Ashoka University: लोकसभा चुनाव नतीजों पर सवाल उठाने वाला रिसर्च पेपर विवादों में
Ashoka University: एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी अशोका के प्रोफेसर सव्यसाची दास ने 2019 के आम चुनाव पर एक रिसर्च पेपर लिखा है जिसे लेकर इन दिनों विवाद हो रहा है। विवाद इतना बढ़ा कि प्रोफेसर सव्यसाची दास को यूनिवर्सिटी से इस्तीफा देना पड़ा। उनके समर्थन में कुछ अन्य प्राध्यापकों ने भी इस्तीफा दे दिया और उन्हें वापस बुलाने की मांग पर अड़े हैं। लेकिन सवाल है कि प्रोफेसर सव्यसाची दास ने ऐसा क्या कर दिया जिसके कारण यह विवाद पैदा हुआ है?
असल में उन्होंने एक रिसर्च पेपर लिखा है जिसमें 2019 में हुए लोकसभा चुनाव की चुनावी प्रक्रिया पर ही सवाल उठा दिया गया है। पेपर में 2019 के आमचुनाव में भाजपा शासित प्रदेशों में 9-18 सीटों पर बूथ स्तर पर धांधली की आशंका ज़ाहिर की गई है जहाँ जीत का अंतर बहुत कम था। रिसर्च पेपर में इसे भाजपा के पक्ष में धांधली बताया गया है। कमाल की बात यह भी है कि प्रोफेसर सव्यसाची दास अपने रिसर्च पेपर में भाजपा शासित राज्यों पर तो सवाल उठाते हैं लेकिन चुनाव आयोग को क्लीन चिट देते नज़र आ रहे हैं। हां, स्थानीय स्तर पर चुनावी पर्यवेक्षक को भाजपा का 'तथाकथित एजेंट' बताने का प्रयास करते जरूर जान पड़ते हैं।

इन 9-18 सीटों पर जीत का अंतर 3-7% बताया गया है। औसतन 3% अर्थात लगभग 56,000 वोटर्स और 7% अर्थात 79,000 वोटर्स। धरातल पर किसी मापदंड द्वारा इतने वोटर्स के नाम गायब करना या अन्य तरीकों द्वारा धांधली करना संभव नहीं लगता है। इसके पहले द क्विंट में भी 2019 के लोकसभा चुनावों की प्रक्रिया पर सवालिया निशान उठाते हुए एक लेख प्रकाशित हुआ था। इसके हिसाब से लोकसभा की 373 सीटों पर ईवीएम में पड़े वोट और गिने हुए वोटों की संख्या में अंतर बताया गया था। हालांकि उनके द्वारा 373 सीटों की कोई सूची प्रकाशित नहीं की गई थी। सिर्फ 11 सीटों का उल्लेख था।
भाजपा और चुनाव आयोग को बार- बार कटघरे में लाते लेख में जिन 11 सीटों का जिक्र किया उसमें भाजपा की जीत सिर्फ 5 सीट पर हुई। 4 पर डीएमके, 1-1 पर बीजेडी और कांग्रेस की जीत बतायी गई। मतलब अगर अनियमितता हुई भी तो सीटें अकेले भाजपा के हिस्से तो नहीं आई। इसके साथ ही यह प्रश्न उठता है कि भाजपा अगर चुनाव में या चुनावी आंकड़ों में हेर- फेर कर रही है तो वह इसका फ़ायदा दूसरे दलों को और खास कर विपक्षी दलों को क्यों दे रही है?
अशोका युनिवर्सिटी के प्रोफेसर सव्यसाची के रिसर्च पेपर के बिन्दुओं पर ही अगर 2019 के आमचुनाव के परिणामों का विश्लेषण करें तो इसका फ़ायदा भाजपा की अपेक्षा विपक्षी दलों को होता ज्यादा दिखेगा। 2019 के आम चुनाव में भाजपा को 303 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। रिसर्च पेपर के हिसाब से धांधली का आरोप 9-18 सीटों पर बताया जा रहा है। अगर 18 सीट हटा भी दें तो इसी पेपर के हिसाब से भाजपा ने 285 सीटों पर फेयर तरीके से चुनाव जीता है जो बहुमत 272 के आंकड़ों से बहुत आगे है तो फिर किसी भी पार्टी द्वारा ऐसी धांधली का औचित्य क्या बनता है?
