Assembly Elections: राजनीति में सेमीफाइनल कुछ नहीं होता
Assembly Elections: वर्ष 2003 के अंतिम महीने में जब भाजपा ने मध्यप्रदेश के साथ साथ कांग्रेस शासित राजस्थान और छत्तीसगढ़ भी जीत लिया था, तो भाजपा ने उन नतीजों को लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल समझ लिया था| इसीलिए प्रमोद महाजन जैसे सलाहाकारों की सलाह पर अटल बिहारी वाजपेयी ने चार महीने पहले ही लोकसभा चुनाव करवा दिए थे| अक्टूबर 2004 में होने वाले चुनाव अप्रेल 2004 में करवा दिए थे| नतीजा यह निकला कि लगातार दो बार से जीत रही भाजपा की सीटें कांग्रेस से घट गईं, और यूपीए की सरकार बन गई|
2018 में भाजपा मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और कर्नाटक चारों राज्यों में हार गई थी, लेकिन सिर्फ पांच महीने बाद हुए लोकसभा चुनावों में इन्हीं चारों राज्यों से भाजपा को बंपर सीटें मिलीं| अब जो यह कहा जा रहा है कि कांग्रेस पांच में से तीन राज्यों में चुनाव जीत गई, तो केंद्र में उसे कोई नहीं रोक सकेगा, वह उन लोगों की खामख्याली है, जो यह भविष्यवाणी कर रहे हैं| राजनीतिज्ञों में यह खामख्याली हमेशा बनी रहती है, लेकिन अब खामख्याली का दायरा पत्रकारों में बढ़ता जा रहा है|

पिछले कई दिनों से टीवी डिबेट्स और अखबारी विश्लेषणों में यह देखने को मिल रहा है कि इस महीने होने वाले विधानसभा चुनावों को अप्रेल-मई 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल कह रहे हैं| कुछ महीने पहले ऐसी राजनीतिक अपरिपक्वता दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने दिखाई थी, जब उन्होंने दिल्ली सेवा बिल को लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल बता दिया था| इस बहाने वह विपक्षी दलों से संपर्क साध कर पहली लाईन में आकर जरुर खड़े हो गए, लेकिन संसद से पारित होने वाला कोई बिल लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल नहीं हो सकता|
कांग्रेस पांचों विधानसभा चुनावों को सेमीफाइनल की तरह लड़ रही है| पांचो राज्यों के चुनावों से पहले उसने विपक्षी एकता की सारी कोशिशें बंद कर दी है| कहीं किसी भी राज्य में इंडी एलायंस के सहयोगी दलों से सीट शेयरिंग पर कोई बात नहीं हो रही| जब शुरुआती बात हुई थी तो अखिलेश यादव और केजरीवाल जैसे सहयोगी उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में कांग्रेस को अपनी हैसियत में रखने की कोई कोशिश कर रहे थे|

इसलिए कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव नतीजों तक इंडी एलायंस को ठंडे बस्ते में डाल दिया और सीट शेयरिंग पर बात बिलकुल बंद कर दी| यहाँ तक कि विधानसभा चुनावों के दौरान इंडी एलायंस की साझा रैली का इरादा भी त्याग दिया| इस पर विपक्षी एकता की पहल करने वाले नीतीश कुमार सार्वजनिक तौर पर अपनी नाराजगी का इजहार कर चुके हैं|
पिछले गुरूवार को पटना में हुई सीपीआई की रैली में नीतीश कुमार ने कहा कि कांग्रेस इंडी एलायंस की अगली मीटिंग और सीट शेयरिंग में कोई दिलचस्पी नहीं ले रही| उन्होंने कहा कि वह तो कांग्रेस को मजबूत करना चाहते हैं, लेकिन उसकी सोच पांच विधानसभाओं के चुनावों में अटकी है| कांग्रेस के किसी राष्ट्रीय नेता ने उनके बयान पर कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की| बिहार प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अखिलेश सिंह ने नीतीश कुमार पर फब्ती कसते हुए कहा कि वह नरेंद्र मोदी को एक दो दिनों में प्रधानमंत्री पद से हटाने के सपने ले रहे हैं| लेकिन यह संभव नहीं है क्योंकि लोकसभा चुनाव तो अगले साल अप्रेल मई में हैं|
कांग्रेस के रणनीतिकार यह मान कर चल रहे हैं कि अगर कांग्रेस पांच में से तीन राज्य जीत गई, तो विपक्ष में उसका नेतृत्व स्वीकार कर लिया जाएगा| अगर ऐसा हो जाता है, तो वह आधी लड़ाई तो लोकसभा से पहले ही जीत जाएगी| क्योंकि कांग्रेस के सामने फिलहाल खुद को विपक्ष के नेता के तौर पर स्थापित करने का संकट है| कांग्रेस की इस रणनीति को इंडी एलायंस के पार्टनर भी उस समय पूरी तरह समझ गए, जब कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में सहयोगी दलों के लिए सीटें छोड़ने से इंकार कर दिया|
