Assembly Elections: उत्तर भारत में कर्नाटक की रणनीति का असर
चुनाव वाले तीनों हिन्दी भाषी राज्यों में तस्वीर अब थोड़ी थोड़ी साफ़ होने लगी है। भाजपा और कांग्रेस के अधिकांश उम्मीदवारों का एलान हो चुका है। उम्मीदवारों की सूची देखकर एक बात साफ़ हो गई है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों की रणनीति कर्नाटक के नतीजे से प्रभावित है। राजस्थान और मध्यप्रदेश में कांग्रेस का फोकस मुस्लिम वोटरों को एकजुट रखने का है।
कर्नाटक में कांग्रेस की जीत का बड़ा कारण मुस्लिम वोटों का एकतरफा कांग्रेस की ओर जाना ही था। अगर जेडीएस और कांग्रेस में मुस्लिम वोटों का बंटवारा होता, तो ऐसे नतीजे नहीं आते। इन नतीजों से सबक सीख कर ही एचडी देवेगौडा ने भाजपा के साथ गठबंधन का फैसला किया।

अपनी पार्टी में विभाजन की कीमत पर उन्होंने ऐसा किया। कर्नाटक में भी जेडीएस टूट गई और केरल यूनिट तो अलग ही हो गया। जब जनता दल के कई टुकड़े हुए थे, तो देवेगौडा ने अपनी पार्टी के नाम के साथ ही सेक्यूलर जोड़ा था। तब जो पार्टी जेडीयू भाजपा के साथ गई थी, वह तो सेक्यूलर हो कर कांग्रेस के साथ चली गई, और सेक्यूलर पार्टी भाजपा के साथ चली गई।
कर्नाटक में कांग्रेस की जीत का दूसरा बड़ा कारण दलित वोट बैंक था, जो एकतरफा कांग्रेस के साथ चला गया था। वह कर्नाटक के दलित समुदाय से आने वाले मल्लिकार्जुन खड़गे की वजह से हुआ था, जिन्हें कांग्रेस ने अपना अध्यक्ष बनाया था। लेकिन उत्तर भारत में भाजपा को दलित वोटों के खिसकने का खतरा नहीं है। उत्तर भारत की राजनीति कभी भी दक्षिण से प्रभावित नहीं होती, और दक्षिण की राजनीति कभी भी उत्तर से प्रभावित नहीं होती।

दक्षिण भारत में दलितों का अच्छा खासा वोट बैंक होने के बावजूद कांशीराम और मायावती कभी भी दक्षिण में पाँव नहीं जमा सके। यहाँ तक कि महाराष्ट्र में जहां दलित समुदाय आधारित आरपीआई का अच्छा खासा प्रभाव है, कांशीराम और मायावती प्रभाव नहीं जमा सके। अलबत्ता रामजन्मभूमि आन्दोलन के बाद उत्तर भारत का दलित समुदाय भाजपा से जुड़ा है। इसलिए उत्तर प्रदेश में भी मायावती का सफाया हो गया। भाजपा को उत्तर भारत में दलित वोटों में विभाजन का खतरा नहीं है। इसमें छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्य अपवाद हैं, जहां दलित और आदिवासी वोटर भाजपा से सत्ता में भागेदारी नहीं मिलने से नाराज होकर कांग्रेस के साथ खड़ा दिख रहा है।
भाजपा को सबसे ज्यादा खतरा मोदी की सबका विकास वाली छवि से है, जिस कारण हिन्दुओं का एक बड़ा वोट बैंक भाजपा से खफा है। नूपुर शर्मा के मामले में कट्टरपंथी मुस्लिमों के सामने भाजपा के घुटने टेकने से भी भाजपा का वोटर खफा है। इसलिए भाजपा के सामने बड़ी चुनौती अपने ही वोट बैंक को संभाल कर रखने की है।
हिन्दू वोट बैंक को संभाल कर रखने के लिए भाजपा ने कट्टरवादी हिन्दू नेता के तौर पर उभरे योगी आदित्यनाथ और हेमंत बिस्व सरमा को तीनों राज्यों में ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने की रणनीति बनाई है। मौके को ताड़ कर कमलनाथ ने मध्यप्रदेश में खुद की हिन्दूवादी छवि बनानी शुरू की। तो शुरुआती विरोध के बाद दिग्विजय सिंह ने भी रामजन्मभूमि मन्दिर के लिए एक लाख ग्यारह हजार रूपए भेजने की बात कही है। भाजपा और संघ के कई बड़े नेता भी भाजपा से नाराज हो कर कांग्रेस में चले गए हैं। मध्यप्रदेश में कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व वाले कार्ड ने मुकाबले को कड़ा बना दिया है।
