसे साल भर पहले तक पंजाब में शायद ही कोई जानता हो, आज देशभर की मीडिया में चर्चा का विषय बन गया है। अजनाला पुलिस स्टेशन पर उसी अनजाने शख्स की 'फौज' ने ऐसा उत्पात और आतंक मचाया कि पंजाब पुलिस को उनके सामने झुकना पड़ा। आनन फानन में शीर्ष स्तर पर बैठकें हुईं, और उस मांग को मान लेने का निर्णय लिया गया जिसके लिए अजनाला थाने पर 'फौज' ने धावा बोला था। पंजाब पुलिस ने निर्णय लिया कि वह लवप्रीत तूफान को जेल से रिहा कर देगी।
अब सवाल ये उठता है वह अनजान शख्स आखिर है कौन जिसने पंजाब से लेकर दिल्ली तक हलचल पैदा कर दी है? उसका नाम है अमृतपाल सिंह। 30 साल का अमृतपाल सिंह अमृतसर के ही जल्लूपुर खैरा का रहने वाला है। साल भर पहले तक वह बतौर एनआरआई दुबई में रहता था और रिश्तेदारों के ट्रांसपोर्ट बिजनेस में काम करता था। न तो उसे सिक्ख धर्म से कुछ खास मतलब था और न सिक्ख राजनीति से। लेकिन फरवरी 2022 में जब पंजाब के एक्टर और एक्टिविस्ट दीप सिद्धू की मौत हो गयी तो अचानक से उसका राजनीतिक उदय होता है। दीप सिद्धू ने 'वारिस पंजाब दे' नामक जो संगठन बनाया था, वह उस पर कब्जा कर लेता है।
'वारिस पंजाब दे' नामक संगठन भी कोई बहुत पुराना संगठन नहीं है। किसान आंदोलन के दौरान जब दीप सिद्धू को मंच पर जगह नहीं मिली तो उन्होंने अपना एक अलग संगठन बना लिया था। इस संगठन के कुछ समर्थक थे जो अब अमृतपाल के इर्द गिर्द इकट्ठा हो गये। लेकिन सालभर में अमृतपाल ने अपनी ताकत इतनी बढ़ा ली कि आज पंजाब पुलिस भी उसके सामने झुकने को मजबूर है।
इसका कारण यह है कि बीते सालभर में अमृतपाल कई मोर्चों पर सक्रिय है। पहला, वह सिक्खों को अमृत छकाकर शुद्ध कर रहा है तो हिन्दुओं को अमृत छकाकर सिक्ख बना रहा है। अब तक वह राजस्थान और पंजाब में ऐसे दो-तीन कार्यक्रम आयोजित कर चुका है जिसमें अमृत छकाकर लोगों की 'घर वापसी' सुनिश्चित कर रहा है। इसके अलावा वह खालिस्तान की मांग को पुरजोर आवाज भी दे रहा है और सीधे तौर पर केन्द्र की मोदी सरकार को चुनौती भी। वह उसके समर्थकों के गन कल्चर का भी सपोर्ट करता है और जनरैल सिंह भिंडरावाले को आदर्श संत भी मानता है 'जिन्होंने खालिस्तान के लिए कुर्बानी दी।'
यही कारण है कि देखते ही देखते अमृतपाल चर्चा में आ गया। उसके समर्थक जिसमें निहंग सिख भी शामिल हैं, वो भिंडरावाले जैसे ही उग्र और आक्रामक हैं। इसलिए पुलिस भी उनसे मुकाबला करने से हिचकती है। पुलिस को अंदाज है कि अगर उसे सीधे तौर पर चुनौती दी गयी तो रातों रात पंजाब में उसके समर्थक बढ़ जाएंगे और पंजाब में लॉ एंड आर्डर की समस्या पैदा होते देर नहीं लगेगी। यही कारण है बीते नवंबर में उसने हथियार के साथ गिरफ्तार अपने साथी को इसी तरह मोगा में धावा बोलकर छुड़वा लिया था और अब अमृतसर के अजनाला पुलिस स्टेशन पर धावा बोलकर वही काम दोहराया है।
रातों रात उसके समर्थक बढ़ गये हैं और अब चंडीगढ से लेकर दिल्ली तक उसके नाम की चर्चा है। उसने खुलेआम गृहमंत्री को धमकी दी है कि "अमित शाह ने कहा है कि वो खालिस्तान मूवमेन्ट को फिर से नहीं उभरने देंगे। मैंने उनसे कहा है कि यही इंदिरा गांधी ने भी कहा था। जो हाल उनका हुआ, वही अमित शाह का भी होगा। अगर अमित शाह में हिम्मत है तो हिन्दू राष्ट्र की मांग करने वालों के खिलाफ यही बोलकर दिखाएं।"