नतीजा यह निकला कि अरविन्द केजरीवाल ने तो गुजरात की तरह कांग्रेस को सब राज्यों में हराने के लिए बड़ी मात्रा में उम्मीदवार खड़े कर दिए| अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के पडौसी राज्य मध्यप्रदेश में छह सीटें मांगी थीं, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें छह सीटें देना तो दूर, कमलनाथ ने मीडिया के सामने "छोड़ो अखिलेश वखिलेश" कह कर उन्हें अपमानित भी किया|
अपने अपमान का बदला लेने के लिए अखिलेश यादव ने 42 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए और अब कांग्रेस के खिलाफ जम कर प्रचार कर रहे हैं| उन्होंने कहा है कि अगर कांग्रेस नेता मध्यप्रदेश में सपा की हैसियत की बात कर रहे हैं, तो वह यूपी में कांग्रेस को उसकी हैसियत दिखाएंगे| दरअसल मध्य प्रदेश में जिस तरह एक दो विधानसभा सीटों की हैसियत समाजवादी पार्टी की है, यूपी में वैसी ही हैसियत कांग्रेस की है| वह भी विधानसभा चुनाव में दो ही सीटें जीती थीं| नीतीश कुमार भी पीछे नहीं रहे, उन्होंने भी मध्यप्रदेश में कांग्रेस का खेल बिगाड़ने के लिए जेडीयू के पांच उम्मीदवार उतार दिए हैं|
दूसरी तरफ वैसे तो भारतीय जनता पार्टी हर चुनाव को सेमीफाइनल समझ कर लड़ती है| लेकिन हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक हारने और उसके बाद इंडी एलायंस बनने के बाद भाजपा भी इन विधानसभा चुनावों को गंभीरता से सेमीफाइनल की तरह ले रही है| इन पांच राज्यों में भाजपा की सिर्फ एक राज्य मध्यप्रदेश में सरकार में है, जबकि कांग्रेस दो राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सत्ता में है| बाकी दोनों राज्यों तेलंगाना में बीआरएस और मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट सत्ता में है|
भाजपा हालांकि तेलंगाना और मिजोरम में चुनाव लड़ रही है, लेकिन उसकी प्राथमिकता यह है कि इन दोनों राज्यों में कांग्रेस सत्ता में न आए, इसलिए वह चाहती है कि प्रादेशिक पार्टियां दुबारा सत्ता में लौटें| भाजपा बाकी तीनों राज्यों में कांग्रेस से खुद लड़ रही है, वैसे तो उसकी कोशिश है कि तीनों राज्यों में उसकी सरकार बन जाए, तो कर्नाटक और ईंडी एलायंस से बनी कांग्रेस की हवा गायब हो जाएगी|
इसलिए भाजपा ने कांग्रेस की बढ़त वाले छत्तीसगढ़ में पूरा जोर लगा दिया है| जबकि राजस्थान और मध्यप्रदेश में जहां शुरू में नेतृत्व परिवर्तन के संकेत दिए जा रहे थे, उन संकेतों में अब काफी कमजोरी दिखाई दे रही है| भाजपा ने मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और राजस्थान में वसुंधरा राजे के हाथ में चुनावी बागडोर सौंप दी है, ताकि इन दोनों राज्यों को हर हाल में जीत कर सेमीफाइनल जीतने का संदेश दे दिया जाए|
भाजपा की कोशिश अपना कम से कम एक राज्य बढ़ाने और कांग्रेस का एक राज्य घटाने की है, जबकि कांग्रेस का जोर भाजपा से मध्यप्रदेश छीनने और राजस्थान छत्तीसगढ़ बचाने पर है, ताकि तीन राज्य जीत कर वह यह संदेश दे सके कि वह लोकसभा चुनावों में विपक्ष का नेतृत्व करने की क्षमता रखती है| वैसे तो लोकसभा चुनावों का कोई सेमीफाइनल नहीं होता, लेकिन अगर भाजपा मध्यप्रदेश न बचा पाई और राजस्थान एवं छत्तीसगढ़ में से एक राज्य नहीं जीती तो लोकसभा चुनावों में इंडी एलायंस के हौंसले बढ़े हुए होंगे|
दूसरी तरफ भाजपा के समर्थकों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर सवाल खड़े होंगे, क्योंकि जबसे वह प्रधानमंत्री बने हैं, क्षेत्रीय नेताओं को दरकिनार किया गया है| ऐसे नतीजों से यह संदेश जाएगा कि लोकसभा चुनाव तो ठीक, वह तो मोदी के नेतृत्व में भाजपा 2024 में फिर जीत जाएगी, लेकिन राज्यों में चुनाव जिताने की क्षमता मोदी में नहीं है| संघ परिवार में भाजपा की कार्यशैली पर पुनर्विचार भी होगा कि उसे सामूहिक नेतृत्व की ओर वापस लौटना चाहिए|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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