पुण्यतिथि पर विशेष: लोकमान्य बालगंगाधर तिलक जिनसे अंग्रेज ही नहीं कांग्रेस भी डरती थी
आज ही के दिन 1 अगस्त 1920 को लोकमान्य बाल गंगाधर तिळक की मुम्बई में मृत्यु हुई थी। यह दिन भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन रहा है। 1 अगस्त को ही महात्मा गांधी अपने असहयोग आंदोलन को शुरू करने वाले थे लेकिन तिलक की मुत्यु के कारण उन्होने असहयोग आंदोलन को स्थगित कर दिया।

लोकमान्य तिलक भारत के ऐसे पहले नेता थे जिन्हाने बगावत को प्रतिष्ठा दी। जब कांग्रेस के नेता अंग्रेजों की भक्ति में लीन और याचक की भूमिका में थे उस समय तिलक ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का झंडा उठाया। वह तिलक ही थे, जो अंग्रेजों से लगातार मुठभेड़ करते रहे और लोगों का मानस भी बनाते रहे। यह कहा जा सकता है कि भारत के किसी भी व्यक्ति की अंग्रेजो से इतनी कड़वी और इतनी व्यक्तिगत मुठभेड़ कभी नहीं हुई जितनी तिलक की हुई।
अंग्रेजों ने तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा 1897 में ही लाद दिया था। तिलक में लोगों को संगठित करने और बगावत के लिए उकसाने की पूरी क्षमता देखने के बाद से ही अंग्रेज सरकार तिलक को किसी भी तरह जेल में डालना चाहती थी। तिलक को फंसाने के लिए अंग्रेजों ने तिलक का संबंध दो अंग्रेज अफसरों की हत्या से जोड़ा और सबूत के रूप में केसरी के वे दो लेख प्रस्तुत किए जिसमें उन्होने कहा था कि चालाकी से अफजल की हत्या कर शिवाजी ने अच्छा काम किया।
तिलक ऐसे पहले भारतीय नेता थे जिससे अंग्रेज नफरत करते थे और उन्हें व्यक्तिगत रूप से बदनाम करने के हर हथकडें अपनाते थे। 1902 में अंग्रेजो ने तिलक को ताई महाराज नामक एक मालदार विधवा के मुकदमे में फंसा दिया। मामला गोद लेने का और ट्रस्टी के अधिकारों का था और अंग्रेज हाकिमों ने उन पर झूठी गवाही देने, जालसाजी करने, विधवा को नाजायज ढंग से कैद करने, पुलिस को झूठी जानकारी देने, धोखा देने और दंगे के इरादे से भीड़ इकट्ठा करने के आरोप लगाए।
लंबी मुकदमेबाजी के बाद अंत में जज ने सजा सुनाई, तो तिलक को एक मामूली कैदी की तरह हथकड़ी डाल कर जेल ले जाया गया। ब्रिटिश न्याय के जाल में देश की सबसे बड़ी मछली फांस ली गई थी और सारे अंग्रेज खुश थे। यह सही है कि हाईकोर्ट में तिलक बाइज्जत बरी हो गए लेकिन जितना मानसिक संताप उन्हे इस प्रकरण में हुआ किसी अन्य प्रकरण में कभी नही हुआ।
तिलक भारत के पहले बड़े नेता थे जो अपने लिखे हुए लेख के खातिर जेल गए। तिलक की बढती लोकप्रियता से परेशान अंग्रेजों ने 1908 में दूसरी बार तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया, उस समय जिन्ना तिलक के वकील थे और तिलक को छह साल के लिए मांडले जेल भेज दिया गया। गांधी द्वारा चलाए गए स्वाधीनता संग्राम आंदोलन में कोई भी बड़ा नेता लगातार छह साल तक जेल में नही रहा लेकिन तिलक रहे। वे अग्रदूत थे और आक्रामक थे इसलिए अकेले पड़ गए।
गांधी और तिलक में वैचारिक मतभेद होने के बाद भी तिलक की कई बातें गांधी का पूर्वाभास देती हैं। 1905 में तिलक ने कहा था कि हम भारतवासियों को अंग्रेजो से लड़ने के लिए हथियारों की जरूरत नहीं है। हमारे पास एक ज्यादा मारक हथियार है और उस हथियार का नाम है बहिष्कार। लोकमान्य तिलक ने कहा था कि मुठ्ठी भर अंग्रेज इतने बड़े हमारे देश पर जो शासन चला रहे हैं वह हमारी मदद से चला रहे हैं और अंग्रेज चाहते है कि भारत की जनता कभी यह जान न पाए कि हम आपस में एकजुट होकर कितने शक्तिशाली हो सकते हैं।
अंग्रेज हमारे देश की भोली जनता के मन में यह बात बैठा चुके है कि हम कमजोर है और वह ताकतवर, लेकिन अगर आपका आजाद होने का पक्का इरादा हो तो आप आजाद हो जाएंगे। अगर आप में सक्रिय मुकाबला करने की ताकत नहीं है तो क्या आप में यह ताकत भी नहीं है कि आप आत्मसंयम और आत्म निषेध के अस्त्र आजमाएं और यह व्रत ले लें कि इस विदेशी सरकार को अपने ऊपर शासन करने में कोई मदद नही देगें? यही बहिष्कार है।