असल में अमृतपाल वैसा ही कुछ करने और दिखने की कोशिश कर रहा है जैसा जनरैल सिंह भिंडरावाले ने करने या दिखने की कोशिश की थी। अमृतपाल भी जनरैल सिंह की तरह 'रहत मर्यादा' की बात करता है। उसे भले ही सिक्ख धर्म के बारे में कुछ खास अता पता न हो लेकिन गुरुग्रंथ साहिब के सम्मान और मर्यादा का अपना सिद्धांत विकसित कर रहा है। जैसे, दिसंबर 2022 में उसने एक गुरुद्वारे से सारी कुर्सियां इसलिए हटवा दीं ताकि गुरुग्रंथ के सामने सब समान रूप से जमीन पर बैठें। इसी तरह अपनी सशस्त्र फौज के साथ वह हरमंदिर साहिब में प्रवेश कर गया था। सिर्फ यह जताने के लिए कि वह सिक्ख धर्म का नया संरक्षक है।
संप्रदाय या पैगंबरवाद की सबसे बड़ी दिक्कत यही होती है कि उसके माननेवाले जैसे चाहें, उसे परिभाषित कर लें। जनरैल सिंह भिंडरावाले इसका पंजाब में बहुत बढ़िया उदाहरण है। उसे जानने वाले बताते हैं कि वह एक औसत दर्जे का व्यक्ति था। लेकिन उसने अलगाववाद का ऐसा भावनात्मक मुद्दा उठाया कि पढ़े लिखे लोग भी उसका मुकाबला नहीं कर सके। कुछ ऐसा ही अमृतपाल भी करने की कोशिश कर रहा है। अमृतपाल फिर भी पढ़ा लिखा है और देश दुनिया को देख रखा है।
यह सच है कि सिक्खों के एक बड़े वर्ग में जनरैल सिंह भिंडरावाले 'संत' है और खालिस्तान जायज मांग। जनरैल सिंह के मारे जाने के करीब एक दशक बाद जनरैल सिंह पंजाब में दोबारा एक कल्ट बनकर लौटा। आज दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में एक बड़ा समूह है जिसकी गाड़ियों से लेकर घरों तक जनरैल सिंह का स्टिकर चिपका हुआ दिखेगा। मतलब सिखों में एक अंडरकरंट है जो जनरैल सिंह भिंडरावाले को अपना हीरो मानते हैं। अमृतपाल जनरैल सिंह जैसा दिखने की कोशिश करेगा तो ये लोग स्वाभाविक रूप से उसके समर्थक बन जाएंगे।
लेकिन अस्सी के दशक में और आज के दौर में पंजाब में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक स्तर पर कई बुनियादी बदलाव हो चुके हैं। अब पंजाब में ऐसी कोई राजनीतिक मजबूरी किसी दल की नहीं है जो अमृतपाल जैसे लोगों को महत्व या बढ़ावा देगी। आम आदमी पार्टी के ऊपर आरोप है कि उसने चुनाव जीतने के लिए खालिस्तानियों की मदद ली है लेकिन आम आदमी पार्टी सत्ता में होने के बावजूद पंजाब की मुख्यधारा की पार्टी नहीं है। आज भी पंजाब में कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और भाजपा का प्रभाव है। ये तीनों नहीं चाहेंगे कि कोई ऐसा चौथा विकल्प उभरे जो उनके लिए राजनीतिक संकट बने।
अमृतपाल सिंह के बारे में कहा जाता है कि उसे हरियाणा की सिख गुरुद्वारा कमेटी का समर्थन प्राप्त है। अगर ऐसा है तो इसका मतलब यह हुआ कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी कभी भी अमृतपाल का साथ नहीं देगी। इसका कारण यह है कि इस समय हरियाणा गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी के बीच जंग चल रही है। हरियाणा के गुरुद्वारों से एसजीपीसी को बाहर किया जा रहा है। अब क्योंकि अकाली दल का एसजीपीसी पर पूरा प्रभाव है इसलिए अकाली या बादल परिवार कभी नहीं चाहेगा कि अमृतपाल सिंह का प्रभाव पंजाब में बढ़े।
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फिर भी इतना तो तय है कि एक साल पहले तक गुमनाम व्यक्ति अमृतपाल ने पंजाब में हलचल जरूर पैदा कर दी है। उसका क्या भविष्य होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि पंजाब के लोग अपना क्या भविष्य तय करते हैं।
यह भी पढ़ें: Amritpal Singh: कौन हैं दुबई रिटर्न अमृतपाल सिंह, जानिए क्यों हैं विवादों में?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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