यह रिसर्च पेपर स्वयं कहता है कि सबूत पर्याप्त नहीं है तो किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दीबाजी होगी। रिसर्च को लेखक खुद ही अधूरा बता रहे हैं। स्वयं प्रोफेसर सव्यसाची की यूनिवर्सिटी ने इसे जर्नल में जगह नहीं दी है। इस रिसर्च पेपर से विश्वविद्यालय पहले ही अपना पल्ला झाड़ चुका है। फिर अधूरी- अपुष्ट रिसर्च के निष्कर्षों को शेयर करने की जल्दबाजी कांग्रेस ने क्यों दिखाई? लेखक स्वयं कहते हैं कि इस आंकलन का एक कारण इन सीटों पर भाजपा का "फोकस्ड चुनावी प्रचार" भी हो सकता है। प्रोफेसर सव्यसाची दास ने माना है कि बहुत सघन प्रचार से भी ऐसे वोट पड़ सकते हैं फिर राजनीतिक स्टैंड लेते हुए बीजेपी के डोर टू डोर कैम्पेन को ही छद्म बता दिया है।
अगर पिछले लोकसभा चुनाव के चुनावी डेटा का विश्लेषण करें तो 2019 के चुनाव में 98 सीटों पर कांटे की टक्कर थी, जहाँ जीत का अंतर 5% से कम था। इनमें से भाजपा को सिर्फ 43 सीटों पर जीत हासिल हुई। इन 43 सीटों में भी 22 सीट भाजपा शासित प्रदेशों से है जबकि 21 सीट गैर-भाजपा शासित प्रदेशों से है। तो रिसर्च पेपर के ही फाइंडिंग के हिसाब से गैर भाजपा शासित प्रदेशों में भाजपा की जीत का कारण क्या बनता है? लेखक के हिसाब से ही देखें तो अगर बूथ स्तर पर पर्यवेक्षक की मदद से वोटों के हेर फेर से जीतना सरल है तो यह काम राज्य स्तर पर विधानसभा चुनावों में करना ज्यादा सुविधाजनक है। फिर भाजपा राजस्थान, छत्तीसगढ़ और हाल में हिमाचल, कर्नाटक क्यों हारी?
अब जरा सबसे ताज़ा चुनाव परिणाम का विश्लेषण करते हैं। कांग्रेस ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव में 224 में से 135 सीटों पर जीत हासिल की है। पार्टी को 43 फीसदी वोट मिले हैं। 2018 विधानसभा चुनाव के मुकाबले इस बार 12 सीटों पर जोरदार टक्कर थी। इनमें जीतने वाले प्रत्याशी और दूसरे नंबर पर रहे उम्मीदवार के बीच का अंतर 5 हजार वोटों से भी कम है। इस बार 42 ऐसी सीटें थीं, जिन पर कड़ा मुकाबला था। इन सीटों में से कांग्रेस को 22, भारतीय जनता पार्टी को 17 और बाकी तीन सीट जनता दल (सेक्युलर) को मिली हैं।
कांग्रेस ने इस बार जो सीटें जीती हैं, इनमें से 12 पर जीत का अंतर एक हजार वोटों से भी कम है। दिलचस्प बात यह है कि इन सभी सीटों पर दूसरे नंबर पर बीजेपी प्रत्याशी रहे हैं। बेंगलुरु क्षेत्र की जयनगर सीट पर तो कांटे की टक्कर देखने को मिली है। यहां भाजपा से मैदान में उतरे सीके राममूर्ति ने कांग्रेस विधायक सौम्या रेड्डी को 16 वोटों के मामूली अंतर से हरा दिया। अब इन आंकड़ों का अर्थ क्या यह नहीं है कि सव्यसाची ने पहले निष्कर्ष निकाल लिया फिर आंकड़ों को अपने हिसाब से उसमें फिट कर दिया? दिलचस्प बात यह कि पेपर में वोटर लिस्ट से मुसलमान वोटर्स के नाम काटे जाने की बात कही गई है लेकिन इससे संबंधित कोई सूची नहीं दी गयी है। उस समय भी विपक्षी दलों द्वारा चुनाव आयोग को ऐसी कोई शिकायत नहीं की गयी। फिर सव्यसाची ने क्या सिर्फ नेताओं के राजनीतिक बयानों के आधार पर इतना बड़ा दावा कर दिया?
पिछले लोकसभा चुनाव में जिन सीटों पर धांधली हुई बताई जा रही है उन सीटों पर पिछले आम चुनाव के डेटा से कोई तुलनात्मक अध्ययन नहीं दिखाया गया है। फिर पिछले आम चुनाव के पैटर्न फॉलो ना करने की बात का आधार क्या बनता है? चुनाव दर चुनाव वोटिंग प्रतिशत बढ़ रहे हैं। बात अगर मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों की भी है तो ऐसी सीटों पर गैर-मुस्लिम वोटर का ध्रुवीकरण कांटे की टक्कर में जीत की वजह नहीं हो सकती?
भाजपा 2019 में 224 लोकसभा सीटों पर 50% से अधिक मार्जिन से जीती थी। यह जीत कोई छोटी जीत नहीं थी। लोकतंत्र में नापसंदी, असहमति रहती है पर इसे नफरत में बदलकर हांडी को आधे में उतार कर आधा पके चावलों को बिरयानी बताकर खिला देना लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है। ऐसा लगता है प्रोफेसर सव्यसाची दास ने अपने विवादास्पद रिसर्च पेपर में यही करने का प्रयास किया है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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