1919 से लेकर 1942 तक महात्मा गांधी ने जितने भी आंदोलन चलाए, वे तिलक द्वारा प्रस्तुत थीसिस के दायरे में ही है। गांधी के भारत आने से पहले ही बाल गंगाधर तिलक ने 1907 में देश की जनता के सामने तीन सूत्र रखे थे। स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा। कांग्रेस का कोई नेता इस मामले में तिलक का साथ देने को तैयार नहीं था। तिलक अंग्रेजो के साथ कांग्रेस के अंदर उन नेताओं से भी लड़ रहे थे जो कांग्रेस को अंग्रेजों के सामने सीना तान कर खड़ी होने वाली कांग्रेस के बजाय एक लाचार और याचक कांग्रेस बनाए रखना चाहते थे। तिलक अपने जमाने के सबसे लोकप्रिय नेता रहे, लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1916 तक तिलक को अंगीकार ही नही किया। वे पहले बडे़ नेता थे जिससे अंग्रेज ही नही कांग्रेस भी भय खाती थी।
उनकी एकाकी बगावत उनकी मौत के बाद परपंरा बनी। लड़ाकूपन तिलक के जीवन में अंत तक रहा, लेकिन जीवन के अंतिम वर्षो में वे नरमी और यु़द्ध विराम का महत्व समझने लगे थे। प्रथम विश्वयुद्ध में उन्होने गांधी की तरह ही अंग्रेजो की फौज के लिए सिपाहियो की भर्ती की लेकिन तिलक की एक शर्त थी कि युद्ध के बाद हमें होमरूल मिले। युद्ध के बाद जब मौटफोर्ट रिपोर्ट आई और सुधार कानून पास हुआ, तो तिलक इस पक्ष में थे कि भारत के नेता कौंसिल में प्रवेश करें, और अनुपातिक सहयोग करें। तिलक कहते थे जितना अंग्रेज दे उतना ले लो और शेष के लिए यु़द्ध जारी रखो।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जन जागरण के लिए केसरी नाम का अखबार निकालते थे। केसरी का प्रत्येक अंक विदेशी शासकों के खिलाफ तथा देशभक्तिपूर्ण लेखों और समाचारों से भरा रहता था। लोकमान्य प्रतिदिन खुद इसकी संपादकीय लिखते थे। लोग बड़ी उत्सुकता से केसरी का संपादकीय पढने का इंतजार करते थे। रोज की तरह एक दिन जब वह संपादकीय लिख रहे थे तो परिवार के सदस्य ने आकर सूचना दी कि आपके पुत्र का निधन हो गया है।
लेख लिख रहे तिलक ने बिना विचलित हुए कहा कि आप लोग उसके अंतिम संस्कार का प्रबंध करो। मैं लेख पूरा कर सीधे श्यमशान घाट पहुंच जाऊंगा। परिचित ने कहा कि पुत्र की मृत्यु हुई है आपको सारे काम छोड़ देना चाहिए विचित्र बात है कि आप लिख रहे है। तिलक ने जवाब दिया केसरी के इस लेख के लिए सारा महाराष्ट्र प्रतीक्षा कर रहा है। यह काम मेरे सिवाय कोई और नही कर सकता। पुत्र का अंतिम संस्कार तो कोई और भी कर सकता है, इसलिए इस समय मेरे लिए यह लेख लिखना अधिक आवश्यक है।
अपने ऐसे ही दृढ निश्चय के कारण लोकमान्य तिलक ने राष्ट्रीय आंदोलन को अत्यंत मौलिक एवं वैचारिक अधिष्ठान प्रदान किया। उन्होने यह मौलिक विचार प्रतिपादित किया कि भगवत गीता के स्वधर्म का पालन करने के लिए हमे स्वाधीनता चाहिए। इसके लिए उन्होने घोषित किया कि "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है वह मैं प्राप्त करके ही रहूंगा"।
हिंदू समाज में धार्मिक एकता का सूत्र कार्यक्रम बनाकर लोकमान्य तिलक ने जनजागृति के जो कार्यक्रम प्रस्तुत किए उनके कारण युवा पीढी राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति अधिक आकर्षित होने लगी। आंदोलन को अधिक उग्र बनाने के लिए साथ ही हिन्दू समाज की धार्मिक एकता के सूत्र को मजबूत बनाने के लिए जन जागृति के कार्यक्रमो में श्री गणेश और छत्रपति शिवाजी के उत्सवों का समावेश करने का आव्हान तिलक ने ही किया था।
जनता की और से भी इस आव्हान को भारी समर्थन मिला। इन कार्यक्रमों में देशभक्ति समान्य व्यक्ति का स्वभाव बने इस वैचारिक जागृति पर बल दिया गया। पंजाब के लाला लाजपतराय, महाराष्ट्र के बाल गंगाधर तिलक और बंगाल के बिपिनचंद्र पाल ये नेता लाल, बाल और पाल के नाम से उन दिनों समस्त भारतीय जनता के श्रध्दा केन्द्र के रूप में उभर रहे थे लेकिन उसी समय 1 अगस्त 1920 को तिलक का निधन हो गया। लोकमान्य तिलक के निधन से भारत की जनता और राष्ट्रीय आंदोलन पर गहरा आघात पहुचा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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