जैसा कि कमलनाथ ने पिछली बार कहा था कि मुसलमानों ने 90 प्रतिशत वोटिंग की तो कांग्रेस ही जीतेगी, वही फार्मूला इसबार भी है। अगर कांग्रेस सॉफ्ट हिंदुत्व की लाईन अपनाती है तो मुसलमानों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए मध्यप्रदेश में कांग्रेस मस्जिदों का जमकर इस्तेमाल कर रही है। भाजपा ने इसे ध्रुवीकरण के मौके के तौर पर लिया है, और चुनाव आयोग को लिखित में शिकायत भेजी है। जब इस तरह की खबर बाहर आती है, तो प्रतिक्रिया में ध्रुवीकरण अपने आप हो जाता है।
ठीक चुनावों के समय रामजन्मभूमि मन्दिर के उद्घाटन की खबर ने भी भाजपा के वोट बैंक की नाराजगी दूर करने का काम किया है। यही रणनीति राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी है। राजस्थान में अमित शाह ने अपने भाषण में कन्हैया लाल के मुद्दे को उछाल दिया है, जिसकी नूपुर शर्मा का समर्थन करने पर हत्या कर दी गई थी।
भाजपा ने डेमेज कंट्रोल के लिए कट्टर हिन्दू छवि वाले कई उम्मीदवार भी उतार दिए हैं। जैसे हम तिजारा का उदाहरण लेते हैं, जहां मुस्लिम हिन्दू आबादी लगभग बराबर है। वहां भाजपा ने बाबा मस्तनाथ मठ के महंत बाबा बालक नाथ को उतार दिया है। बाबा बालकनाथ का पर्चा भरवाने खुद योगी आदित्यनाथ पहुंचे, जबकि कांग्रेस ने इमरान खान को उतारा है।
इसी तरह जैसलमेर से भाजपा ने महंत प्रतापपुरी को उतारा है, तो कांग्रेस ने उनके मुकाबले सालेह मोहम्मद को उतार दिया है। इसी तरह जयपुर की हवामहल विधानसभा सीट से बालमुकुंद आचार्य को उतारा है, कांग्रेस अभी उम्मीदवार तय नहीं कर पाई। इसी तरह गो-तस्करी में बदनाम मेवात क्षेत्र की रामगढ़ सीट से भाजपा ने ज्ञानदेव आहूजा के भतीजे जय आहूजा को टिकट दिया गया है। ज्ञान देव आहूजा की तरह जय आहूजा भी हिन्दुत्ववादी संगठनों के लिए काम करते हैं।
जहां तक छत्तीसगढ़ का सवाल है, तो वहां हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण जैसी कोई बात नहीं, क्योंकि वहां मुस्लिम सिर्फ 2 प्रतिशत है। वहां सारा खेल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी का है, जो कुल आबादी का 90 प्रतिशत है। 32 प्रतिशत आदिवासी, 13 प्रतिशत दलित और 50-52 प्रतिशत ओबीसी वाले राज्य में भाजपा ने 15 साल तक राजपूत रमन सिंह को मुख्यमंत्री बनाए रखा। ओबीसी में 22 प्रतिशत साहू हैं, इसलिए कहा जाता है कि जिसके साथ साहू और आदिवासी होंगे, जीतेगा वही।
इन तीनों ही समुदायों ने 15 साल इन्तजार करने के बाद 2018 में भाजपा का सूपड़ा साफ़ कर दिया। पिछले चुनाव में एसटी वर्ग की 29 में से 27 सीटें कांग्रेस ने जीती थीं, भाजपा सिर्फ दो सीटे जीत पाई। इसी तरह एससी की 10 में से सात पर कांग्रेस, दो पर भाजपा और एक सीट बसपा जीती थी। जबकि छत्तीसगढ़ उन राज्यों में शुमार है, जहां संघ ने दलितों और आदिवासियों में बहुत काम किया है। लेकिन भाजपा ने लगातार ऊंची जाति का मुख्यमंत्री बना कर इन समुदायों को नाराज कर लिया।
बस्तर में कभी कांग्रेस की 12 में से एक सीट होती थी, पिछली बार वह 12 की 12 जीत गई, इसी तरह सरगुजा संभाग में भी कभी कांग्रेस 14 में से सिर्फ एक सीट जीती थी, वहीं पिछले चुनाव में वह 14 की 14 जीत गई। छत्तीसगढ़ में सारा खेल जातीय समीकरणों और सोशल इंजीनियरिंग का है, जिस में भाजपा फिसड्डी साबित हुई है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications