Madhya Pradesh: मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार पर प्रहार शुरू

मध्य प्रदेश में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव की तारीखें नजदीक आती जा रही हैं, प्रदेश में भ्रष्टाचार एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनता जा रहा है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने जहां भाजपा सरकार पर 50 प्रतिशत कमीशनखोरी का आरोप लगाया है वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार पर आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दे रहे हैं।

कांग्रेस का थिंक टैंक यह मानकर चल रहा है कि जैसे उसने कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा सरकार पर 40 प्रतिशत कमीशन की सरकार का आरोप लगाया और जनता ने उसे स्वीकार भी किया, ऐसा ही वह मध्य प्रदेश में भी कर सकता है जिसके परिणाम उसके पक्ष में होंगे। यही कारण है कि प्रियंका गांधी, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव और वरिष्ठ नेता जयराम रमेश समेत तमाम कांग्रेसियों ने भाजपा सरकार पर 50 प्रतिशत कमीशनखोरी का आरोप लगा दिया।

shivraj singh chauhan

इस आरोप के पीछे एक पत्र था जो लघु एवं मध्यम क्षेत्रीय संविदाकार संघ नामक संस्था की ओर से ज्ञानेंद्र अवस्थी द्वारा हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के मुख्य न्यायाधीश के नाम से लिखा गया जिसमें पेटी कांट्रेक्टर तथा मूल ठेकेदार से कार्य के भुगतान के बदले 40 से 50 प्रतिशत कमीशन लेने की शिकायत की गई।

पत्र के सोशल मीडिया पर वायरल होते ही प्रदेश की राजनीति में भूचाल आ गया। भाजपा ने इसे झूठ का प्रचार बताते हुए कार्रवाई की बात कही तो 24 घंटे में ही प्रियंका वाड्रा से लेकर कमलनाथ, अरुण यादव, जयराम रमेश सहित कई कांग्रेसी नेताओं पर प्रदेश के 41 जिलों में एफआईआर दर्ज हो गईं। हालांकि सरकार के सूत्रों के अनुसार एफआईआर का यह क्रम रोक दिया गया है क्योंकि इससे कांग्रेस को जनता के बीच सहानुभूति मिलने की आशंका थी। किन्तु पुलिस की प्रारंभिक पड़ताल में संस्था का नाम, पता और भेजने वाले के गायब होने से कांग्रेस का पूरा आरोप फर्जी साबित हो रहा है अतः इस बार कांग्रेस के तमाम नेता कानूनी शिकंजे में फंसते नजर आ रहे हैं पर प्रदेश में भ्रष्टाचार को लेकर हो रही राजनीति अब आम जनता की नजरों में आने लगी है।

भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बीच मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भ्रष्टाचार को लेकर कड़ा रुख अपनाया हुआ है। शिवराज सिंह ने भ्रष्ट अधिकारियों व सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ वर्षों से लंबित मामलों में मुकदमा चलाने की अनुमति देने की प्रक्रिया तेज कर दी है। बीते तीन माह में लोकायुक्त व आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने 205 केसों में 358 अफसरों के विरुद्ध न्यायालय में चालान पेश कर दिया है। प्रदेश में भ्रष्टाचार में लिप्त कर्मचारियों और अधिकारियों के पकड़े जाने के मामले भी बीते कई वर्षों में बढ़े हैं।

2021 में जारी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2020 की तुलना में 2021 में भ्रष्ट सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों के पकड़े जाने के मामले 65 प्रतिशत तक बढ़ गए। रिपोर्ट के अनुसार, 200 सरकारी अधिकारी और कर्मचारी तो रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़े गए किन्तु रिपोर्ट के माध्यम से एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी पता चला कि इनमें से एक भी भ्रष्टाचारी साल भर बाद भी सलाखों के पीछे नहीं पहुंचा था जिसे लेकर शिवराज सरकार की भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने की मंशा पर प्रश्न उठ रहे थे।

प्रश्न तो खैर अभी भी उठ रहे हैं क्योंकि लोकायुक्त तथा आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने जिन सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की थी उनमें से एक भी वर्तमान आईएएस/आईपीएस स्तर के अधिकारी के नाम की अनुशंसा नहीं हुई है। मात्र रिटायर्ड आईएएस अधिकारी अंजू बघेल के विरुद्ध मुकदमा चलाये जाने की संस्तुति सरकार की ओर से मिली है। सूत्रों के अनुसार इस मुद्दे पर सरकार सभी विकल्पों पर मंथन कर रही है।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मई, 2023 में अभियोजन स्वीकृति के प्रकरणों की विभागवार समीक्षा की थी और भ्रष्टाचार के मामले में कार्रवाई के लिए 15 जून तक अल्टीमेटम दिया था। अब जबकि कांग्रेस ने भ्रष्टाचार को बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया है तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं विभागों द्वारा की गई कार्रवाई की समीक्षा कर रहे हैं ताकि कांग्रेस को प्रोपगेंडा फैलाने से रोका जा सके। वर्तमान आईएएस/आईपीएस के भ्रष्टाचार के मामलों की जांच में भी तेजी आई है।

मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार का चुनावी मुद्दा बनना नई बात नहीं है। 2013 और 2018 के विधानसभा चुनाव में व्यापमं घोटाला, डंपर घोटाला, ई-टेंडरिंग घोटाला, सिंहस्थ में निर्माण कार्य घोटाला, सरकारी नियुक्तियों में घोटाला जैसे कई मामले चुनावी हथियार के रूप में प्रयुक्त हुए किन्तु कई सरकारी संस्थाओं से लेकर न्यायालयों तक कुछ साबित नहीं हुआ। हाल ही में महाकाल लोक में आंधी से गिरी मूर्तियों को पूरे देश ने टीवी पर देखा था। विपक्ष ने इसके निर्माण में भी भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था और अपनी ओर से एक जांच दल का गठन कर इसकी सत्यता जानने निकला था किन्तु जनता की इस मामले में अरुचि से उसने भी अपने पैर वापस खींच लिए।

दरअसल, अब जनता भी इस तथ्य को समझ गई है कि राजनीतिक तंत्र का भ्रष्टाचार लोकतंत्र की नियति है और कम या अधिक मात्रा में इसकी उपस्थिति समाज में भी रहती है अतः अब उसे संभवतः भ्रष्टाचार का मुद्दा अधिक उद्वेलित नहीं करता। फिर मध्य प्रदेश में जिस प्रकार रोज किसी न किसी अधिकारी व कर्मचारी के भ्रष्टाचार का मुद्दा सार्वजनिक होता है उससे यह संकेत भी जाता है कि सरकार भ्रष्टाचार के विरुद्ध कड़े कदम उठा रही है तभी मामले सामने आ रहे हैं जबकि पूर्ववर्ती सरकारों के शासनकाल में भ्रष्टाचार के मामले दबा लिए जाते थे।

मप्र परिवहन निगम का दिग्विजय सिंह सरकार में बंद होना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि भ्रष्टाचार के चलते हुए घाटे ने एक सरकारी निगम को ही बंद करवा दिया। फिर कांग्रेस के जो नेता भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं उनकी खुद की सरकार में भ्रष्टाचार के न जाने कितने मामले सामने आए थे। यह बात अलग है कि उन मामलों के ऊपर भी अब तक कार्रवाई नहीं हुई अतः यदि कांग्रेस भ्रष्टाचार को चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है तो उसे भी अपनी सरकारों में हुए भ्रष्टाचार पर जनता को जवाब देना होगा तभी भ्रष्टाचार का मुद्दा आर-पार की चुनावी जंग में जनता का मुद्दा बन पाएगा अन्यथा तो जनता अब भ्रष्टाचार को अपनी नियति मानकर लगभग स्वीकार कर ही चुकी है।

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